क्यों नेहरु ने ठुकरा दी थी यूनाइटेड नेशंस कि परमानेंट सीट?

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एक बड़ी खबर आ रही है कि चीन ने एक बार फिर आतंकी मसूद अजहर को यूनाइटेड नेशंस में संरक्षण देने का काम किया है. इसके पहले चीन 2009, 2016, 2017 में भी मसूद अजहर को यु एन में बचा चुका है. दरअसल चीन यु एन सिक्यूरिटी काउंसिल का परमानेंट मेम्बर यानी स्थायी सदस्य है. यूनाइटेड नेशंस एक ऐसी संस्था है जहाँ अगर परमानेंट मेम्बर चाहे तो कोई भी रेसोलुशन को अपनी विशेष ताकत यानी वीटो के ज़रिये आसानी से रोक सकता है. यु एन चार्टर के अनुच्छेद 27 में वीटो पॉवर का प्रावधान है जहाँ पांच परमानेंट मेम्बर में से कोई एक परमानेंट मेम्बर भी अगर किसी रेसोलुश्न के खिलाफ वोट दे दें तो वो रेसोलुशन पास नहीं होता. इस मामले में भी यही हुआ है.

इसके बाद विपक्षी दल इसे केंद्र सरकार कि कूटनीतिक विफलता बता रहे हैं. लेकिन दोस्तों क्या आपको पता है कि भारत को भी यूनाइटेड नेशंस की परमानेंट सीट ऑफर की गयी थी वो भी दो बार. लेकिन हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने ये सीट लेने से साफ़ मना कर दिया था. इतना ही नहीं नेहरु ने ठान ली थी कि भारत के बजाये यु एन कि परमानेंट सीट चीन को मिले. पता नहीं क्या सोच के नेहरु ने ऐसा कदम उठाया था. नेहरु के उस फैसले का परिणाम है कि भारत कि पूरी कोशिशों के बाद भी चीन आज आसानी से मसूद अजहर को बचा लेता है और पाकिस्तान का समर्थन करता है.

आइये आपको 1950 में लेकर चलते हैं. आपको बताते हैं कि कैसे भारत को नेहरु ने यूनाइटेड नेशंस कि परमानेंट सीट मिलने से वंचित कर दिया था.

1955 में शीत युद्ध अपने चरम पर था और यु एन ने अपनी शुरुआत चार परमानेंट मेम्बेर्स अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ की. ये वही देश थे जो द्वितीय विश्व युद्ध में जीते थे. भारत को भी यु एन में परमानेंट सीट मिलनी चाहिए थी क्योंकि भारत ने, चीन से कई ज्यादा, इन चार देशों को विश्व युद्ध जीतने में अपने बीस लाख सैनिकों और अन्य संसाधनों से मदद की थी.

लेकिन जब यु एन अस्तित्व में आया तब भारत आज़ाद नहीं हुआ था. तभी भारत को आज़ादी मिलते ही भारत को यु एन की परमानेंट सीट का ऑफर दिया गया. ये ऑफर स्वाभाविक इसलिए भी था क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता था कि यु एन का परमानेंट मेम्बर चीन बने क्योंकि चीन एक कम्युनिस्ट यानी साम्यवादी देश था.

इसके चलते तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने चीन के बजाये भारत को यु एन कि परमानेंट सीट का ऑफर दिया. 2 अगस्त 1955 को नेहरु ने एक पत्र मुख्यमंत्रियों को लिखा था जिसमें वो साफ़ तौर पर लिखा कि भारत को यु एन की परमानेंट सीट के लिए अमेरिका द्वारा इनफॉर्मल ऑफर दिया गया था. इसके आगे नेहरु लिखते हैं कि, “भारत ऐसा ऑफर कभी स्वीकार नहीं करेगा”. अगर भारत ने ऐसा किया तो ये एक महान देश चीन के साथ अन्याय होगा. दोस्तों इस पत्र को आप ऑनलाइन भी देख सकते हैं ये ख़त ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस की जवाहर लाल नेहरुस “लेटर्स टू द चीफ मिनिस्टर्स वॉल्यूम 4 के पेज नंबर 237 पर उपलब्ध है.

नेहरु कि इस गलती के चलते भारत को बहुत नुकसान हुआ. इतना नुकसान कि इसका हम आकलन भी नहीं कर सकते. सबसे पहले यु एन सिक्यूरिटी काउंसिल का परमानेंट मेम्बर होना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है. विश्व स्तर के बड़े बड़े फैसले जैसे कि जम्मू कश्मीर का मुद्दा, पाकिस्तान को एक आतंकवाद समर्थक देश घोषित करने का फैसला और ऐसे तमाम फैसलों में पूरी दुनिया इन पांच परमानेंट मेंबर्स कि तरफ ही देखती है. क्योंकि अंत में यही पांच देश है जो किसी रेसोलुशन को पास कर सकते हैं या रोक सकते हैं. मसूद अजहर के किस्से से आप ये बात समझ ही चुके होंगे.

दूसरा और सबसे अहम, नेहरु द्वारा यु एन कि परमानेंट सीट को ठुकरा देने के बाद हमने चीन को अपने से ज्यादा ताकतवर बना लिया. इसके बाद चीन ने भारत के अक्साई चिन पर, जो कि जम्मू कश्मीर में है, कब्ज़ा कर लिया और 1962 में भारत के ऊपर आक्रमण कर दिया. इतना ही नहीं चीन हर चाल ऐसी चलता है जिससे भारत को नुकसान हो. कभी वो पाकिस्तान को नुक्लेअर बम बनाने में मदद करता है तो कभी भारत को Nuclear Supply Group में आने से रोक देता है. अगर भारत Nuclear Supply Group का मेम्बर बन जाये तो भारत को नई से नई तकनीकी अलग अलग क्षेत्रों में मिल सकती है और भारत कि ऊर्जा समस्या भी हल हो सकती है.

आप खुद सोचिये अगर भारत यु एन सिक्यूरिटी काउंसिल का परमानेंट मेम्बर होता तो क्या चीन भारत के खिलाफ इतने षड्यंत्र करता? यहाँ तक कि कश्मीर समस्या का भी हल आसानी से हो गया होता क्योंकि आज चीन को छोड़ के बाकी चार यु एन के परमानेंट मेम्बर (जैसे कि रूस, अमेरिका, फ्रांस और यु के) के भारत के साथ बहुत गहरे सम्बन्ध है और इन सभी देशों ने मसूद अजहर के मामले में भारत के पक्ष में ही वोट दिया है. अगर भारत यु एन का परमानेंट मेम्बर होता तो चीन ज़रूर भारत से अच्छे सम्बन्ध बनाने कि कोशिश करता. क्योंकि अगर आप ताकतवर होते हैं तो दुश्मन आपसे पंगा लेने से पहले हज़ार बार सोचता है.

लेकिन अगले ही महीने नेहरु ने भारत कि संसद में ये कह दिया कि उन्हें कोई ठोस ऑफर अमेरिका कि तरफ से नहीं मिला है. अब आप खुद सोचिये कि नेहरु जी ने जो बात खुद एक पत्र के ज़रिये मुख्यमंत्रियों को बताई थी वो सच है या उनके ही द्वारा दिया गया संसद का बयान.

शायद नेहरु अपनी नॉन एलाइनमेंट मूवमेंट कि जिद के चक्कर में देश हित ही भूल गये थे. नेहरु का नॉन एलाइनमेंट मूवमेंट आज किसी काम का नहीं है लेकिन यु एन कि परमानेंट सीट भारत के लिए तब भी बहुत ज़रूरी थी और आज तो ये सीट सबसे ज्यादा ज़रूरी है.

विजयलक्ष्मी पंडित जो कि नेहरु कि बहन थी उन्होंने अगस्त 1950 में ही नेहरु को एक ख़त के ज़रिये बताया था कि अमेरिका चीन के बजाये भारत को यु एन कि परमानेंट सीट दिलवाने के लिए मदद करना चाहता है. एक हफ्ते बाद नेहरु ख़त का जवाब देते हैं. और जवाब ऐसा है जिसे सुन कर आप हैरान हो जायेंगे. नेहरु साफ़ साफ़ इस ऑफर को ठुकरा देते है. वे कहते हैं कि ऐसा करना बहुत बुरा होगा और ये भारत और चीन के संबंध पर बुरा असर डालेगा. और चीन इससे बहुत नाराज़ भी हो होगा. इसीलिए हम पूरी कोशिश करेंगे कि चीन को यु एन परमानेंट सीट हर हाल में मिले.

इसी दिशा में नेहरु आगे चलकर हिंदी चीनी भाई भाई का नारा भी देते हैं लेकिन इसका जवाब चीन 1962 में भारत पर आक्रमण करके देता है.

इसके बाद 2004 में वर्तमान में कांग्रेस एम पी शशि थरूर एक किताब, “नेहरु- द इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया” लिखते हैं. उन्होंने अपनी किताब में और दस जनवरी 2004 में द हिन्दू को दिए एक इंटरव्यू में साफ़ कहा कि, “अमेरिका ने भारत को यु एन परमानेंट सीट का ऑफर दिया था लेकिन नेहरु ने ये ऑफर 1953 में ठुकरा दिया. नेहरु ने उल्टा ये सुझाव दिया कि ये सीट चीन को मिलनी चाहिए.”

11 मार्च 2015 को एंटन हार्डर, जो कि नाटिंघम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर है और एक विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार हैं, उन्होंने एक रिपोर्ट “not at the cost of China” विल्सन सेंटर के लिए लिखी थी. इस रिपोर्ट में भी हार्डर सबूत देते हैं कि अगस्त 1950 में अमेरिका भारत को यु एन परमानेंट सीट दिलाने के लिए मदद करना चाहता था. हार्डर आगे लिखते हैं कि नेहरु चीन को परमानेंट सीट देकर इंटरनेशनल टेंशन को कम करना चाहते थे. ये तर्क तो वाकई किसी आम आदमी को भी समझ नहीं आएगा. दूसरे देश को खुश करने के लिए आखिर कोई प्रधानमंत्री अपने देश का नुकसान कैसे कर सकता है?

कांग्रेस पार्टी के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि वो इतिहास पढ़े. उन्हीं के नेताओं ने माना है कि कैसे नेहरु ने भारत का इतना बड़ा नुकसान करवा दिया. अगर आज चीन के बजाये भारत के पास यु एन कि परमानेंट सीट होती तो बहुत पहले ही मसूद अजहर को इंटरनेशनल टेररिस्ट घोषित कर दिया जाता.

इन सब तथ्यों के बीच आपको एक बात पता होनी चाहिए. मसूद अजहर के मामले में यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी काउंसिल के 15 मेम्बेर्स में से 13 मेम्बेर्स ने भारत का समर्थन किया है और भारत को ऐसा समर्थन यु एन में आज से पहले भारत को कभी नहीं मिला है.तो चीन के इस कदम के बाद अब भारत को समझ आ जाना चाहिए कि पाकिस्तान के साथ भारत का असली दुश्मन देश कौन है