क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड होगा मोदी सरकार का अगला मिशन?

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यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक आचार संहिता. अगर सरल भाषा में कहें तो ऐसा क़ानून जो सभी धर्म के लोगों पर समान रूप से लागू हो. दुनिया के अधिकतर देशों में ये क़ानून लागू है लेकिन भारत में ये अब तक लागू नहीं है. भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में जो मुख्य मुद्दे थे उसमे तीन तलाक और आर्टिकल 370 के साथ यूनिफार्म सिविल कोड भी शामिल था. तीन तलाक और आर्टिकल 370 पर काम हो चूका है. अब ये चर्चा है कि क्या सरकार का अगला मिशन यूनिफार्म सिविल कोड है.

ये चर्चा यूँ ही नहीं है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को टोका है कि 63 साल बीतने के बाद भी इस पर कोई गंभीर कदम नहीं उठाया गया, तो देश में ये मुद्दा एक बार फिर गर्म हो गया. भारत में गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ यूनिफार्म सिविल कोड लागू है. लेकिन बाकी राज्यों में ये अभी भी दूर की कौड़ी है.

पहले आपको यूनिफार्म सिविल कोड के बारे में थोड़ी जानकारी दे दें. देश में तमाम मामलों में यूनिफॉर्म कानून हैं लेकिन शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामले में यूनिफार्म सिविल कोड लागू नहीं है. मुस्लिमों में ये फैसले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करता है जबकि हिन्दुओं के लिए हिन्दू लॉ यानी कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत होता है. ईसाईयों के लिए अलग क़ानून है.

क्या है हिन्दू विवाह अधिनियम

हिन्दू विवाह अधिनियम या हिन्दू मैरेज एक्ट संसद द्वारा 1955 में पारित किया गया. 1956 में ये पुरे देश में लागू हो गया. हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत तीन क़ानून पास किये गए. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम और हिन्दू एडॉप्शन और भरणपोषण अधिनियम.

हिन्दू मैरेज एक्ट लागू होने के बाद एक शादीशुदा हिन्दू महिला या पुरुष बिना तलाक लिए दूसरी शादी नहीं कर सकते. हिंदू कपल शादी के 12 महीने बाद तलाक की अर्जी आपसी सहमति से डाल सकते हैं. तलाक कोर्ट के जरिये मिलेगा. नाबालिक संतान का पालन कौन करेगा ये भी तय करने की जिमेदारी कोर्ट को दी गई. हिन्दुओं ने इसे स्वीकार भी कर लिया.

क्या है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नियम

मुस्लिमों के लिए फैसले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करता है. मुस्लिम अब भी जितनी मर्जी उतनी शादियाँ कर सकते हैं. एक साथ तीन-चार बीवियां रख सकते हैं. तलाक के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है लेकिन महिला को 4 महीने 10 दिन तक यानी इद्दत पीरियड तक इंतजार करना होता है. एक महीने पहले तक तीन तलाक के जरिये पति पत्नी का रिश्ता ख़त्म हो जाता था लेकिन अब केंद्र सरकार ने संसद से तीन तलाक बिल पास कर इस प्रथा को ख़त्म कर दिया है. अब मुस्लिम पति-पत्नी को भी तलक कोर्ट के जरिये ही मिलेगा. लेकिन अभी भी बहुविवाह और उत्तराधिकार का फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधीन ही है.

क्रिस्चियन लॉ क्या कहता है

क्रिश्चियन कपल शादी के 2 साल बाद तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं, उससे पहले नहीं. यानी कि तीन धर्म के लिए तीन अलग अलग क़ानून है.

कोर्ट ने सरकार को क्यों टोका

सुप्रीम कोर्ट गोवा के एक संपत्ति विवाद केस की सुनवाई कर रही थी. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यूनिफार्म सिविल कोड पर टोका. कोर्ट ने कहा कि हिंदू लॉ 1956 में बनाया गया लेकिन 63 साल बीत जाने के बाद भी पूरे देश में समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के प्रयास नहीं किए गए. कोर्ट ने आगे कहा “संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात की गई है और संविधान निर्माताओं ने उम्मीद जताई थी कि पूरे भारत में नागरिकों के लिए इसे लागू करने का प्रयास किया जाएगा पर आज तक इस संबंध में कोई ऐक्शन नहीं लिया गया.

गोवा में क्या है नियम

जस्टिस दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस की पीठ शुक्रवार को गोवा के एक संपत्ति विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान गोवा का उदाहरण दिया. जस्टिस गुप्ता ने कहा “भारतीय राज्य गोवा का एक शानदार उदाहरण है, जिसने धर्म की परवाह किए बिना सभी के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किया है. गोवा में जिन मुस्लिम पुरुषों की शादियां पंजीकृत हैं, वे बहुविवाह नहीं कर सकते हैं. इस्लाम को मानने वालों के लिए तीन तलाक का भी कोई प्रावधान नहीं है.”

यूनिफार्म सिविल कोड का विरोध क्यों

भारत में धर्म सिर्फ धर्म नहीं बल्कि वोटबैंक होता है. हिन्दू धर्म ने हर कानून को स्वीकार कर लिया लेकिन जब भी पुरे देश में यूनिफार्म सिविल कोड की बात होती है तो कुछ दल ये कहते हुए विरोध में खड़े हो जाते हैं कि ये सभी धर्मों पर हिंदू कानून को लागू करने जैसा है. मुस्लिमों कहते हैं कि उनके सभी मामले उनके धार्मिक क़ानून के अधीन ही हल होंगे. सबसे ज्यादा बुरी स्थिति मुस्लिम धर्म के महिलाओं के लिए है जहाँ उन्हें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दोयम दर्जे का बना रखा है. महिला और पुरुष दोनों के लिए सारे नियम अलग अलग हैं.

खैर अब इस पर बहस शुरू हो ही गई है तो उम्मीद है मोदी सरकार इसपर भी कोई ठोस कदम उठाएगी. ठीक उसी तरह जैसे तीन तलाक और आर्टिकल 370 पर उठाया.