अपराध और राजनीति की विरासत में डूबा बाहुबली त्रिपाठी परिवार

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तारीख थी 9 मई और साल था 2003, लखनऊ की पेपरमिल कॉलोनी में करीब 24 साल की एक युवती का उसके ही घर पर गोली मारकर क़त्ल कर दिया गया. ये युवती थी मशहूर कवियित्री मधुमिता शुक्ला. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी की मधुमिता शुक्ला.

ये मधुमिता शुक्ला जिसकी वीर रस की कवितायें सत्ता के सबसे ऊंचे सिंघासन पर बैठे प्रधानमंत्री को ललकार देती थीं, वो मधुमिता शुक्ला जिसे महज़ 16-17 साल की उम्र में ही कविताओं के मंच ने गोदी उठा लिया था, और इस मंच ने मधुमिता को ऐसे आगे बढ़ाया कि वो कभी पीछे नहीं मुड़ी.

बस थोड़े से वक़्त में ही मधुमिता शुक्ला कविताओं की दुनिया में एक सितारे की तरह चमक उठी. मंचों पर सम्मान बढ़ा और सियासत वालों से पहचान. बड़े मंच मिलने लगे बड़ा पैसा भी. एक वक़्त तो वो आ गया कि वो बड़े-बड़े मोटी रकम वाले सम्मेलनों का आयोजन भी करवाने लगीं.

लेकिन अब मधुमिता का क़त्ल हो चुका था और इस क़त्ल का में उंगली उठ रही थी मायावती सरकार के मंत्री, बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी की तरफ. खैर, हत्या हुई थी, पुलिस को भी आना ही था. पुलिस आई और शव को पोस्टमॉर्टेम के लिए ले जाया गया.

और पोस्टमॉर्टेम के बाद इसकी रिपोर्ट आई तो पता चला कि मधुमिता गर्भवती थीं. क़त्ल के वक़्त उनके पेट में 7 माह का बच्चा पल रहा था. मधुमिता की हत्या के बाद उनके गर्भवती होने की खबर ने लोगों को हिला कर रख दिया.

हर तरफ तरह-तरह की बातें चल निकलीं, लेकिन लोगों को असली झटका लगना अभी बाकी था. और ये झटका लगा तब, जब मधुमिता के गर्भ में पल रहे बच्चे का डीएनए टेस्ट हुआ.

ये बच्चा था उत्तरप्रदेश के बाहुबली नेता और मायावती सरकार के मंत्री अमरमणि त्रिपाठी का. इस रिपोर्ट ने उत्तरप्रदेश की सियासत को हिलाकर रख दिया. अमरमणि त्रिपाठी जैसे नामी-गिरामी नेता का नाम इस तरह की घटना में आ जाना बड़ी बात थी, बहुत बड़ी बात.

क्योंकि बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी का नाम उत्तर प्रदेश की सियासत का वो नाम था  था जो सुबह का नाश्ता सियासी रसोई से करता तो दोपहर का खाना जुर्म के ढाबे पर. कुछ छोटे-मोटे अपराध तो उन्होंने तब ही कर दिए थे जब वो राजनीति में ठीक से पाँव भी नहीं जमा पाए थे.

फिर उत्तर प्रदेश की राजनीत का सक्रिय नेता बन जाने के बाद अमरमणि त्रिपाठी ने दबंगई की जो इबारतें लिखीं उनका कहना ही क्या. एक दौर था जब अमरमणि त्रिपाठी पूर्वांचल की सियासत के बेताज बादशाह हुआ करते थे.

अमरमणि त्रिपाठी ने कांग्रेस के विधायक हरिशंकर तिवारी को अपनी राजनीतिक नींव बनाकर सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ना शुरू किया. एक बार रफ़्तार पाई तो फिर अमरमणि ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

आगे बढ़ते हुए अमरमणि त्रिपाठी को अब हरिशंकर तिवारी का उत्तराधिकारी कहा जाने लगा था. और अमरमणि ने हर राजनीतिक पार्टी में अपनी पहचान मज़बूत कर ली थी. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस या कि भारतीय जनता पार्टी, हर राजनीतिक दल में रह चुके अमरमणि कभी किसी एक पार्टी के ना हुए. वो हर उस पार्टी के होते रहे जो सत्ता में आती रही.

इतनी हनक थी 90 के दशक वाली सियासत में अमरमणि त्रिपाठी की कि इनके मामलों में इनसे बड़े कद वाले नेता भी हाथ डालने की हिम्मत नहीं करते थे. लेकिन ये भी सच है कि सियासत में किसी की भी ऐसी हनक बस तब तक ही रहती है जबतक उसकी कोई कमज़ोर नस विपक्ष के हाथ में नहीं आ जाती.

अमरमणि की भी ऐसी ही एक कमज़ोर नस सामने आ गई कवियित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के नाम पर. ये नस सामने आई तो विपक्ष की तरफ से राजनीतिक विवाद खड़े होने लगे, सवाल उठने लगे और मामला सौंप दिया गया सीबीआई को.

सीबीआई ने मामले की जांच की तो जनता को एक और झटका मिला. क़त्ल में अमरमणि त्रिपाठी के साथ शामिल थीं उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी.

अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी को 2 शूटर्स और उनके भतीजे सहित गिरफ्तार किया गया.  मधुमिता शुक्ला के नौकर का बयान लिया गया, और पाँचों आरोपियों को उम्रकैद की सज़ा सुना दी गई.

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग सियासत और अपराध का जो पुराना नाता बताते हैं, वो ठीक ही बताते हैं. वो कहते हैं कि सियासत के सफ़ेद कुर्ते पर अपराध का कलफ़ लग जाने से कुरते की चमक बढ़ जाती है. ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ.

अमरमणि त्रिपाठी ने बहुजन समाज पार्टी का दामन छोड़ समाजवादी पार्टी का साथ पकड़ लिया था. गोरखपुर जेल में कैद रहते हुए अमरमणि त्रिपाठी ने जेल के भीतर से ही चुनाव लड़ा और करीब 20 हज़ार वोटों से जीत भी हासिल की.

अब साल आ गया था 2015, और

“एक दुर्घटना हुई आगरा के करीब सिरसागंज-इटावा हाईवे पर. एक कार हाईवे से उतरकर पांच फीट नीचे जा गिरी. इस दुर्घटना में कार की पिछली सीट पर युवती की जान चली गई और ड्राईवर को बस छिटपुट खरोंच आई. ये दुर्घटना साइकिल से आ रही एक लडकी को बचाने के चक्कर में घटी.”

फिरोजाबाद पुलिस को एक दोपहर ऐसी ही कुछ सूचना मिली. इस सूचना के मुताबिक़ देखा जाए तो, ये महज़ एक आम सा सड़क हादसे का मामला भर लग रहा था. लेकिन ये मामला जितना आम लग रहा था, उतना था नहीं.

क्योंकि वो आदमी जो कार को चला रहा था, वो आम नहीं था. वो युवती जो कार की पिछली सीट पर बैठी थी, वो आम नहीं थी. कार चलाने वाला युवक था अमरमणि त्रिपाठी का बेटा अमनमणि त्रिपाठी, और पीछे बैठी युवती थी अमनमणि की पत्नी सारा सिंह.

ये कार दुर्घटना घटी उसके करीब एक साल पहले यानी 2014 से अमनमणि त्रिपाठी के खिलाफ ग़ैर-ज़मानती वार्रेंट ज़ारी था. लेकिन पुलिस ने अभी तक अमनमणि को गिरफ्तार नहीं किया था और भगोड़ा घोषित कर दिया था.

मौके पर पहुँची पुलिस को उन दोनों के बारे में जानकारी थी या नहीं ये हमें नहीं पता, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि पुलिस के वहाँ आने के बाद जो कुछ भी हुआ, सब आनन-फानन में हुआ.

ये दुर्घटना दोपहर में घटी थी और करीब 2 बजकर 30 मिनट पर युवती शव को डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल पहुंचा दिया गया. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि शाम के चार बजने से पहले ही युवती के शव का पोस्टमॉर्टेम भी हो गया.

एक तरफ दुर्घटना के बाद ये सब हो रहा था, और दूसरी तरफ दुर्घटना की खबर पहुँच गई थी लखनऊ के गृह विभाग, क्योंकि अमनमणि त्रिपाठी की पत्नी सारा सिंह थीं गृह विभाग के सचिव एस. के. रघुवंशी की भांजी.

दुर्घटना की खबर वहाँ तक पहुँची तो पुलिस अधिकारियों को पसीना आ गया. उन्हें समझ आ गया कि अब ये सवाल ज़रूर उठेगा कि भगोड़ा अमनमणि जब सामने आया तो उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? दुर्घटना को भूलकर सबसे पहले अमनमणि त्रिपाठी को आनन-फानन में गिरफ्तार किया गया और गिरफ्तार करने के बाद सारा के शव के साथ लखनऊ ले जाया गया.

सारा का शव लखनऊ पहुँचते ही कहानी में एक नया मोड़ जुड़ गया. कानाफूसी शुरू हुई कि ये महज़ एक हादसा नहीं है. पूरी घटना को अगर ठीक से देखा जाए तो इस तरह की बातों का होना बनता भी है.

क्योंकि जिस दुर्घटना में सारा सिंह अपनी जान गंवा बैठीं, उसी दुर्घटना में अमनमणि को बस मामूली खरोंचें आईं. इसके अलावा जब कार को अमनमणि चला रहा था, और गाड़ी में बस दो ही लोग थे, तो सारा पिछली सीट पर क्यों बैठी थीं? ऐसे बहुत से सवाल लोगों के ज़हन में कौंधने लगे.

सारा सिंह की माँ सीमा सिंह ने इस पूरी घटना की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग कर दी. उन्होंने मांग की नारको टेस्ट की. सारा के घर वालों के बयानों पर ध्यान दिया जाए तो ये साफ़ पता चलता है कि सारा और अमनमणि का रिश्ता ठीक नहीं चल रहा था. और इसी बात को सारा की माँ सीमा, सारा की मौत का कारण मानती हैं.

सारा और अमन की शादी से ना तो अमन के पिता अमरमणि ही खुश थे और ना ही सारा के परिवार वाले. लेकिन फिर भी मोहब्बत परवान चढ़ी और साल 2013 के जुलाई महीने में एक आर्य समाज मंदिर में दोनों की शादी हुई.

शादी के कुछ वक़्त बाद ही सारा के घर वालों ने दोनों के रिश्ते को अपना लिया, लेकिन अमरमणि ऐसा नहीं कर पाए और अमनमणि से नाराज़ ही रहे. ये नाराजगी इतनी थी कि शादी के बाद से सारा किअभी अपनी ससुराल यानी अमनमणि के घर नहीं गई. उनके परिवार की बात मानें तो यह भी एक वज़ह हो सकती है सारा की इस संदिग्ध मौत की.

मौत की वज़ह जो भी हो लेकिन इसके चलते अबतक भगोड़ा कहा जा रहा अमनमणि पुलिस की गिरफ्त में आ गया. लेकिन पुलिस की मुश्किलें अभी भी ख़त्म नहीं हुई. पत्रकारों ने अमन से सारा की मौत को लेकर सवाल कर दिए तो अमन के समर्थकों ने उनपर हमला कर दिया और उनके कैमरे तोड़ डाले.

अमन भी छूटने की पूरी कोशिश कर रहा था. उसने सारा का अंतिम संस्कार करने के लिए रिहाई की गुज़ारिश की, बेहोश होने का नाटक भी किया, लेकिन जेल तो उसे तब भी जाना ही पड़ा, क्योंकि भगोड़े अमनमणि पर गृह विभाग के साथ-साथ पूरे देश की नज़र टिक चुकी थी.

साल 2014 के अगस्त महीने से अमनमणि और उसके साथियों की पुलिस को तलाश थी. इसी महीने लखनऊ कैंट थाने में अमनमणि पर मुकदमा दर्ज हुआ था हमले का, अपहरण का और रंगदारी मांगने का. उसके खिलाफ ये मुकदमा दर्ज कराया था गोरखपुर के एक ठेकेदार ऋषि पाण्डेय ने. अमन के दो साथी गिरफ्तार भी हुए लेकिन अमन की पहुँच और पैसा उसे हर बार बचाते रहे. ऋषि पाण्डेय को धमकियां दी जाने लगीं और ये धमकियां इस हद तक बढ़ीं कि ऋषि को गोरखपुर शहर छोड़कर चले जाना पड़ा.

अमनमणि अक्सर सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देता रहा लेकिन पुलिस ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. अदालत सख्त हुई तो पुलिस ने उसके घरों पर छापे का नाटक खेला, लेकिन हाथ कुछ ना लगना था, ना लगा. थकने का, हारने का ड्रामा करने के बाद पुलिस ने उसके घरों पर कुर्की का नोटिस चिपकाया और काम ख़त्म हुआ.

संगीन आरोपों के बावजूद अमन का इतने दिनों तक गिरफ्तार ना होना, उसके गुर्गों का पत्रकारों से मारपीट करना राजनीति, पैसा, पॉवर और दबंगई की कहानी कहता है. यही सब तो है जो इंसान को क़ानून से खिलवाड़ करने की ताकत देता है.

यही सब तो वो वज़हें हैं जो राजनीति को बिज़नस में बदलती हैं. यही सब तो वो वज़हें हैं जो ‘हनक’ को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती रहती हैं. यही सब तो वो वजहें जिनके चलते एक अपराधी पिता का बेटा भी अपराध और सत्ता दोनों की तरफ जाने वाले रास्तों पर पाँव रख देता है.

लेकिन इन सब वज़हों से परे है देश का क़ानून. वो क़ानून जिसकी साख को ऐसे मामले दांव पर लगा देते हैं. और फिर इसी क़ानून के सामने सवाल लेकर खड़े हो जाते हैं ऋषि पाण्डेय और सारा के परिवार जैसे लोग, जो ना तो हार मानते हैं और ना ही टूटते हैं. इनके सवाल इतने तेज़ होते हैं जो क़ानून को क़ानून का कर्त्तव्य याद दिलाते हैं.

लेकिन हमें उम्मीद है कि एक ना एक दिन क़ानून इन सभी के साथ इन्साफ करेगा और एक दिन ऐसा भी आयेगा जब क़ानून को ये बताने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी कि क़ानून खुद क्या है.

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