इस वजह से ट्रम्प बार बार कश्मीर पर बदल रहे हैं अपना बयान

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर कश्मीर पर मध्यस्थता की इच्छा जाहिर की है. अगले साल अमेरिका में चुनाव होने वाले है. ऐसा लगता है कि ट्रम्प उससे पहेल कश्मीर मुद्दा सुलझाने का क्रेडिट ले कर नोबल शांति पुरस्कार पाने के ख्वाहिशमंद है. इसलिए भारत के कड़े ऐतराज के बावजूद हफ्ते दो हफ्ते पर ट्रम्प मध्यस्थता की बात कर देते हैं और उनका फैलाया रायता व्हाईट हाउस को सफाई दे कर समेटना पड़ता है.

ज्यादा दिन नहीं हुए जब इमरान खान की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की बात की थी आयर ये भी कहा था कि इस सिलसिले में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने उनसे बात की थी. ट्रम्प के दावे को भारत ने तुरंत खारिज कर दिया था, जिसके बाद खुद अपने अपने  ही देश में ट्रम्प को काफी फजीहत का सामना करना पड़ा था. व्हाइट हाउस को बयान जारी कर के मामले को संभालना पड़ा था. ट्रम्प के दावे के बाद जिस तरह से व्हाईट हाउस बैकफुट पर आया. साफ़ जाहिर था कि ट्रम्प ने ऐसी बात कर दी थी जिससे भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्ते पर असर पड़ सकता था.

लेकिन इस बार ट्रम्प ने एक नयी बात भी कही है. इस बार उन्होंने उन्होंने कश्मीर को धार्मिक एंगल दे दिया … मंगलवार को एक चैनल को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “कश्मीर बेहद जटिल जगह है. यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों हैं और मुझे नहीं लगता है कि दोनों अच्छी तरह से साथ रह पाए हैं. दोनों देशों के बीच लंबे वक्त से रिश्ते ठीक नहीं रहे हैं और साफ तौर पर कहूं तो ये बेहद ही विस्फोटक स्थिति है.”. उन्होंने आगे ये भी कहा कि “दोनों देशों के बीच बहुत सारी समस्याएं हैं और मैं मध्यस्थता या दूसरे तरीकों से कुछ करने की पूरी कोशिश करूंगा. दोनों देशों के साथ हमारे अच्छे रिश्ते हैं लेकिन दोनों इस वक्त आपस में दोस्त नहीं हैं. हालात जटिल हैं और इसमें धर्म की अहम भूमिका है. यहां धर्म एक जटिल मुद्दा है.”

आखिर अमेरिका कश्मीर पर बार बार बयान क्यों बदल रहा है? या यूँ कहें कि ट्रम्प बार बार बयान क्यों बदल रहे हैं कश्मीर पर? आखिर उनकी दिलचस्पी कश्मीर में अचानक से इतनी क्यों बढ़ गई है? .. इस बात का अगर विश्लेषण करें तो केंद्र में आता है पाकिस्तान.

अमेरिका लम्बे अरसे से अफगानिस्तान में फंसा हुआ है और वहां से निकलने की जद्दोजहद कर रहा है. उसकी तालिबान के साथ शांति वार्ता भी जारी है. इसमें उसकी मदद कर रहा है पाकिस्तान. पाकिस्तान अपनी इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहता है और इसी के एवज में वो अमेरिका को कश्मीर मामले में मध्यस्थता करने को बार बार कह रहा है. व्हाईट हाउस जानता है कि अफगानिस्तान से निकलने के अलावा पाकिस्तान से उसे अन्य किसी भी क्षेत्र में कोई भी मदद नहीं मिलने वाली. जबकि भारत वो देश है जो दुनिया की सबसे तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है. भारत से रिश्ते बिगाड़ने का जोखिम अमेरिका नहीं उठा सकता और अफगानिस्तान से निकलने तक पाकिस्तान को खुश रखना उसकी मज़बूरी है. इसलिए पाकिस्तान को खुश करने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प कश्मीर पर बयान जारी कर मध्यस्थता की बात कर देते हैं.

इस बात को आप ऐसे समझिये कि जब कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की बैठक बंद कमरे के भीतर हुई तो अमेरिका ने साफ़ साफ़ कहा कि कश्मीर भारत का आन्तरिक मामला है. इस मसले पर पाकिस्तान की तरफदारी करने वाला चीन अकेले पड़ गया . आधिकारिक तौर पर देखें तो अमेरिका पुरे मसले पर कहीं भी पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा है, सिवाय इसके कि वो समय समय पर कश्मीर पर एक दो बयान जारी कर देता है और पाकिस्तान उतने भर से ही खुश हो जाता है.

अमेरिका को लेकर आशंकित भारत से ज्यादा पाकिस्तान है. पाकिस्तान के न्यूज चैनलों पर चलने वाले डिबेट पर वहां के राजनीतिक विश्लेषक आशंका जाहिर करते हैं कि “तब क्या होगा जब अमेरिका, अफगानिस्तान से निकल जाएगा? फिर उसे पाकिस्तान की जरूरत क्यों होगी और फिर वो भारत जैसे मुल्क को छोड़ कर पाकिस्तान के साथ क्यों खड़ा होगा.” बस यही ये बताने के लिए काफी है कि अमेरिका बार बार कश्मीर पर बयान क्यों बदल रहा है .