क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव ?

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चुनाव का मौसम चल रहा है … हर तरफ इसी के चर्चे चल रहे हैं… रोज़ कुछ न कुछ हो रहा है चुनाव से रिलेटेड… अखबार हो या टेलीविज़न या फिर वेब मीडिया…. हर जगह चुनावी बुखार चढ़ा है….. इस दौरान हमे कई ऐसे शब्द सुनने को मिलते है जिसका मतलब हमे नहीं मालूम होता है…. या फिर हम थोड़े कंफ्यूज होते है उसको लेकर.. या फिर कह लें आधा अधूरा ज्ञान होता है….

हमारा देश लोकतांत्रिक देश है यह तो सब को मालूम है …. लेकिन लोकतंत्र में कई ऐसी बातें है जिन्हें जानना बहुत ज़रूरी होता है … इसी लोकतंत्र को टटोलते टटोलते मुझे एक शब्द मिला “ अविश्वास प्रस्ताव”. वैसे इसे नो कॉन्फिडेंस मोशन भी कहते है…

हालांकि यह नाम से ही क्लियर है कि कही न कही इसमें असहमति है… लेकिन कैसी असहमति … क्यों असहमति  और किसके लिए असहमति… तो चलिए आज आपको बताते है इस अविश्वास प्रस्ताव के बारे में….

दरअसल 2004 में चुनकर आई यूपीए सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने के कगार पर आ गया था ….और उसके बाद 2009 में लोकसभा चुनाव फिर से होने वाले थे…. लेकिन इसके बीच एक  सियासी उठापटक चालू हो गई थी… न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर लेफ्ट पार्टियों ने सरकार से समर्थन वापस भी ले लिया….वैसे  न्यूक्लियर डील वही जिसमें भारत ने अमेरिका से डील करनी चाहि थी और लेफ्ट पार्टियां इसके सपोर्ट में नहीं थीं…… बीजेपी का कहना था  कि अमेरिका लूट रहा है….. लेकिन उसके बाद सरकार को फ्लोर टेस्ट करना पड़ा…. मतलब की  इससे पहले कि कोई अविश्वास प्रस्ताव ले आए, उससे पहले ही यह साबित हो गया था  कि सरकार के पास पर्याप्त सपोर्ट है जिससे की काम चल सकता है….. वैसे आपको बता दें कि  किसी भी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना छोटा-मोटा काम नहीं……

वैसे अभी भी समझ नहीं आया होगा की ये अविश्वास प्रस्ताव है क्या…

अब आपको बता ही देतें है की असल में यह शब्द कितना दमदार है… तो बात कुछ ऐसी है… जैसे जब  भी  कोई सरकार बनती है, तो सबसे पहली शर्त यही होती है कि वो लोकसभा में बहुमत का समर्थन पा ले…… मतलब कि अधिकतर सीटों पर बैठे सांसद या तो उसके हों या उसके गठबंधन के…. लेकिन, अगर बीच में गठबंधन से कोई पार्टी समर्थन वापस ले लेती है , तो ऐसा होता है की  सरकार के पास पर्याप्त समर्थन न हो. तो सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है. इसका मतलब अपोजिशन (विपक्ष) को भरोसा नहीं है कि वर्तमान सरकार चल सकने की हालत में है, या उसके पास पर्याप्त समर्थन है…गौरतलब, वर्तमान सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता और यह किसी काम की नहीं है….. . इसलिए अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा है…..

हालांकि इस अविश्वास प्रस्ताव के कारन पहली बार सरकार गिरी थी…..भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को सफलता 1978 में मिली. ….. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी को बहुमत मिला और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने……  मोरारजी देसाई सरकार के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया……..

पहले प्रस्ताव से उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन 1978 में दूसरी बार लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे…….. अपनी हार का अंदाजा लगते ही मोरारजी देसाई ने मत-विभाजन से पहले ही इस्तीफा दे दिया…

वैसे आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री की तरह नरसिम्हा राव की सरकार को भी तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा….. 1993 में नरसिम्हा राव बहुत कम अंतर से अपनी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को मात दे पाए. ….. नरसिम्हा सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव के वोटिंग में 14 वोट के अंतर से सरकार बची. हालांकि उनके ऊपर अपनी सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को प्रलोभन देने का आरोप भी लगा…

वैसे एनडीए सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किए… वाजपेयी जब खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्हें भी दो बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा…… इनमें से पहली बार तो वो सरकार नहीं बचा पाए लेकिन दूसरी बार विपक्ष को उन्होंने मात दे दी……

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को जयललिता की पार्टी के समर्थन वापस लेने से अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था……. तब वाजपेयी सरकार 1 वोट के अंदर से हार गई थी.  उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया था. इसके बाद 2003 में वाजपेयी के खिलाफ लाए अविश्वास प्रस्ताव को एनडीए ने आराम से विपक्ष को वोटों की गिनती में हरा दिया था…… एनडीए को 312 वोट मिले जबकि विपक्ष 186 वोटों पर सिमट गया था….

अविश्वास प्रस्ताव को सिर्फ और सिर्फ लोकसभा में पेश किया जा सकता है….. कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है इसे पेश करने के लिए….. सरकार ये साबित करने की कोशिश करती है कि उसके पास सदन का समर्थन है…. भरोसा है कि वो काम सुचारु रूप से चला सकती है…….. अपने फेवर में ज्यादा वोट लाकर दिखाती है….. अगर ऐसा नहीं होता है, तो इसका मतलब सरकार गिर गई है….. और अब उसकी जगह दूसरी  सरकार आएगी….

वैसे आपको बता दें आज तक सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव का सामना इंदिरा गाँधी को करना पड़ा है…