कुछ ऐसा है पश्चिमी उत्तरप्रदेश का चुनावी माहौल

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आजकल चुनाव का मौसम चल रहा है. आचार संहिता लग चुकी है . हर तरफ चुनाव को लेकर ही चर्चे है. कहीं घोषणा पत्र जारी किये जा रहे हैं तो कहीं चुनाव प्रचार किया जा रहा है.

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश का बहुत बड़ा योगदान रहा है. और यहाँ की आन्तरिक राजनीति चुनाव में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है.उत्तर प्रदेश भारत का गंगा जमुनी तहज़ीब पालने वाला राज्य है . यहाँ हमेशा से हिन्दू  मुश्लिम एकता देखने को मिली है.मलतब की हिन्दू मुश्लिम मिल जुलकर रहे हैं . वैसे आपको तो पता ही होगा कि उत्तरप्रदेश के पास 80 लोकसभा सीटें है और सबसे ज्यादा पुरे देश में सबसे ज्यादा सीट्स इसी राज्य के पास है .

अगर बात की जाए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तो वहाँ चुनाव को लेकर हमेशा से एक अलग ही गणित रहा है. ऐसा कहा जाता है कि वहाँ हमेशा से जाती और खेती के इर्द गिर्द राजनीति होती है.

आजकल क्राइम रेट और डेवलपमेंट भी एजेंडा बना हुआ है .. वैसे आपको बतादें की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में “साहजहापुर, कैराना, मुज्ज़फ्फरनगर,बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाज़ियाबाद और गौतम बुद्धा नगर है. पिछले लोकसभा चुनाव यानी कि 2014 में सभी  सीटें भाजपा के खेमे में गईं थी.

वैसे आपको विस्तार में बताते है . इन जिलों का राजनैतिक गणित.

मेरठ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का केंद्र माने जाने वाली मेरठ लोकसभा सीट राजनीतिक संदेश के हिसाब से अहम सीट मानी जाती है. पिछले दो दशकों से ये सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है, 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत यहां से ही की थी. मेरठ की रैली में जुटी 20 लाख से अधिक की भीड़ से पूरे प्रदेश में बड़ा संदेश गया था. बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल यहां से लगातार दो बार सांसद चुने जा चुके हैं.

2011 के आंकड़ों के अनुसार मेरठ की आबादी करीब 35 लाख है, इनमें 65 फीसदी हिंदू, 36 फीसदी मुस्लिम आबादी हैं. .. मेरठ लोकसभा के साथ हापुड़ का कुछ क्षेत्र भी जुड़ता है, कुल मिलाकर यहां 5 विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण और हापुड़ की सीट है.. 2017 के लोकसभा चुनाव में इनमें मेरठ शहर समाजवादी पार्टी तथा अन्य विधानसभा सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थीं.

मुज़फ्फरनगर

यह नाम सुनते ही आम लोगों के ज़हन में जो सबसे पहला ख्याल आता है वो होता है दंगों का. क्योंकि 2013 में जो दंगा हुआ था  जिसमे कई लोग घायल हुए , कई लोग मरे और कई लोग बेघर हो गए . खैर इन दंगों ने काफी कुछ बदल कर रख दिया . खासकर के सियासत . इसलिए तो 2014 लोक सभा चुनाव में बीजेपी वहां भारी  मतों से जीती.और संजीव कुमार बाल्यान वहाँ के सांसद बने. वैसे  आपको बता दें संजीव बाल्यान से पहले वहाँ के सांसद बसपा के कादिर राणा थे.

अगर 2019 के लोकसभा चुनाव कि  बात की जाए तो यहाँ  इस  बार चुनावी लड़ाई आरएलडी और बीजेपी के बीच में है. मतलब की बीजेपी प्रत्याशी और वर्तमान सांसद  संजीव कुमार बाल्यान

और आरएलदी प्रत्याशी अजीत सिंह का . आपको बता दें कि अजीत सिंह, चौधरी चरण सिंह के बेटे है जो की हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री रह चुके है.

वैसे चुनाव में हर प्रत्याशी जीतने की उम्मीद से खड़ा होता है. लेकिन इसका नतीजा जनता पर टिका होता है. हालांकि मुज़फ्फरनगर में जो दोनों प्रत्याशी है दोनों ही जाट है और दोनों किसान परिवार से.

हालांकि आपको यह बता दें की चौधरी चरण सिंह भी इस सीट से एक बार लडें थे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इस बार अजीत सिंह यही राग अलाप रहें है कि जो गलती चौधरी चरण सिंह को हरा कर वहाँ के लोगों ने की थी . उस गलती को दुबारा ना दोहराएं . वहीं बीजेपी प्रत्याशी संजीव बाल्यान के 5 साल के कार्यकाल में हुई तरक्की उनके वोट बैंक को अपने तरफ लुभा रही है . वहां के लोगों का कहना है कि बीजेपी सरकार ने डेवलपमेंट के साथ साथ क्राइम रेट भी कम कर दिया है.

कैराना

कैराना पिछले 2 चुनावों से सियासत की प्रयोगशाला बनी हुई है .. यहाँ मुश्लिम आबादी ज्यादा  होने के कारण इसे यूपी का कश्मीर भी कहा जाता है.वैसे इस  बार 2019 के लोकसभा चुनाव के बारे में तो वहाँ  के सीट के दावेदारी के लिए चुनावी दंगल में 3 पार्टियां  उतरीं  है . बीजेपी के तरफ से प्रदीप चौधरी, आरएलडी के तरफ से ताव्वासुम हसन और कांग्रेस के तरफ से हरेन्द्र मालिक.  

आपको बता दें कि यह लोकसभा सीट 1962 में अस्तित्व में आई थी. 70 के दशक में हुकुम सिंह ने सेना छोड़कर वकालत करनी शुरू कर दी थी। इसके साथ ही राजनीति में कदम रख दिया.. 1974 में वह यहां से विधायक बने. हुकुम सिंह यहां से लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीते. 2014 में भाजपा ने हुकुम सिंह को लोकसभा का टिकट दिया.. मोदी लहर में उन्हें पांच लाख से ज्यादा वोट मिलीं.. सपा के नाहिद हसन को उन्होंने करीब दो लाख वोटों से हराया. लेकिन सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद रिक्त हुई इस सीट पर गठबंधन ने आरएलडी  के सिंबल पर तबस्सुम हसन को टिकट दिया और भाजपा के हाथों से यह सीट चली गयी .

सहारनपुर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सहारनपुर लोकसभा सीट नतीजों, राजनीतिक समीकरण और जातीय समीकरण के हिसाब से काफी मायने रखती है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में ये सीट भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थी. इस सीट से बीजेपी के राघव लखनपाल को बड़ी जीत हासिल हुई थी. इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पास महागठबंधन का तोड़ निकालते हुए सीट को बरकरार रखने की चुनौती है..

हालांकि सहारनपुर में मुश्लिमों की आबादी सबसे अधिक है . करीबन 42 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है . वैसे अगर बात करें 2014 के चुनाव के बारे में तो  राघव लखनपाल को देशभर में चल रही मोदी लहर का बड़ा फायदा मिला था. उन्होनें  अपने प्रतिद्वंदी को 65 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. यहां भारतीय जनता पार्टी का सीधा मुकाबला कांग्रेस के इमरान मसूद से था. इमरान मसूद 2014 में अपने बयानों के कारण काफी चर्चा में रहे थे.

बिजनौर

बिजनौर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की सबसे वीआईपी सीटों में से एक मानी जाती है. इस सीट पर कई राजनीतिक दिग्गज अपनी किस्मत आजमा चुके हैं. फिर चाहे वह बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती हों या फिर लोक जनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान, पिछले लोकसभा चुनाव में ही बॉलीवुड अदाकारा जयाप्रदा ने भी यहां से चुनाव लड़ा था. हालांकि, देशभर में चली मोदी लहर ने इस सीट को भारतीय जनता पार्टी के खाते में डाला. बीजेपी के कुंवर भारतेंद्र सिंह ने यहां 2014 में 2 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी..

2014 में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में प्रचंड जीत हासिल की, बिजनौर में भी ऐसा ही हुआ. भारतेंद्र ने अपने प्रतिद्वंदी शाहनवाज राना को 2 लाख से अधिक वोटों से मात दी. शाहनवाज राना समाजवादी पार्टी की ओर से मैदान में थे.. यहां बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार मलूक नागर तीसरे नंबर पर रहे थे.

बागपत

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी गढ़ और जाटलैंड माने जाने वाली लोकसभा सीट बागपत में इस बार भी पूरे देश की नजरें हैं. देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह यहां से ही सांसद रह चुके हैं और उसके बाद उनके बेटे अजित सिंह ने यहां पर कई बार चुनाव जीता. लेकिन 2014 में चली मोदी लहर के दम पर भारतीय जनता पार्टी ने यहां परचम लहराया और मुंबई पुलिस के कमिश्नर रह चुके सत्यपाल सिंह सांसद चुने गए.. जबकि अजित सिंह इस सीट पर तीसरे नंबर पर रहे थे.

वैसे बागपत में 16 लाख से भी अधिक वोटर हैं. रालोद को यहां पर मजबूत माना जाता है . जाट समुदाय के वोटरों के बाद यहां मुस्लिम वोटरों की संख्या सबसे अधिक है.

बागपत लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इसमें सिवालखास, छपरौली, बड़ौत, बागपत और मोदीनगर विधानसभा सीटें हैं. इसमें सिवालखास मेरठ जिले की और मोदीनगर गाजियाबाद जिले से आती हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इसमें सिर्फ छपरौली में राष्ट्रीय लोकदल ने जीत दर्ज की थी, जबकि बाकी 4 सीटों पर बीजेपी जीती थी.

गाजियाबाद

देश की राजधानी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद लोकसभा सीट अभी भारतीय जनता पार्टी के पास है.. इस सीट पर दो ही बार लोकसभा चुनाव हुए हैं और दोनों ही बार ये सीट बीजेपी के खाते में गई है. गाजियाबाद लोकसभा सीट की गिनती प्रदेश की वीआईपी सीटों में होती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सेंटर के तौर पर भी गाजियाबाद सीट अहम मानी जाती है. .पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह अभी इस सीट से सांसद हैं..

गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इसमें लोनी, मुरादनगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद और धोलाना जैसी सीटें शामिल हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ धोलाना सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई थी, जबकि अन्य सभी 4 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा था.

गाजियाबाद लोकसभा सीट काफी नई है.. अभी तक यहां पर दो बार ही चुनाव हुआ है पहला 2009 और फिर 2014. ये सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद ही अस्तित्व में आई.. पहली बार 2009 में जब यहां से चुनाव हुए तो मौजूदा केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रह चुके राजनाथ सिंह ने यहां से बड़े अंतर से चुनाव जीता था.. लेकिन 2014 में राजनाथ सिंह लखनऊ चले गए और ये सीट वीके सिंह को मिली. हालांकि, चुनाव से पहले वीके सिंह को टिकट दिए जाने का काफी विरोध हुआ था.

गौतम बुद्ध नगर

देश की राजधानी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गौतम बुद्ध नगर लोकसभा सीट सूबे की वीआईपी सीटों में से एक है. ये सीट अभी भारतीय जनता पार्टी के खाते में है, यहां से सांसद महेश शर्मा केंद्र सरकार में मंत्री हैं. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में गौतम बुद्ध नगर का विस्तार हुआ, जिसके बाद से ही ये क्षेत्र हमेशा सुर्खियों में रहा है.. इस  सीट पर गुर्जर समाज के वोटरों की संख्या अधिक है, ऐसे में लोकसभा चुनाव में इस सीट पर सभी की नजरें हैं.. 2015 में हुए दादरी कांड के दौरान इस क्षेत्र ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं..

बहरहाल हमने आपको बताया क्या हैं चुनावी आकडे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में . वैसे यहाँ की  राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है . हमारी कोशिश थी आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माहौल के बारे में बताने की.. ऐसे  ही आप जुड़े रहिये हम आपको बताते रहेंगे राजनैतिक गलियारों के बारे में.