उत्तर प्रदेश में चौक चौराहों पर लगाए गए दं’गाइ’यों के पोस्टर विवाद में नया मोड़ आ गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को पोस्टर उतारने का आदेश दिया तो सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए मामले को बड़ी बेंच में ट्रांसफर कर दिया तो योगी सरकार ने सार्वजनिक और सरकारी संपत्ति को हुए नु’कसा’न की भरपाई के लिए एक नया अध्यादेश ही पारित कर दिया.

योगी सरकार उपद्रवियों पर कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एण्ड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश-2020 लेकर आई, इस अध्यादेश को कैबिनेट से मंजूरी भी मिल गई. इस अध्यादेश के तहत आंदोलनों-प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नु’कसा’न पहुंचाने पर दो’षि’यों से वसूली भी होगी और उनके पोस्टर भी लगाए जाएंगे.

हालाँकि अभी इस अध्यादेश में नियमावली तय होनी बाकी है लेकिन योगी सरकार ने तय कर लिया है कि नुक’सान की भरपाई तो उ’पद्र’वियों से ही की जाएगी. इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि इस अध्यादेश में हिं’सा, उ’पद्र’व और तो’ड़फो’ड़ के मामलों के आरोपियों की तस्वीरें और जानकारी वाले पोस्टर लगाने का प्रावधान शामिल होगा. सरकारी सूत्रों के अनुसार, इसमें डीएम को कार्रवाई की अथॉरिटी भी दी जा रही है.

ये अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के 2007 के उस आदेश के तहत लाया गया है जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक जुलूसों, अवैध प्रदर्शनों, हड़तालों, बंद, आंदोलनों में सार्वजनिक और निजी संपत्ति को उ’पद्र’वी नुक’सान पहुंचाते हैं. इसे रोकने के लिए लिए कड़ा कानून बनाए जाने की जरूरत है. यूपी सरकार ने 27 उ’पद्रवि’यों के खिलाफ गैं’गस्ट’र एक्ट लगाया है.