धार्मिक कार्यों पर सरकार के पैसा ख़र्च करना लिबरल मीडिया को क्यों रास नहीं आ रहा है

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पिछले कुछ सालों में उत्तर भारत की राज्य सरकारों द्वारा धार्मिक कामों में खर्च किया जा रहा पैसा लिब्रेअल मीडिया को रास नहीं आ रहा. हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने जहां राज्य के Supplementary budget में अयोध्या की घाघरा नदी के किनारे निर्माण कार्य के लिए 10 करोड़ रुपए आवंटित किये हैं वहीँ दीपावली पर सुरक्षा और बाकी इन्तेज़मों में 6 करोड़ रुपए आवंटित किए थे, साथ ही भारत की आजादी के बाद पहला ऐसा मौका आया था की कुम्भ के अवसर पर सरकार ने सुरक्षा से लेकर जरूरी इन्तेज़मों में कोई कमी नहीं छोड़ी थी. आखिर कुम्भ दुनिया का सबसे बड़ा पर्व है. करोड़ों श्रद्धालु एक स्थल पर एकत्रित होतें है, साथ ही दुनिया भर के लाखों परेटक भी इस अनोखे पर्व में समेलित होने के लिए आते है. ऐसे में अगर इन कार्यों में सरकारी खज़ाने से पैसे जा भी रहे है तो इसमें सेकुलर मीडिया को दर्द क्यों हो रहा है.

इन्हें केवल योगी सरकार से दिक्कत नहीं है बल्कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा चलाई जाने वाली बुज़ुर्गों को धार्मिक तीर्थ स्थलों पर घुमाने की तीर्थ दर्शन योजना से भी दिक्कत है. ये योजना शिवराज सिंह सरकार के समय शुरू हुई थी, जिसे मौजूदा कमलनाथ सरकार ने फिलहाल बंद नहीं करवाया है.

लेकिन जब पूर्व में केन्द्र सरकार हज सब्सिडी के नाम पर मुस्लिमों को उनके धार्मिक स्थल पर कम खर्च पर भ्रमण कराती ही थी तब उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं थी. ज्यादतर पढ़े लिखे लोगों के मुह से यही सुनने को मिलता है की मंदिरों पर खर्च करने की जगह स्कूल और कॉलेजों पर करना चाहिए था, हॉस्पिटल बनवाने चाहिए थे.

तो आज हम आपको बताते है की बाकी के देश अपने धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक धरोहरों पर कितना पैसा खर्च करते हैं. सबसे पहले दक्षिणी देशों की बात कर लेते हैं. european यूनियन के सभी देश औसतन अपनी GDP का 1.1% हिस्सा धार्मिक कार्यों और उससे जुड़ी चीजों पर करते हैं. इनमे हंगरी अपनी GDP का 3.5 प्रतिशत हिस्सा इन कामों में लगता है वहीँ ऑस्ट्रिया और सर्बिआ जैसे देश भी अपनी जीडीपी का अच्छा खासा हिस्सा इसमें खर्च करते हैं. वहीँ अगर अरब देशों की बात की जाए तो वहां धर्म से ज्यादा महतवपूर्ण कोई और मुद्दा है ही नहीं. अगर वैटिकन सिटी की बात की जाए तो दुनिया भर के सारे इसाई देश एक अच्छी खासी रकम न सिर्फ वैटिकन को देते हैं बल्कि पूर्वी एसीआई देशों में धरमांतरण के लिए भी देते हैं.

हमे ये बात समझनी चाहिए की अगर सरकार हमारे धार्मिक स्थलों की मरम्मत और निर्माण में पैसे खर्च करती है तो वो परेटन की नज़र से काफ़ी अच्छी पहेल है. आखिर जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो इन्ही मंदिरों के पैसों को सरकार राहत और बचाव के कार्यों में लगाती है. इस देश में न जाने कितने मंदिर तोड़ दिए गए जिनका हमारे इतिहास तक में उल्लेख नहीं है. पिछले 70 सालों में नए मिन्दरों के निर्माण की बात तो छोड़िये पुरानों को नष्ट होने के लिए छोड़ दिया गया. ऐसे में अगर सरकार चाहती है की अब वो हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को टूरिज्म का केंद्र बनाए तो इसके गलत क्या है.