देखिए कैसे The Print फैला रहा है कश्मीर के नाम पर प्रोपेगैंडा

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द प्रिंट की पत्रकार चित्रलेखा ने एक आर्टिकल लिखा जिसका title था ‘The idea of Kashmiriyat is dead and so is India’s secular consensus, कश्मीर से धारा 370 के हटने के हफ्तों बाद भी ये वही राग अलाप रहीं हैं जो की ये पहले भी अलापती थीं.

चित्रलेखा अपने आर्टिकल में बात करती हैं कश्मीरियत की जो कि धारा 370 के हटने से मर चुकी है, यहां ये बात समझ नहीं आ रही कि आखिर ये किस कश्मीरियत की बात कर रही हैं, कश्मीरियत तो 1990 में ही मर गयी थी, जब अपने ही भाइयों को कश्मीरियो ने मर डालने की ठान ली थी. कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर में अब बचा ही क्या था, सिर्फ नफरत और अलगाववाद की भड़कती लौ जो आये दिन कितने जवानों का गला घोट देती थी. क्या वो उसी कश्मीरियत की बात करती है जो कश्मीरियत वहां के लोगों ने अयुब पंडित को मौत के घाट उतार दिया था. वो भी एक कश्मीरी ही था, मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर निकल रहा था उसका जुर्म सिर्फ इतना था की उसने बाकियों की तरह आतंकवाद की राह नहीं पकड़ी थी, इसी लिए मर दिया गया. ये कौन सी कश्मीरियत हैं जिसमे जरा सी भी इंसानियत नहीं बची.

उलटे अब जा कर कश्मीरियत को पुनर्जागृत करने का काम शुरू हुआ है उसे पूर्णरूप से भारत में मिला कर. चंद्रलेखा जी को तब दिक्कत नहीं हुई जब secular कश्मीर को इस्लामिक कश्मीर में तब्दील कर दिया गया, अब जब उसे सुधारने की कोशिश की जा रही है तो इन्हें तकलीफ हो रही है. इनसे सहा नहीं जा रहा, इनको दर्द हो रहा है. इन्हें लगता है की कश्मीरियत का मतलब सिर्फ इस्लाम हैं, ये अपने एजेंडे को कश्मीरियत का मुखौटा पहना कर बेचते हैं. Secularism की बात करने वाले ये पत्रकार खुद ही साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं. ये आज भी कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं बनने देना चाहते. इन्हें ये बात अच्छे से पता होगी की कश्मीर में जो आतंकवाद पनप रहा था उसकी एक मात्र जड़ धारा 370 ही था जो कश्मीर और कश्मीरियों को भारत से अलग रखे हुए था.

इसके इस लॉजिक से तो भारत में जितने भी राज्य हैं उनके भारत में मिलने से उनकी सभ्यता ही खत्म हो गयी, जितने भी केंद्र शासित प्रदेश हैं उनकी तो खुद की कोई संस्कृति ही नहीं बची हो गई क्योंकि वो भारत मे मिल गए हैं, इनके लॉजिक के हिसाब से सिक्किम जैसे राज्य जो काफी बाद भारत का हिस्सा बने उनकी कोई विशेषता ही नहीं रही है, चित्रलेखा जी सही कह रहीं हैं, गुजरात महाराष्ट्र राजस्थान का कहाँ कोई अस्तित्व है अब, और अभी यही हश्र कश्मीर का भी होगा, अच्छा क्या अपने कभी सोचा है की 370 के हटने से सिर्फ कश्मीरियत को ही खतरा क्यों है, को कोई खतरा क्यों नही हैं. जम्मू कश्मीर सरकार ने जब रोहिंग्या मुसलमानों को लद्दाख में बसाया था तब तो ये काबिल पत्रकार कुछ नहीं बोले, आज वहां लद्दाख में भी आतंकवाद के मामले सामने आ रहे हैं. लेकिन आपके मन में संवेदना सिर्फ कश्मीरियों के लिए ही है. चंद्रलेखा जी अपने क्या कभी ये बोला है की कश्मीरियत को बचने के लिए कश्मीरी पंडितों को वहां बसाया जाये, ये कैसी कश्मीरियत है जो अपनों को ही स्वीकार नहीं कर पा रही ?