श्यामाप्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि मनाने पर क्यों मजबूर हुई ममता बनर्जी?

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बंगाल में लोकसभा चुनाव के पहले से ही खूनी हिंसा देखने को मिल रही हैं. राजनीतिक हिंसा के चलते पश्चिम बंगाल में कई बार तनाव की स्थिति पैदा हो गयी. अभी तक कई लोग अपनी जान गवां चुके हैं जिससे लोगों खासी नाराजगी हैं और ममता बनर्जी से नाराज होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढती जा रही हैं. इन सबसे अब ममता बनर्जी को भी परेशानी हो रही हैं. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं. और ऐसे में ममता बनर्जी बंगाल में चल रही राजनीतिक विवाद को शांत कर लोगों को ध्यान अब इससे हटाना चाहती हैं और अभी से ही वे इसपर काम कर रही हैं. दरअसल डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि (23 जून) को ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल राज्य सरकार द्वारा मनाए जाने की घोषणा हुई है। अभी तक हिन्दू राष्ट्रवादी होने के चलते वह ‘सेक्युलर’ पार्टियों द्वारा हाशिए पर खिसका दिए गए थे।

ममता बनर्जी सरकार का श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पुण्यतिथि को मनाने का फैसला उस समय आया है, जब पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी लगातार मजबूत हो रही है. बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने बीजेपी के आइकन और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि सरकारी स्तर पर मनाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वाकायदा मीडिया वालों को एक निमंत्रण पत्र भेजा है। इस पत्र में कहा गया है कि रविवार सुबह 11.30 बजे कोलकाता के केयोराताला श्मशान घाट पर उनकी पुण्यतिथि का कार्यक्रम आयोजित किया गया है। इस मौके पर राज्य के ऊर्जा मंत्री सोभनदेब चट्टोपाध्याय उन्हें राज्य सरकार की ओर से श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे. मीडिया कर्मियों से इस आयोजन को कबर करने के लिए भी कहा गया है.


अब सवाल ये उठता है कि जब बीजेपी और टीएमसी के बीच तल्खी कोलकाता से लाकर दिल्ली तक चल रही हैं. ये तल्खी खुनी संघर्ष में बदल गयी है तो ममता बनर्जी बीजेपी के बड़े नेता और हिन्दुत्ववादी चेहरा माने वाले डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि क्यों मनाने जा रही हैं. इसके पीछे क्या रणनीति हो सकती है. दरअसल ऐसा माना जा रहा है कि ममता बनर्जी की छवि हिन्दू विरोधी बन रही हैं और बीजेपी से जुड़े लोगों की हत्या होना इस छवि को और बढ़ावा दे रहा है. बीजेपी लगातार पश्चिम बंगाल में अपने जनाधार को बढाने में कामयाब हो रही हैं यही ममता बनर्जी की टेंशन है और सबसे बड़ी परेशानी भी! बीजेपी की बढ़त रोकने के लिए ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे हिंदुत्व के चेहरे को अपने रंग में रंगने की कोशिश कर रही है. ममता बनर्जी ने बंगाली अस्मिता को उभारने की भी बहुत कोशिश की, लेकिन उसमें उन्हें उतनी कामयाबी नहीं मिली । इसलिए, अब वो हिंदुत्व और भाजपा के आइकन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ‘बंगाली आइकन’ के तौर पर पेश करने की कोशिशों में जुट गई हैं। दरअसल ममता बनर्जी पर तुष्टीकरण का भी आरोप लगता रहा है, दुर्गा पूजा से लेकर, हत्या तक ऐसे कई मुद्दे हैं जहाँ उनकी छवि हिन्दू विरोधी की बना दी गयी है. अब इससे निकलना ममता बनर्जी की मजबूरी हैं क्योंकि इससे बीजेपी को तगड़ा फायदा हो रहा है और टीएमसी को नुकसान झेलना पड़ रहा है. तो यह कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी के इस फैसले के पीछे बड़ी रणनीति है.


वैसे ममता बनर्जी चुनाव में बीजेपी को बाहरी बताया था लेकिन इसका कोई ख़ास फायदा नही हुआ.. हाल ही बंगाल में डाक्टर हडताल पर चले गये थे जिसके बाद ममता बनर्जी ने हडताल कर रहे डाक्टरों को बाहरी बता दिया था लेकिन फिर बाद हड़ताल कर रहे डाक्टरों को काम पर वापस लौटने की धमकी देकर इस बात को खुद ही गलत साबित कर दिया था कि वे बाहरी हैं.
अब देखने वाली बात ये हैं कि टीएमसी और बीजेपी के बीच चल रही तनातनी कब खत्म होती हैं, खत्म होती भी है या और बढती हैं. क्योंकि विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं और विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के लिए बीजेपी से मुकाबला करना सबसे बड़ी चुनौती रहने वाली है.