उद्धव ठाकरे के इस नए फैसले के बाद अटक सकती है बुलेट ट्रेन परियोजना

1820

महाराष्ट्र में नई सरकार को बने काफी दिन गुजर चुके हैं और नए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे रोज रोज नई नई चीजों को लेकर चर्चा में भी नजर आ रहे हैं. फिर चाहे वो शपथ ग्रहण समारोह में भगवा कपडे पहनने पर उठे सवाल हों या सदन में दिया गया उनका भाषण हो. जिसमें उन्होंने देवेन्द्र फडनवीस को लेकर अपने प्रेम को जाहिर किया था. लेकिन ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ भाषणों को लेकर ही चर्चाओं में हैं. अपने नए नए कामों के लिए भी उनकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज हो रही है. हाल में उन्होंने महाराष्ट्र मे कार शेड के लिए आरे में पेड़ों की कटाई को रुकवा दिया था.

और अब उन्होंने बड़ा फैसला लेते हुए मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी मुंबई अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना को बड़ा झटका दिया है. शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी की ये नई सरकार ने राज्य में चल रही सभी विकास परियोजनाओं की समीक्षा के सख्त आदेश दिए हैं इससे पहले इस परियोजना को तमाम दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा था जिसमें आदिवासियों और किसानों ने खुलकर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विरोध किया था.

ठाकरे ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि वो आम आदमी की आवाज बनकर काम करना चाहते हैं..ऐसे में वो वही फैसले लेंगे जो आम आदमी के हक में हों. इसके आलावा उन्होंने अपनी सरकार के किसान हितैसी होने का दावा करते हुए ये भी कहा कि राज्य सरकार किसानों का कर्ज माफ़ करने के लिए प्रतिबद्ध है, हालाँकि ये बात और है कि इस वक्त मौजूदा सरकार 5 लाख करोड़ के कर्ज में डूबी हुई है.. इसके आलावा जब पुरानी भाजपा और शिवसेना के गठबंधन सरकार की पहले की परियोजनाओं पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वो पुरानी भाजपा सरकार की नीतियों को भी साथ लेकर चलेंगे. क्यूंकि मेरे हिसाब से राज्य में जनता की भलाई की बात होनी चाहिए और इसमें कोई प्रतिशोध की राजनीती की बात नहीं है.. इससे पहले शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में भारतीय जनता पार्टी के ऊपर जोरदार तंज कसते हुए लिखा था कि विपक्ष हमारे 170 के आंकड़े को देखकर विधानसभा से दुम दबाकर भाग गया.

इसके आलावा ‘सामना’ में पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को भी खूब निशाने पर लिया गया.. मुखपत्र में लिखा गया कि राज्य के मुख्यमत्री के तौर पर फडनवीस ने तमाम गलतियाँ कीं जो उनको अब शायद विपक्ष के नेता के तौर पर नहीं करनी चाहिए.. हम आशा करते हैं कि विपक्ष के नेता के तौर पर वो राज्य की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे.. और अगर वो ऐसा नहीं कर सके तो राज्य की जनता सब देख रही है. शिवसेना जिस तरीके से पूर्व की सरकार को आड़े हाथों ले रही है उससे तो यही लगता है कि फिलहाल भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्तों में और तल्खी आ सकती है.. बाकी सियासत फायदों का खेल है जिसमें सिर्फ फायदों की बात होती है… रिश्ते पलक झपकते ही जुड़ सकते हैं और आँख खुलते ही टूट सकते हैं.. और कुछ ऐसा ही हाल ही में महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में देखा भी गया है..