आखिर कब तक मिलेगा मसूद को चीन का संरक्षण!

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पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने सभी कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिए हैं जिससे जैश-ए-मोहम्मद का सरगना आतंकी मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय टेररिस्ट घोषित किया जा सके. भारत पूरी कोशिश कर रहा है कि मसूद को यूनाइटेड नेशंस यानी यु.एन. के द्वारा प्रतिबंधित किया जाये. भारत के साथ यु एन के स्थायी सदस्य जैसे रूस, अमेरिका, फ्रांस कई बार यु एन में रेसोलुशन प्रस्तुत कर चुके हैं कि मसूद को यु एन रेसोलुशन 1267 के अंदर लिस्ट लिया जाये. यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी काउंसिल रेसोलुशन 1267 जिसे 1999 में यु.एन. ने पारित किया था और इसके अंदर ओसामा बिन लादेन के साथ तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय टेररिस्ट घोषित किया गया था.

अगर मसूद अंतर्राष्ट्रीय टेररिस्ट घोषित हो जाता है तो उस पर ट्रेवल प्रतिबंध, एसेट फ्रीज़ के साथ फंडिंग पर भी असर पड़ेगा.

मसूद को प्रतिबंधित करने के सभी प्रयासों पर चीन हस्तक्षेप कर रहा है जिससे मसूद को सीधा संरक्षण मिल रहा है. चीन और पाकिस्तान के संबंध बहुत अच्छे है और इसके चलते चीन मसूद के मामले में यु एन में  सिर्फ टेक्निकल होल्ड लगा रहा है. टेक्निकल होल्ड से तात्पर्य ये है कि चीन इस रेसोलुशन पर सिर्फ यु एन के नियमों के आधार पर ही रोक लगा रहा है क्योंकि जैश एक आतंकवादी संगठन है ये बात जग जाहिर है. चीन का ये फैसला सही इसीलिए नहीं है क्योंकि पाकिस्तान खुद जैश को 2002 में एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चूका है और प्रतिबंधित भी कर चूका है. हाला कि ये अलग बात है कि जैश से पाकिस्तान आयी एस आई का रिश्ता बहुत गहरा है जिसके चलते जैश के ट्रेनिंग, ऑफिस और फंडिंग बिना रुकावट चलते हैं.

इसके साथ 2018 में चीन में हुई ब्रिक्स समिट, जिसके चीन और भारत दोनों सदस्य हैं, में पहले ही सर्वसम्मति से जैश को एक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी चीन का स्टेंड ये है कि 2018 ब्रिक्स रेसोलुशन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है. ये चीन का कमाल है कि जैश एक आतंकवादी संगठन है और जैश का सरगना एक दम पाक साफ़.

मसूद को यु एन में चीन का संरक्षण 2009 से प्राप्त है. पिछले कुछ समय से अमेरिका का ये पक्ष रहा है कि पहले वो चीन को मसूद के मामले में तैयार करेगा और फिर यु एन में रेसोलुशन लाएगा ताकि मसूद पर आसानी से प्रतिबंध लग सके.

भारत चीन को इन वजहों से मसूद पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभी तक तैयार नहीं कर सका है. पहला, चीन और भारत के बीच रिश्ते. चीन और भारत 1962 में जंग कर चुके हैं. साथ ही दोनों के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद है. दूसरा, भरत और पाकिस्तान के सम्बन्ध बिलकुल अच्छे नहीं है. लेकिन पाकिस्तान और चीन के संबंध बहुत अच्छे है. चीन पाक का ये समीकरण भारत के लिए मुश्किल कड़ी कर देता है. तीसरा, 2017 में 16 जून से लेकर 28 अगस्त तक भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर ज़बरदस्त तनाव बड़ गया था. डोकलाम भूटान भारत और चीन का एक तिराहा है. यहाँ भारत कि सेना ने चीन कि सेना को रोड बनाने से रोक दिया था. और दोनों के सेना दो महीने तक बिलकुल आमने सामने थे. इस विवाद को ठंडा करने के लिए चीन और भारत ने विवादित मुद्दों को उठाना ठीक नहीं समझा.

चौथा और सबसे अहम है चीन पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर यानी CPEC जो चीन के काश्गर से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाता है. इस कॉरिडोर में चीन की 62 खरब यानी 62 बिलियन की इन्वेस्टमेंट कर चुका है. ये कॉरिडोर मनशेरा जिले से ग्वादर तक जाता है. इसी कॉरिडोर के पास बालाकोट भी है जो कि जैश का मुख्य केंद्र है. अगर चीन ने जैश को यु एन में प्रतिबंधित किया तो एक्सपर्ट्स ऐसा मानते हैं कि चीन के इस कॉरिडोर पर जैश के हमले हो सकते है जिससे ये पूरी इन्वेस्टमेंट पर असर पड़ेगा. इसी बालाकोट के पास चीन ने जमीन भी खरीदी है और काफी संख्या में चीनी नागरिक पाकिस्तान में रह रहे हैं. चीन अगर मसूद के खिलाफ यु एन में वोट करता है तो मसूद चीन के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है.

लेकिन पुलवामा हमले के बाद आतंकवाद से लड़ने कि एक नई सहमती विश्व भर में बनी है. हाल ही में यु एन ने खुद जैश का नाम लेकर पुलवामा हमले कि निंदा की है. लगभग सभी देशों ने भी इस हमले कि निंदा की है क्योंकि आतंकवाद 21स्वी सदी कि सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और ये आतंकवादी घटना किसी भी देश में हो सकती है और ये सभी के लिए एक चिन्ता का विषय है. मसूद को रेसोलुशन 1267 में लिस्ट करने के लिए 13 मार्च को एक बार फिर यु एन में वोटिंग होगी. पाकिस्तान पहले ही मसूद के बेटे और भाई को गिरफ्त में ले चूका है, अब देखना ये होगा की चीन 13 मार्च को कैसे वोट करता है. भारत के साथ पूरी दुनिया चीन से एक सकारात्मक एक्शन कि अपेक्षा रखती है.