5 सालों में ही कैसे खट्टर की पकड़ से निकल गया हरियाणा?

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लोकसभा चुनाव के 5 महीनों बाद भाजपा की पहली परीक्षा के परिणाम आ गए यानी कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के परिणाम. महाराष्ट्र में जहाँ भाजपा और शिवसेना गठबंधन ने अपनी सत्ता बरक़रार रखी है वहीँ हरियाणा में पेंच फंस गया है. कहाँ तो भाजपा ने सोचा था कि महाराष्ट्र और हरियाणा जीत कर पार्टी धमाकेदार दिवाली मनाएगी लेकिन हरियाणा ने भाजपा की दिवाली पार्टी के रंग में भंग डाल दिया.

आज से ठीक 5 साल पहले 2014 में जब मनोहर लाल खट्टर पर भरोसा करके पार्टी ने उन्हें हरियाणा की कमान सौंपी थी तो उम्मीद थी कि खट्टर हरियाणा को भाजपा का अभेद्द किला बना देंगे लेकिन सिर्फ 5 सालों बाद ही वो किला दरक गया. वो भी तब जब विपक्षी कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है और उनमे आपस में ही महाभारत मची थी. आज हम इन्ही कारणों का विश्लेषण करेंगे कि कैसे चूक गए खट्टर हरियाणा में.

भारत का जाटलैंड कहे जाने वाले हरियाणा में जाटों के बिना सियासत की कल्पना भी नहीं की जाती. साल 2014 में जब भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ जीत कर आई तो पार्टी के जाट नेता कैप्टन अभिमन्यु मुख्यमंत्री पड़ के प्रबल दावेदार थे लेकिन कुर्सी मिली गैर जाट नेता मनोहर लाल खट्टर को. 17 सालों तक आरएसएस के प्रचारक रहे खट्टर को जब हरियाणा की कमान सौंपी गई तो ये सवाल भी उठे कि क्या ये शख्स राम विलास शर्मा, कैप्टन अभिमन्यु और अनिल विज जैसे बड़े नेताओं पर काबू पाकर हरियाणा के जाट बिरादरी को साध पायेगा? लेकिन सवालों को दरकिनार कर के पार्टी आलाकमान खट्टर के पीछे पूरी ताकत के साथ खड़ी रही.

एक तो खट्टर में अनुभव की कमी थी ऊपर से जाटों के अन्दर ये नाराजगी सुलग रही थी कि उनपर गैर जाट पंजाबी खत्री को थोपा गया है. खट्टर के अनुभव की पोल सत्ता सँभालने के मात्र डेढ़ साल में ही खुल गई जब राज्य में जाट आरक्षण आन्दोलन हुए. उस दौरान हुई हिंसा में करीब 20 जाट युवा पुलिस की गोली का शिकार हो गए और कई जाट युवाओं को जेल में डाला गया. देश भर में खट्टर सरकार की आलोचना हुई. पार्टी के भीतर भी आवाजें उठीं कि खट्टर इस मामले को ढंग से संभाल नहीं पाए लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूरी मजबूती से खट्टर के साथ बना रहा.

जाट आन्दोलन से राज्य उबरा ही था कि डेरा सच्चा सौदा वाले मामले ने एक बार फिर खट्टर सरकार की कमजोरियां उजागर कर दी. डेरा प्रमुख राम रहीम के दोषी ठहराए जाने पर राज्य में भड़की हिंसा में कई लोगों की मौत होने के बाद राज्य सरकार और खट्टर दोनों ही विपक्ष के निशाने पर आ गए. लेकिन इस बार भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खट्टर के पीछे पूरी ताकत के साथ खड़ा रहा.

हरियाणा की राजनीति में डेरा का भी एक अलग महत्त्व है. हर चुनाव से पहले डेरा से फरमान निकलता है, ठीक वैसे ही जैसे मस्जिदों से फरमान निकलता है कि वोट किसे देना है. इसका पूरा न सही, कुछ प्रभाव तो पड़ता है लेकिन इस बार ऐसा कोई फरमान नहीं निकला. राम रहीम के भक्तों में खट्टर सरकार के प्रति नाराजगी थी और शायद इसी कारण इस बार डेरा ने खामोशी ओढ़ ली. पुरे 5 साल खट्टर जाट और गैर जाट के बीच संतुलन साधने में जुटे रहे. और गैर जाटों का एक नया समीकरण तैयार करते रहे. चुनावों के पहले लग रहा था कि खट्टर आसानी से ये इम्तिहान पास कर जायेंगे. ये सोचने की वाजिब वजहें भी थी. महज 5 महीने पहले ही लोकसभा चुनाव में हरियाणा के वोटरों ने भाजपा को छप्परफाड़ कर वोट दिया था. कांग्रेस में आपस में ही महाभारत मची थी, चौटाला परिवार भी आपसी घमासान से जूझ रहा था. ऐसे में इस बात पर शक करने की कोई वजह ही नहीं थी कि भाजपा ये चुनाव जीतेगी.

लेकिन नतीजे बिलकुल उलट आये हैं. इसके पीछे कई कारण है. सबसे पहला कारण टिकट बंटवारा. भाजपा ने कई जमीनी कार्यकर्ताओं और जनाधार वाले नेताओं का टिकट काट कर पैराशूर से सेलेब्रिटीज को मैदान में उतार दिया. जिनके टिकट कटे वो या तो बागी बन कर लड़ गए या फिर चंद महीने पहले बनी दुष्यंत चौटाला की जेजेपी में शामिल हो गए. बागियों ने भाजपा को चोट पहुँचाया. नतीजों में 10 सीटें अन्य के खाते में जा रही है और 10 सीटें जेजेपी के खाते में. इनमे से कई नेता भाजपा छोड़ कर आये हैं. जाटों की नाराजगी, डेरा की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की अनदेखी और 5 सालों के खट्टर विरोधी लहर ने खट्टर का किला उखाड़ दिया. हालाँकि भाजपा निर्दलियों के समर्थन से सरकार बना लेगी लेकिन ये सरकार बैसाखियों वाली होगी जो या दूसरों के रहमों करम पर टिकी होगी.