उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण में सजेगी फ्यूज बल्बों की झालर

साल 2018, जब अमित शाह और भाजपा की रणनीतियों को मात देते हुए कर्नाटक ने कांग्रेस और जेडीएस ने मिल कर सरकार बना ली थी. उस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी लेकिन दोनों पार्टियों ने चुनाव बाद गठबंधन कर के भाजपा को सत्ता में आने से रोक दिया था. राज्य दर राज्य अमित शाह के हाथों मात खाए विपक्ष के लिए लम्बे अरसे बाद ख़ुशी का मौका आया था और इसलिए कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण को विपक्ष का पावर शो बना दिया गया.

अहा, क्या सुहाना दृश्य था, मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, सोनिया गांधी, सीताराम येचुरी, चंद्रबाबू नायडू, राहुल गाँधी, ममता बनर्जी सभी एक साथ एक मंच पर हाथों में हाथ डाले खड़े थे. एक से बढकर एक कैंडिड तस्वीरें क्लिक की जा रही थी. कभी मायावती के गले लगती सोनिया गाँधी तो कभी मायावती के पैर छूते तेजस्वी यादव. अहा ! कैसा सुहाना दृश्य था. साक्षात राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म चल रही थी “हम साथ साथ हैं”. इस दृश्य ने वामपंथी मीडिया के आँखों में सुहाने सपने सजा दिए. ये एकता ही 2019 में मोदी शाह कि जोड़ी को निपटाएगी. विपक्षी एकता के कसीदे पढ़े जाने लगे.

लेकिन 2019 में परिवार बिखर गया. किसी ने गहरी नींद से झकझोर कर वामपंथी मीडिया को जगा दिया और सुहाना सपना टूट गया. 15 महीने बाद ही सरकार गिर गई और येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बना ली.

अब आइये साल 2019 पर. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है. सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा मुंह ताक रही है और शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर सरकार बना रही है. पहली बार कोई ठाकरे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ रहा है. लोकसभा चुनाव, तीन तलाक, आर्टिकल 370 और राम मंदिर पर बुरी तरह छीछालेदर होने के बाद पहली बार कांग्रेस के दामन में खुशियाँ आई है. इसलिए उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण समारोह को एक बार फिर विपक्ष का पावर शो बनाने की कोशिश की जा रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, मायावती, अखिलेश यादव, अरविन्द केजरीवाल, तेजस्वी यादव, अशोक गहलोत, कमलनाथ जैसे नेताओं को न्योता भेजा जा रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में सभी नेता एक बार फिर अमित शाह और नरेंद्र मोदी के हाथों चोट खाए हुए हैं. पहली बार इन सभी के चोट पर मरहम लगी है इसलिए सेलेब्रेट करना तो बनता है. वैसे इनमे से कौन कौन उद्धव के साथ मंच साझा करने आएगा देखने वाली बात होगी.

कर्नाटक में दो पहियों की सरकार थी तो 15 महीनों में ही दम तोड़ गई. महाराष्ट्र में तो तीन पहियों की सरकार है. अमित शाह को जो जानते हैं उन्हें पता है कि अमित शाह चुप रहने वालों में से नहीं है. चोट खाने के बाद उनके पलटवार की ताकत से सब परिचित हैं. अब देखना है कि शिवसेना- कांग्रेस- एनसीपी की सरकार कितनी दूरी तय कर पाती है. कहीं उद्धव महाराष्ट्र के नए कुमारस्वामी साबित न हो.

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