पश्चिम बंगाल में बीजेपी का बढ़ता जनाधार, उड़ा देंगे ममता बनर्जी के होश

336

लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल में सीएम ममता बनर्जी अपनी सत्ता को लेकर क्यूं इतना डर गई है…क्यों उन्हें अपने हारने का डर राज्य में सता रहा है..ऐसे में तेजी से बदलते इस राजनीतिक समीकरणों के बीच हम आपको यह बताते हैं कि क्यों अब ममता को बंगाल में चिंतित होने की जरूरत है-
बता दें, 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बंगाल में दूसरे और तीसरे नंबर की पार्टियों माकपा और कांग्रेस को चुनौती देते हुए राज्य की 42 में से 2 सीटों पर कब्जा कर किया और 16.8 प्रतिशत वोट हासिल किये, इससे पहले के चुनाव में बीजेपी को महज एक सीट और 6.1 प्रतिशत वोट मिले थे, विधानसभा चुनावों को भी देखे तो बीजेपी का मत प्रतिशत 6.5 प्रतिशत से अधिक बढ़ा और वह कांग्रेस के करीब पहुँच गयी..निगम चुनावों में बीजेपी कई जगहों पर दूसरे पायदान पर रही..2018 में पंचायत चुनावों में भी बीजेपी ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया और तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी विपक्षी के रूप में उभरी..यहां तक कि माकपा और कांग्रेस के संयुक्त वोट प्रतिशत से भी ज्यादा वोट बीजेपी को मिले..ऐसे में तृणमूल के खिलाफ लड़ रहे लोगों के लिए माकपा और कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी सबसे पसंदीदा पार्टी के रूप में उभरने लगी। यह देखते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस लोकसभा चुनाव में राज्य में पिछली बार के मुकाबले 12 गुना सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है..

दरअसल, बंगाल की राजनीति का एक चरित्र रहा है। जब-जब यहां वामपंथी दल सत्ता में आए तब-तब यहां लोकतंत्र पर खतरा ही मंडराया है..सतारूढ़ पार्टी के विरोध के स्वर को कुचलने का दौर शुरू हुआ और विरोधियों को कुचल देना ही इस राज्य के सत्तारूढ़ दलों का चरित्र बन गया..ऐसे में वहां की जनता विरोधी दलों को देखने से भी परहेज करने लगी..बहरहाल इसके बाद नतीजा ये होने लगा कि जब वहां की जनता को ये भरोसा होने लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी का दबदबा वहां कम होने लगा है तब वो विपक्षियों के सामने खुलकर सामने आते है..
ये समझने के लिए हम आपको बंगाल की राजनीतिक इतिहास की ओर ले चलेंगे..
सीपीआईएम (Communist Party of India (Marxist)) 1977 से लेकर 2006 तक लगभग 33 सालों तक बंगाल पर राज करती रही..माकपा सरकार के अत्याचारों से परेशान जनता लंबे समय तक खामोश रही और जब ममता बनर्जी माकपा के खिलाफ मजबूती के साथ मैदान में उतरी तो जनता ने अचानक तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन देकर माकपा के तीन दशक से अधिक लंबे शासन को खत्म कर दिया..लेकिन ममता बनर्जी भी सत्ता में आने के बाद माकपा के ही नक्शेकदम पर चल दीं बल्कि ये कहे तो गलत नहीं होगा की ममता बनर्जी माकपा से एक कदम आगे निकली..

बता दें अभी हाल ही में 3 अप्रैल को पीएम मोदी ने बंगाल में दो रैलियों को संबोधित किया..उनकी एक रैली बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित की गई थी तो वहीं दूसरी रैली कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में आयोजित की गई थी..ठीक चुनाव से पहले हुए बीजेपी की इस रैली में भारी जनसैलाब देखने को मिला..जो बंगाल में बीजेपी के बढ़ते जनाधार को दर्शाता है..और वहीं सीएम ममता बनर्जी के लिए खड़ी होती कई बड़े मुश्किलों की ओर भी इशारा करता है..
मोदी की रैली में लोगों की भीड़ से तो यही पत्ता चल रहा है कि बंगाल में राजनीतिक माहौल बदल चुका है..इन रैलियों में पीएम मोदी ने बंगाल की जनता तो संबोधित करते हुए कहा कि तृणमूल ने लेफ्ट से बम, बंदूक की संस्कृति उधार ली है। उन्होंने जनता से निर्भय हो कर मतदान करने को कहा और आश्वस्त किया कि बीजेपी सरकार आते ही तृणमूल की गुंडागर्दी खत्म कर दी जायेगी। मोदी ने ममता को बंगाल के विकास के रास्ते में स्पीड ब्रेकर बताते हुए आयुष्मान योजना और किसान सम्मान योजना का उदाहरण दिया जिसे ममता ने राज्य में लागू नहीं होने दिया। मोदी ने सारडा चिटफंड घोटाले का जिक्र करते हुए ममता पर गरीबों का पैसा लूटने वालों को पनाह देने और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने पर सेना पर संदेह करने का आरोप लगाया..बहरहाल, आने वाले लोकसभा चुनाव में तो जनता इस बात को तो साबित कर ही देगी की बंगाल में बीजेपी कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है..