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लॉकडाउन में किया कुछ ऐसा कि अब हर जगह इनके ही प्रोडक्ट की मांग

आजकल देश बदल रहा है. कभी गांव के लोगों को नौकरी करने के लिए शहर की ओर रूख करना पड़ता था, बहुत सारी समस्याएं होती थी लेकिन अब आधुनिक जमाने में गांव में भी कई ऐसे रास्ते खुल गए हैं जिनके जरिए नौकरी की तलाश में लोगों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा. लोगों की इस समस्या को खत्म करने के बारे में दिल्ली के रहने वाले पति-पत्नी अनीश शर्मा और अलका शर्मा ने सोचा है. उन्होंने गांव के लोगों को रोजगार देने की एक अनूठी पहल की है.

दरअसल, इस जोड़े ने उत्तर प्रदेश के बागपत और उसके आसपास के इलाकों में महिलाओं को ट्रेनिंग दी और इस ट्रेनिंग के जरिए रोजगार के अवसर दिए. जानकारी के अनुसार, ये महिलाएं वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार करने से लेकर गोबर से दीए और गमले बनाने का काम करती हैं जिससे कमाई भी बढ़िया हो जाती है.

अनिल शर्मा पेशे से बिजनेसमैन हैं. वो बताते हैं कि, मैं तो दिल्ली शहर में ही पढ़ा लिखा लेकिन शादी के बाद हम रेगुलर बागपत जाने लगे. वहां बहुत करीब से गांव की लाइफ को देखने का मौका मिला, जबकि अलका पहले से ही गांव की लाइफ से परिचित थी. हम दोनों के बीच अक्सर गांव की महिलाओं को लेकर चर्चा होती थी. हम चाहते थे कि गांव के लोगों के लिए कुछ किया जाए खासकर महिलाओं के लिए जिससे वो अपनी जरूरत पूरी कर सकें और किसी पर निर्भर ना रहें. बताते चलें कि बिजनेसमैन अनिल शर्मा की पत्नी अलका शर्मा यूपी के बागपत की रहने वाली हैं.

आपको बता दें कि इस पहल की शुरूआत ऐसे हुई कि साल 2018 में बिजनेसमैन अनीश शर्मा ने बागपत में अपने ससुराल पक्ष से किराए पर जमीन ली और तय किया कि वो वर्मी कंपोस्ट का काम करेंगे. उन्होंने बताया कि इसके बाद हमने वर्मी कंपोस्ट की पूरी प्रोसेस समझी. हमें पता चला कि इस प्रोसेस के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है वो गांव में आसानी से मिल जाएगी और इससे गांव की महिलाओं की भी आमदनी होगी. सिलसिला आगे बढ़ता गया और अनीश ने गांव के कुछ लोगों को वर्मी कंपोस्ट तैयार करना सिखाया फिर वे गांव की महिलाओं से ही गोबर खरीद कर खाद तैयार करने लगे. धीरे-धीरे जो भी खाद निकलता वे ऑनलाइन उसकी मार्केटिंग करने लगे. थोड़े दिनों बाद रिस्पॉन्स भी अच्छा मिलने लगा और आमदनी होने लगी.


बताते चलें कि कोरोना काल में इससे काफी मदद मिली. अनीश और उनकी पत्नी अलका शर्मा ने इस बारे में और सोचा. इस दौरान दोनों की मुलाकात वकील पूजा पुरी से हुई. फिर तीनों ने मिलकर विचार-विमर्श किया और पीकेयू केयर फाउंडेशन (PKU) नाम से एक एनजीओ (NGO) रजिस्टर किया. दरअसल, गांव में गोबर की उपलब्धता भरपूर थी और ईकोफ्रेंडली प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ रही थी, इस बात को ध्यान में रखते हुए इन लोगों ने गांव की महिलाओं को गोबर से दीया और गमले बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया. धीरे-धीरे ये कार्य बढ़ता गया और मुनाफा होता गया. आपको बता दें कि पहले गांव की महिलाओं के पास आमदनी का कोई सहारा नहीं था लेकिन अनीश शर्मा के मुताबिक, अब महिलाएं करीब 5 से 6 हजार रूपए हर महीने निकाल लेती हैं. वहीं, अनीश शर्मा इसके अलावा भी कई सारे सोशल वर्क कर लोगों का सहारा बनते हैं.

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