पाकिस्तान में औरतों की हालत जानकर हैरान रह जाएंगे आप

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बहू पेट से है, जांच करवा ले क्या है? बेटा पैदा कर खानदान को आगे भी बढ़ाएगी या सिर्फ बेटियाँ पैदा कर बोझ ही बढ़ाती रहेगी?”

अभी दो से तीन दशक पहले तक घर की बड़ी- बूढ़ी औरतों के मुंह ये दो सेंटेंस ना चाहते हुए भी सुनाई दे ही जाते थे, और  अपने अन्दर से  समाज का नंगा सच हमारे सामने उगल जाते थे. इस तरह के सेंटेंस समाज का मीटर होते हैं. ऐसे मीटर जो हमें ये बताते हैं कि हमारे समाज में महिलाओं की जगह क्या है.

पिछले दो तीन दशकों में पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति काफी सुधरी है. वो महिलायें जिन्हें अब “आधी आबादी” कहा जाता है, कुछ सालों पहले तक उन्हें कभी पढ़ने के लिए लड़ना हुआ, तो कभी इज्ज़त के लिए, कभी वो अपनी पसंद के कपड़े पहनने के लिए प्रताड़ित हुईं, तो कभी दहेज़ के लिए.

और ये सिर्फ हमारे देश भारत की ही हालत नहीं थी, सिर्फ एशिया की ही हालत नहीं थी, बल्कि लगभग पूरी दुनिया का यही हाल था. हर जगह महिलाओं की स्थिति तभी सुधरी जब महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया, और अपने हक़ के लिए आन्दोलन शुरू किये.

महिलाओं को समानता के अधिकार मिलने चाहिये

ये बात अप सभी ने कभी ना कभी ज़रूर सुनी होगी. कई बार तो दिन में कई- कई बार सुनी होगी, महिलाओं की हालत में आज बहुत हद तक सुधार भी हुआ है, लेकिन सच यही है कि दुनिया के बहुत से देशों में उनकी हालत आज भी बहुत अच्छी नहीं है.

कोई समाज का ठेकेदार अंतर्राष्ट्रीय मंच से उनके अधिकारों के लिए चीखा तो कोई कस्बाई. लेकिन फिर भी महिलाओं को समाज की मुख्य धारा तक आने में एक लंबा वक़्त लग गया, बहुत लंबा वक़्त. बहुत से देश अब भी ऐसे बचे हुए हैं जहां महिलाओं के संघर्ष का ये सफ़र अब भी जारी है.

दुनिया का हर देश महिलाओं के अधिकारों की बात तो कर रहा है, लेकिन जेंडर इक्वलिटी की तरफ बढ़ रही महिलाओं की रफ़्तार आज भी बहुत धीमी है. और ऐसा हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं बल्कि वर्ल्ड  बैंक की तरफ से हाल ही में आई एक रिपोर्ट कह रही है.

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ‘Women, Business and the Law 2019’ की मानें तो दुनिया जिस रफ़्तार से जेंडर इक्वलिटी की तरफ बढ़ रही है वो रफ्तार बहुत धीमी है. और अगर रफ़्तार यही रही तो  अगले 50 सालों में भी महिलाएँ पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकेंगी.

ये रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के बस 6 ही ऐसे देश हैं जहां महिलाओं को सही मायनों में पुरुषों के बराबर अधिकार मिले हुए हैं. इन देशों के नाम हैं बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, लातविया, लक्समबर्ग और स्वीडन.

इक्वलिटी के मामले में मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के सब- सहारा देश दुनिया में सबसे नीचे हैं. इन जगहों पर महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधे अधिकार भी नहीं मिले हुए हैं. ये रिपोर्ट बताती है कि बिज़नस और करियर की दौड़ में औरतें किस तरह से किन- किन चुनौतियों का सामना करती हैं.

बहुत सी औरतों से जब आज भी जब बोलने की आज़ादी, जीवनसाथी चुनने की आज़ादी, अपने मनपसंद कपड़े पहनने की आज़ादी, बच्चे पैदा करने की आज़ादी जैसे कुछ निजी सवाल किये जाते हैं तो वो चुप्पी साध लेती हैं. उनसे जब  पुरुषों की तरह घर से बाहर निकलने की बात पूछी जाती है तो उनकी आवाज़ नहीं निकलती. बहुत सी महिलाओं को तो आजतक यह भी नहीं पता कि उनकी रक्षा करने के लिए कौन- कौन से क़ानून बने हैं.

और यही वज़ह है कि शोषण और प्रताड़ना झेल रही ये महिलायें क़ानून के दरवाज़े तक पहुँचती ही नहीं. बहुत सी घटनाओं में वो घरों में कैद रहती हैं, छोटी- छोटी गलतियों पर  मार खाती हैं, और बच्चे पैदा करने की मशीन बनकर जीती रहती हैं.

जब कभी बराबरी की बात होती है तो हम सबसे पहले यही सोचते हैं कि फलां देश विकसित है, वहाँ की औरतें तो पुरुषों की बराबरी करती ही होंगी, लेकिन ये बात पूरी तरह गलत है.

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और यूके जैसे देशों में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिले हुए हैं. यहाँ तक कि अमेरिका तो लैंगिक समानता के मामले में टॉप 50 देशों में भी शामिल नहीं है. वो लोग जो खुद ही महिलाओं को सामान अधिकार देने की बात करते हैं, वो लोग खुद ही माँ बन चुकी महिलाओं को काम से हटाने की बात को भी मानते हैं. वो सोचते हैं कि माँ बनने के बाद महिलाएं काम में अपना 100 परसेंट नहीं दे पाती हैं.

दुनिया भर के मुस्लिम देशों में महिलाओं की हालत बहुत खराब है. यूनाइटेड अरब अमीरात, ईरान, सीरिया, ईराक, लीबिया, ओमान, ट्यूनीशिया, अरब और पाकिस्तान जैसे देशों में महिलाओं की हालत बहुत खराब है.

भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान सबसे निचले पायदान पर खड़ा है. विश्व बैंक की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि  पाकिस्तान, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के सब-सहारा रीज़न से भी पीछे है.

इस रिपोर्ट से हटकर अगर कुछ और आंकड़े भी उठायें तो हमें पता चलता है कि पाकिस्तान में महिलाओं को क़िस तरह से ट्रीट किया जाता है.

तुम घर की आबरू हो बेटी, बाहर निकलोगी, नौकरी करोगी तो ज़माना क्या कहेगा, मान जाओ.”

तुम कमज़ोर हो, नौकरी रोजगार करना जानना का काम नहीं है, तुम नहीं कर  पाओगी, और फिर औलादें भी तो हैं, इनको कौन देखेगा?”

अक्सर महिलायें इन बातों को सुनकर मान ही जाती हैं. अपने हक़ की बात नहीं करती. घर में बंद होकर रह जाती हैं. इच्छाओं को मार देती हैं. मार देती हैं उन सभी सपनों को जो उसने अपने लिए देखे थे. रह जाती है चौका- चूल्हा, बर्तन- पानी तक बंधकर. और जो ऐसा नहीं करतीं, उनके लिए घरेलू हिंसा नाम का दूसरा हथियार है ना. पाकिस्तान इस तरह के मामलों में शिखर पर बैठा हुआ है.

लेकिन याद रहे साहब ये सब आपकी मर्दानगी को साबित नहीं करता, क्योंकि आप उसे दबा रहे हो, उसे मार रहे हो, उसे कुचल रहे हो जो पहले से कुचला हुआ है. समझौते तो उस औरत ने तभी से सीख लिए थे जब उसने पहली बार अपनी थाली से अपनी पसंदीदा चीज को अपने छोटे भाई के साथ बांटा था. सपनों को मार देना तो उसने तभी से सीख लिया था जब आपने सिर्फ उसके भाई का नाम स्कूल में लिखाया था, और उसे बर्तन कैसे मांजे जाते हैं ये सिखाया था.

वो जब आपने त्यौहार पर उसे नए कपड़े ना दिलाकर सिर्फ अपने बेटे को कपड़े दिलाये थे, तब उसने जिद नहीं की थी, ये शुरुआत थी इस बात की कि उसे फर्क पड़ना बंद हो गया है. औरत ना, समझौते का नाम है साहब, उसके साथ ज्यादती कर के, उसे दबाकर आप मर्द तो नहीं हो सकते.

कुछ करना ही है तो उसको चोट पहुंचाता हाथ बनने की जगह उसका हाथ थाम, उसे सहारा देता हाथ बनिए. बचपन से ही उसके नन्हे हाथों में बर्तन मांजने का जूना पकड़ाने की जगह उसके हाथों में पेंसिल पकड़ा कर देखिये एक बार, दावा है  फिर आपको बार- बार उसे परिवार की इज्ज़त की दुहाई नहीं देनी पड़ेगी. वो खुद आपके परिवार की इज्ज़त बन जायेगी.

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