पीयूष गोयल से जुडी ये बाते उन्हें दूसरो से अलग बनाती है

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सादगी,मधुर व्यवहार और देश के लिए निष्ठा से काम करने का जज्बा उसकी पहचान बन चुकी है।

घण्टो लगातार काम करने के बावजूद उनका हंसता हुआ चेहरा साथ काम करने वाले लोगो मे एक नई ऊर्जा भरता है।

सही समय पर कठोर फैसले लेने से भी ना चूकने की क्षमता उनको दूसरे लीडर से थोड़ा सा अलग बनाती है.

एक बार जब वो चला तो उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा और तरक्की पाता चला गया।

जी हाँ हम बात कर रहे है रेल मंत्री पीयूष गोयल की, वही पीयूष गोयल जिनके काम पर भरोसा करके उन्हें अरुण जेटली की एप्सेन्ट में वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा दिया गया है।


13 जून 1964 को मुम्बई में पैदा हुए शुरू से ही पढाई में तेज़ रहे और यही वजह थी कि सीए में उन्होने पूरे भारत मे दूसरा नंबर हासिल करके रिकॉर्ड बना दिया था। उनके पिता वेद प्रकाश गोयल बाजपेई सरकार में  मंत्री रहे थे। कानून की पढाई भी करने वाले गोयल ने 1984 भाजपा जॉइन की और धीरे धीरे उन्हें जिम्मेदारियां भी सौंपी जाने लगी।  2010 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया और उसी साल वो राज्यसभा के सांसद भी चुन लिए गए।

भारतीय युवा मोर्चा के सदस्य से शुरू हुआ उनका सफर लगातार आगे बढ़ता रहा और उन्हें जो जिम्मेदारी मिलती गई वो उसको पूरी शिद्दत से निभाते गए। पीयूष के काम का डंका बजने लगा और 27 मई 2014 में उन्हें मोदी सरकार में विधुत और कोयला मंत्री चुन लिया गया।

जब उन्हें ये पद मिला तो उनके सामने बड़ी चुनौतियां मुँह बाय खड़ी थी क्योकि भारत के 18 हजार 500 ऐसे गांव थे जहां तक कभी बिजली ही नही पहुँची थी। सरकार ने 1 हजार दिन में भारत को रौशन करने की बात तो कह दी लेकिन इतने समय मे ऐसा करना काफी मुश्किल था क्योकि इसके लिए बहुत ज्यादा व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ती लेकिन पीयूष गोयल की दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत तय समय से पहले ही गांवों तक बिजली पहुचाँ दी गई और 28 अप्रैल 2017 तक देश का प्रत्येक गांव रौशन हो गया। इसके लिए बाकायदा उन्हें पेंसिल्वेनिया विश्विद्यालय ने सम्मानित भी किया था।

पीयूष गोयल ने बिजली के घण्टो में भी सुधार करने के लिए कई परियोजनाओं को शुरू किया और  यही वजह है कि आज गांवों में 18-19 घण्टे और शहरों में 23 -24 घण्टे तक बिजली आने लगी। इन सबके बाद केंद्र सरकार का पीयूष पर भरोसा बढ़ा और पीयूष गोयल को रेल मिनिस्ट्री जैसा बड़ा पद सौंप दिया गया । जहाँ पीयूष ने सुरेश प्रभु के नक्शेकदम पर चलते रेलवे को नई दशा-दिशा दे दी। रेलवे में उपयुक्त सुधार होने लगे। सिग्नल लाइनों का दोहरीकरण होने लगा।गोयल की अगुवाई में पैसेंजर ( यात्री) के समय की कीमत को समझते हुए रेलवे में सेमी बुलेट ट्रेन चलाने का रास्ता साफ हो गया, मेक इन इंडिया के तहत बनी  “18 ट्रेन” 160 से ज्यादा किलोमीटर की स्पीड से चलने वाली पहली ट्रेन बन गई। यात्रियों के एक फोन से अब सभी समस्याएं सॉल्व होने लगी। वाकई ये सब करना हर किसी के बस की बात नही होता। उनके काम करने का अंदाज बिल्कुल जुड़ा है शायद यही वजह है कि वो खुद नरेंद्र मोदी के फ़ेवरेट माने जाते है।

अब अगर अरुण जेटली की अनुपस्थिति में उन्हें वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है तो उम्मीद इसमें भी अच्छा करेंगे और देश हित को तवज्जो देते हुए कुछ अच्छे फैसलों के जरिए देश की इकॉनमी को बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे।