क्या है RTI संशोधन बिल और विपक्ष क्यों कर रहा है इसका विरोध?

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सोमवार को लोकसभा में सूचना का अधिकार विधेयक को पारित करते वक्त काफी शोर-शराबे और हंगामा हुआ. विपक्षी पार्टियों का मानना था कि इस कानून में किए गए बदलावों के कारण ये कमजोर हो जाएगा. ये बात कहते हुए कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ विरोध कर रही है.

विपक्ष की मांग थी कि इस संशोधन विधेयक को पहले संसद की सलेक्ट कमेटी को भेजा जाए और वहां पर इसकी जांच हो. फिलहाल विपक्ष इसे आगे राज्यसभा में रोकने का निर्णय ले चुकी है, जहां पर सत्ताधारी BJP या उनके अलाइंस NDA अभी भी बहुमत संख्या से कम है. सोमवार के बाद से इस बिल में लाये गए बदलावों को लेकर चर्चाएं बढ़ गयी हैं.ये बात जननी जरूरी है कि इन बदलावों पर क्यों इतना हो-हल्ला क्यों मच रहा है.

जहां तक बिल में किये गए बदलावों की बात है तो हम आपको इस बिल में किये गए शंशोधन से जुड़े मुख्य बातों के बारे में बताते हैं.

पहला: आरटीआई एक्ट को 2005 में लाया गया था, इस एक्ट ने भारतीय नागरिकों को किसी भी मामले में, सरकारी संस्थानों से जुड़ी जानकारी मांगने और उससे जुड़ी जानकारी 30 दिनों के अंदर पाने का हक़ दिया है. विपक्ष कह रहा है कि ये दो बहुत महत्वपूर्ण नियम हैं और इनमे कोई भी बदलाव किए जाने से, बिल का प्रभाव कम हो जाएगा.

दूसरा: प्रस्तावित बदलाव में आरटीआई एक्ट के section13 में बदलाव किया जाना है. इसके बाद सरकार अपनी जरूरत के मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल में बदलाव कर सकेगी. इसके अलावा किये जाने वाले बदलावों में उनकी सैलरी, भत्ते और कुछ दूसरे मुद्दे भी शामिल है जिनको इस बिल के पारित होने के बाद सरकार को इसे नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाएगा.

तीसरा: अब इस बिल के RTI एक्ट सेक्शन 16 में ऐसे ही बदलाव को राज्य स्तर पर लाने की बात भी आगे बढ़ाई जा रही है.

चौथा: विपक्षी पार्टियों ने ये दलील दी है कि सरकार अगर इन अधिकारियों की नौकरी और सैलरी पर नियंत्रण हासिल कर लेगी तो RTI अधिकारियों की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी. विपक्ष ने इस संशोधन को RTI हटाओ बिल का नाम दिया है. उनका दावा है कि इससे ईमानदार अफसर भी किसी संवेदनशील जानकारी को जारी करना बंद कर देंगे क्योंकि उन्हें डर रहेगा कि ऐसा करने से उनकी नौकरी और उनकी सैलरी खतरे में आ सकती है.

पांचवा: सरकार का कहना है कि मनमोहन सिंह सरकार ने जल्दी-जल्दी में इस कानून को बना दिया था और उन्होंने कई सारे गंभीर मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया. सरकार के ये बदलाव इन्हीं गलतियों को सुधारने की ओर एक पहल हैं. सरकार ने कुछ और गलतियों का हवाला भी दिया, जैसे कि केंद्रीय सूचना आयुक्त की शक्तियों को लोअर कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, जबकि इसका स्तर सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर माना जाता है. ऐसी चीजों को भी बदलाव में शामिल किया गया है. सरकार ने कहा कि वो इस एक्ट की बेहतरी और मजबूती के लिए ही इस बिल में तब्दीली कर रही है. इसके लिए वो हर मुद्दे की बारिकी से जांच कर रहे हैं, ताकि ये इसे और बेहतरी की ओर ले जा सके.