“मुझे इस्लाम से नफरत है, काश में बुर्क़े की तरह इस्लामियों को भी जला सकती” – ISIS से भागी लड़की

822

“काश में आईएस को यहाँ ला पाती और ऐसे ही जला पाती जैसे मैंने अपने बुर्कों को जलाया है”

यह कहना था उन यजीदी लड़कियों में से एक का जो आईएसआईएस की सालाखों को तोड़ पिछले हफ्ते भाग आई.. यह वो लड़कियां हैं जिन्हें इस्लामिक स्टेट के आतंकी सेक्स स्लेव बना कर रखते थे.. आईएसआईएस से आज़ाद होने के बाद सबसे पहले इन लड़कियों ने वो बुर्क़े जलाये जो इस्लामिक संगठन के आतंकी उन्हें पहनने के लिए विवश करते थे,

इस ‘हिंसक’ उद्गार के पीछे है अपमान और प्रताड़ना की वो दास्ताँ जहाँ इन यज़ीदी युवतियों को एक ओर रेगिस्तानी रातों में नंगा कर रात भर उनके साथ हिंसक-से-हिंसक तरीकों से बलात्कार किया जाता था। वहीं दूसरी ओर दिन की चिलचिलाती गर्मी में, भीषण-से-भीषण उमस में, बुरखे के पीछे कर दिया जाता था। बुरखा उतारने देने के लिए जब वह मिन्नतें करतीं थीं, गिड़गिड़ाती थीं कि इसके अन्दर से साँस नहीं ली जा रही, तो उन्हें कहा जाता था कि बाकी सब औरतें कैसे कर ले रहीं हैं।
एक ओर अपना मन भर जाने पर आइएस लड़ाके सेक्स-गुलामों की अदला-बदली कर लेते थे, और दूसरी ओर जब तक वह लड़की/औरत उनकी प्रॉपर्टी रहती थी, उसके चेहरे पर अपने ही साथियों की नज़र भर पड़ जाना नागवार था।

अपना बुरखा उतार कर जलाते हुए इस युवती के चेहरे पर जो राहत दिख रही है, वह इंसानी सभ्यता के लिए शर्मिंदगी का सबब है।

yazidi girls

इन महिलाओं, और इनके निर्ममता से क़त्ल कर दिए गए भाईयों, पिताओं, बेटों का गुनाह केवल इतना था कि वह उन यज़ीदी आबादी  में पैदा हुए थे जिन्हें सलाफ़ी-वहाबी इस्लाम शैतान के पुजारी और “काबिल-ए-क़त्ल” मानता है। आइएस के कट्टरपंथियों का मानना है कि उन्हें पूरी आज़ादी है यज़ीदी लोगों के साथ हत्या, बलात्कार, शोषण, और अत्याचार करने की क्योंकि यज़ीदी शैतान के पुजारी माने जाते हैं।

यहाँ आप पहले यह जान लीजिये कि यजीदी आखिर होते कौन हैं?

यज़ीदी या येज़ीदी  एक धर्म है जिसमें वह पारसी धर्म , इस्लामी सूफ़ी मान्यताओं और ईसाई मूल्यों तीनों के कुछ कुछ मान्यताओं का पालन करते हैं, अधिकतर यज़ीदी लोग पश्चिमोत्तरी इराक़ के नीनवा प्रान्त में बसते हैं, विशेषकर इसके सिंजार क्षेत्र में।

इसके अलावा यज़ीदी समुदा दक्षिणी कॉकसआर्मेनियातुर्की और सीरिया में भी मिलते हैं।

इस्लाम के हाथों यज़ीदी आज से नहीं, सदियों से कुचले जाते रहे हैं- और हर बार मज़हबी कारणों से ही, कभी इनका सामूहिक नरसंहार होता है.. कभी गाँव के गाँव जला दिए जाते है… यह लोग किस कदर कट्टर हैं इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यह यजीदियों को ढूंढ ढूंढ कर मौत के घात उतारते हैं, यजीदियों को कहा जाता है कि या तो जिहादीयों में शामिल हो जाए नहीं तो मर जाये…

जवान यजीदी मर्दों और वृद्धों का क़त्ल करने के बाद उन्हें सामूहिक कब्रों में दफना दिया जाता है

बचे हुए यज़ीदियों को तीन हिस्सों में बाँट दिया जाता है, छोटे बच्चों को $500 में संतानहीन दम्पतियों को बेच दिया जाता है ताकि वे मुसलमानी परवरिश में ही पलें-बढ़ें, उनसे थोड़े बड़े लड़कों को जिहादी लड़ाके बनने की ट्रेनिंग लेने भेज दिया जाता है… जो लड़ाके बनने में शारीरिक रूप से अक्षम पाए गए, उन्हें घरेलू नौकरों के तौर पर बेच दिया जाता है, अब बचीं किशोरियाँ और युवतियाँ। इनकी बाकायदा मंडी लगती है और खरीददारों द्वारा बोली लगती है और इन्हें बेच दिया जाता है

आइएस एक डिजिटल मैगज़ीन निकालता है- Dabiq, अक्टूबर, 2014 के अपने अंक में आइएस ने साफ़-साफ़ कहा कि उसके इस भयावह कृत्य को शरिया यानि इस्लामी क़ानून का पूरा समर्थन है। वहाँ कहा गया है कि हज़रत मुहम्मद के साथी जीती हुई युद्धबंदी औरतों/लड़कियों को सेक्स-स्लेव के तौर पर बाँटते थे।

आईएस का यह नंगा नाच सीरिया से लेकर इराक तक चल चुका है.. गनीमत है कि आज यह संगठन मात्र एक कसबे तक सीमित रह गया है, मगर यह संगठन उस जहरीली जड़ का ही फल है जो कश्मीर, कन्नूर से लेकर नाइजीरिया तक फैली हुई है.. जल्द ही इस जड़ को उखाड़ नहीं फेंका गया तो कल इसी पेड़ से ऐसा फल उगेगा कि आतंकवाद और जिहाद हर तरफ फैल चुका होगा.. इसका यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है क्राइस्ट चर्च के पागल हमलावर की तरह हर मुस्लमान को गोली मारने शुरू कर दी जाये.. पर इसका ये अर्थ जरूर है कि इस्लामी किताबों के उन हिस्सों का बहिष्कार किया जाये जिनमें अल्लाह को ना मानने गैर इस्लामी लोगों को हराम और काबिल ए क़त्ल घोषित कर दिया जाता है…

जब तक इनकी आस्था में से हिंसा और जहर खत्म नही किया जायेगा तब तक आईएस जैसे संगठन दर्जनों के भाव में आते रहेंगे और नफरत फैलाते रहेंगे