University पाठ्यक्रम में वीर सावरकर को बताया ‘आतंकवादी’

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हमारे देश को आज़ाद करने में अनगिनत लोगों का योगदान रहा, लेकिन उनके बलिदान को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे, उनका बलिदान सिर्फ किताबों की चंद पंक्तियों में सिमट कर रख दिया गया.. इसे उनका दुर्भाग्य तो नहीं कहूँगी ये हमारा ही दुर्भाग्य है कि इन महान शख्सियतों की शहादत को पढ़ ही नहीं पाए.. लेकिन और ज्यादा अफ़सोस तब होता है जब हिन्द देश को आज़ाद करने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले इन बलिदानियों को आक्रान्ताओं का नाम दे दिया जाता है.. आपको भी जानकार अचम्भा होगा कि महान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर उर्फ़ वीर सावरकर जिन्होंने भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने में अपना अमूल्य योगदान दिया उन्हें नासिक की यशवंतराव चव्हाण ओपन यूनिवर्सिटी की किताबों में हिंदुत्व विचारधारा वाले कट्टरपंथी (जहालवादी) और दहशतवादी (आतंकवादी) व्यक्ति बताया गया है।

इस खबर पर आगे बढे उससे पहले आप यह जान लीजिये कि वीर सावरकर थे कौन??

विनायक दामोदर सावरकर  भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की अलख जलने वाले सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है[4]। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे बल्कि महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। उन्होंने “ the Indian war of independence-1857”  का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था[5]।वे एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं के हिंदू धर्म को वापस लौटाने हेतु सतत प्रयास किये एवं आंदोलन चलाये। सावरकर एक नास्तिक व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में व्याप्त रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे सावरकरजी हिंदू समाज में प्रचलित जाति-भेद एवं छुआछूत के घोर विरोधी थे। बंबई का पतितपावन मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है, जो हिन्दू धर्म की प्रत्येक जाति के लोगों के लिए समान रूप से खुला है। सावरकर जीवन भर अखण्ड भारत के पक्ष में रहे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के माध्यमों के बारे में गान्धी और सावरकर का एकदम अलग दृष्टिकोण था।  1947 में इन्होने भारत विभाजन का विरोध किया। वीर सावरकर ने जीवन भर हिंदू हिन्दी और हिंदुस्तान के लिए ही काम किया। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। उनकी इस विचारधारा के कारण आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें वह महत्त्व नहीं दिया जिसके वे वास्तविक हकदार थे। 15 अगस्त 1947  को आज़ादी के अवसर पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे स्वराज्य प्राप्ति की खुशी है, परन्तु वह खण्डित है, इसका दु:ख है। आज़ादी को लेकर उनके विचार गाँधी और नेहरु से अलग रहे इसीलिए 5 फ़रवरी 1948  को महात्मा गांधी की हत्या के उपरान्त उन्हें प्रिवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट धारा के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन उनके खिलाफ कोई सुबूत ना होने पर उनको बरी कर दिया गया था. 26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर इस दुनिया से रुख्सत हो गए.

अब आपको बताते हैं यह पूरा मामला

नासिक की यशवंतराव चव्हाण ओपन यूनिवर्सिटी के बीए सेकंड ईयर की इतिहास की किताब में 1885 से शुरू हुए भारतीय संघर्ष के बारे में बताया गया है। इस किताब में एक चैप्टर है, ‘दहशतवादी क्रांतिकारी आंदोलन’। इसमें वीर सावरकर से लेकर वासुदेव बलवंत फड़के, पंजाब के रामसिंह कुका, लाला हरदयाल, रास बिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों के नाम शामिल हैं। 

इस किताब में बताया गया है कि महाराष्ट्र और देश के दूसरे हिस्सों में आंतकवाद और कट्टरवाद 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फैला। सावरकर का विवरण और परिचय देते हुए चैप्टर के अंत में प्रश्न है, ‘दहशतवादी क्रांतिकारी आंदोलन में वीर सावरकर की क्या भूमिका थी?’ इसके जवाब में दिया गया है कि सावरकर एक ‘आतंकवादी’ थे। 

इस किताब की विवादित सामग्री को लेकर एबीवीपी ने आपत्ति दर्ज कराई। एबीवीपी के महानगर मंत्री वैभव बावनकर ने कहा कि देश की आजादी के लिए जिन क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया, उन्हें दहशतवादी बताना गलत है। यूनिवर्सिटी छात्रों को गलत इतिहास पढ़ा रही है। ओपन यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. नारायण मेहरे ने कहा कि किताब की विवादित सामग्री बदली जा रही है। यह किताब 2001 में लिखी गई थी और आज तक इस पर कोई विवाद नहीं आया। सिर्फ मराठी भाषा की किताब को लेकर अब शिकायत आई है। मैं कोई विवाद नहीं चाहता, इसलिए किताब से विवादित हिस्सा हटाया जा रहा है।’ 


यह किताब रेशमबाग स्थित सीपी ऐंड बरार कॉलेज के इतिहास के प्रफेसर एनसी दीक्षित और कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय के प्रफेसर अरुण भोसले द्वारा लिखी गई है। पहली बार इस किताब को 2001 में प्रकाशित किया गया था। 

एक महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक को मात्र एक आतंकवादी की बता देना जिसे हज़ारों स्टूडेंट्स हर साल पढ़ रहे हैं, महज गलती या अपराध नहीं उनका अपमान है. नेताओं को लेकर, प्रधानमंत्री को लेकर लोग आसानी से मजाक बना देते हैं.. पर यह तो हद ही हो गई कि एक दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी के व्यक्तित्व को ही पलट दिया गया, खैर university अब यह कंटेंट हटवा रही है पर उम्मीद करते हैं कि इस तरह की बड़ी गलती कोई दुबारा ना करे.