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अमेरिका को चकमा देकर इंदिरा ने पाकिस्तान को तोड़कर कैसे बनाया था बांग्लादेश

इंदिरा गांधी भारत की प्रथम प्रधानमंत्री थीं. जो बहुत साहसी और बहादुर थीं. इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को प्रयागराज में पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू के घर हुआ था. लोग उन्हें आयरन लेडी भी कहते हैं. इंदिरा ने पाकिस्तान को ऐसा दर्द दिया था जिससे वो आज तक नहीं भूल पाया है. पाकिस्तान को इससे बड़ा झटका आज तक किसी पीएम ने नहीं दिया है. कहानी तब की है जब इन्द्रा ने पकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे और जन्म दिया था एक नये देश को जिसको आज पूरी दुनिया बांग्लादेश के नाम से जानती है. 1971 में भारत और पाकिस्तान के इतिहास में ऐसा बदलाव आया की दुनिया के नक़्शे पर एक और नया देश आ गया.

पूर्वी पाकिस्तान

जब भारत और पाकिस्तान आजाद हुए तो पाकिस्तान को दो हिस्सों में बनाया गया पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान. दिसंबर 1971 से पहले बांग्लादेश का अस्तित्व नहीं था इसे पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था. 1947 में भारत से दो बड़े सूबे कटकर अलग हुए जिनमें से एक था बंगाल सूबा. लेकिन बांग्लादेश के बनने की कहानी 1947 से ही शुरू हो गई थी. भाषा, प्रांत, आर्थिक भेदभाव और राजनीतिक द्वेष के दंश के बीच पूर्वी पाकिस्तान में कई आंदोलन हुए जिसका नतीजा हुआ साल 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और इसके बाद बांग्लादेश का जन्म.

परिस्थियाँ

1970 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए. चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान की 162 सीटों में से 160 सीटों पर शेख मुजीबुर्रहमान ने जीत हासिल की. पश्चिमी पाकिस्तान में इस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. पश्चिमी पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को 138 में 81 सीटों पर जीत मिली. शेख के पास प्रधानमंत्री बनने के लिए पर्याप्त सीटें थी लेकिन पाकिस्तानी सेना का समर्थन नहीं मिला. इसके बाद सरकार बनाने की जद्दोजहद हुई जिसमें सेना ने भी हस्तक्षेप किया. ऐसी स्थिति में पाकिस्तानी संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था. जिसके बदले 1 मार्च 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान ने हड़ताल का आह्वान किया. हड़ताल वाली बात सेना को अच्छी नहीं लगी और कार्रवाई शुरू कर दी.

पश्चिमी पाकिस्तान में पंजाबियों का तो पूर्व में बंगालियों का दबदबा था. पूर्वी पाकिस्तान से होने वाली कमाई जिसे सरकारी भाषा में रेवेन्यु कहा जाता है उसे पश्चिमी पाकिस्तान में निवेश किया जाता था. इससे भी बंगाल की तरफ के लोग नाराज थे. भाषा, प्रांत, आर्थिक और राजनीतिक अनदेखी को लेकर पूर्वी पाकिस्तान में भयंकर गुस्सा था.

साल 1947, दरअसल बांग्लादेश की कल्पना पहले ही हो चुकी थी. 20 जून को बंगाल विधानसभा में सर्वसम्मति से भारत से अलग बंगाल की मांग को लेकर लाया गया एक प्रस्ताव बहुमत के साथ पास हो गया था. लेकिन इसके अगले ही महीने यानी 7 जुलाई 1947 को एक जनमत करवाया गया जिसमें पाकिस्तान के साथ जाने के पक्ष में ज्यादा मत आए और इसे पूर्वी पाकिस्तान बना दिया गया. लेकिन जल्द ही भाषा को लेकर विवाद पनपने लगा. पूर्वी बंगाल से आने वाले नेताओं ने मांग रखी कि बंगाली को अंग्रेजी और उर्दू के साथ राष्ट्रीय भाषा घोषित किया जाए. विवाद और ज्यादा बढ़ गया जब मोहम्मद अली जिन्ना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

आवामी लीग के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया. 19 मार्च 1971 को 24 पाकिस्तानी सैनिकों ने 1100 बंगालियों को मार दिया. 25 मार्च 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया. अप्रैल 1971 को जिंजिरा हत्याकांड हुआ जिसमें महज 9 घंटों में 1000 से ज्यादा लोगों का मार डाला गया.इसके बाद बंगाल की जनता ने सेना का विरोध करना शुरू कर दिया. पाकिस्तानी सेना के अध्यक्ष याहया खान ने ढाका में एक मीटिंग बुलाई और मीटिंग में तय हुआ ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया जाये. इसके बाद बंगाल के लोगों पर पाकिस्तान ने वो जुल्म करने शुरू किये. पाकिस्तान की हमूदुर रहमान कमिशन के मुताबिक ऑपरेशन सर्चलाइट में 26000 लोगों की जानें गई. लेकिन बांग्लादेश का दावा है कि इस दौरान 3 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई औरतों के साथ पाकिस्तानी सेना ने बलात्कार किया और इसी दौरान लाखों लोग अपनी जान बचाकर भारत की तरफ भागने लगे.

इन्द्रा गाँधी की अहम भूमिका

इंदिरा गांधी को पाकिस्तानी सेना की हरकतें और दूसरी तरफ बांग्लादेश से हो रहा लाखों की संख्या में पलायन परेशान कर रहा था. इंदिरा चाहती थीं कि मार्च में ही पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए. इंदिरा ने अपनी इच्छा, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के सामने जाहिर की.. सैम बहादुर ने इससे साफ इंकार कर दिया और कहा सेना अभी हमले के लिए तैयार नहीं है. लेकिन इंदिरा नहीं मानी जिद पर अड़ी रहीं तो सैम ने एक सवाल पूछा कि क्या आप युद्ध में जीतना चाहती हैं? तो इंदिरा गांधी ने हां में जवाब दिया. इसके बाद सैम ने 6 महीनों का वक्त मांगा और कहा कि जीत आपकी ही होगी. इंदिरा गांधी की सरकार ने बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान को अपना समर्थन दिया.भारतीय सेना के कमांड ने मुक्ति बाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग, हथियार और सप्लाई मुहैया करवानी शुरू की. लेकिन पलायन का मसला बढ़ता ही जा रहा था और करीब 1 करोड़ लोग बांग्लादेश से भागकर भारत में घुसे चुके थे. पाकिस्तान ने भारत के लिए कई मुश्किलें पैदा की तो भारत ने सीधे युद्ध में जाने का मन बना लिया. 3 दिसंबर को पाकिस्तानी एयर फोर्स ने पश्चिमी भारत में हवाई हमले किए तो इसके बाद भारत ने अधिकारिक तौर पर युद्ध की घोषणा कर दी.

अमेरिका की धमकी

उसी वक़्त जुलाई में अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर पाकिस्तान होते हुए भारत की यात्रा पर आए हुए थे. अमेरिका खुले तौर पर पाकिस्तान के साथ था. मुलाकात के दौरान इंदिरा गांधी ने किसिंजर से बांग्लादेश के लोगों पर पाकिस्तान की करतूत के बारे में बताया तो उन्होंने मानने से ही इन्कार कर दिया की पाकिस्तान गलत कर रहा है. जब खुले तौर पर भारत ने पाकिस्तान से युद्ध की घोषणा की तो अमेरिका ने भारत का विरोध किया और चेतावनी दी और कहा की युद्ध रोक दिया जाये. लेकिन इंदिरा ने बिना कुछ सोचे साफ़ मना कर दिया की ये युद्ध नहीं रुक सकता. रिचर्ड निक्सन ने इसे अमेरिका का अपमान समझा और पाकिस्तान की मदद के लिए अमेरिका ने टास्क फोर्स 74 का गठन किया और अमेरिकी नेवी के सेवंथ फ्लीट को बंगाल की खाड़ी में भेजा. अमेरिका को उस वक्त कोई टक्कर दे सकता था तो वो सिर्फ सोवियत संघ ही था. सोवियत संघ पहले से ही खुलकर भारत का समर्थन कर रहा था. चाहे वो सैन्य हो या राजनीतिक. सोवियत संघ ने भी अपने युद्धपोत, डिस्ट्रॉयर, क्रूजर और न्यूक्लियर सबमरीन भारत की मदद के लिए भेज दिए. सोवियत संघ का ये कदम भारत के लिए बड़ी राहत लेकर आया और अमेरिकी नेवी को कदम पीछे खींचने पड़े.

4 दिसंबर 1971 को शुरू हुआ युद्ध महज 13 दिन चला और पाकिस्तान ने 16 दिसंबर 1971 को घुटने टेक दिए. इतिहास का सबसे बड़ा सरेंडर भी इसी युद्ध में हुआ था जब भारत ने पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया था जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर किया. पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया और बांग्लादेश अस्तित्व में आ गया.

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