रिया चक्रवर्ती को बचाने के लिए द प्रिंट की जर्नलिस्ट ज्योति यादव ने पूरे बिहारी परिवारों को ‘विषैला’ बता दिया

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वामपंथ एक बहुत बड़ी बिमारी है. इसका इलाज हो सकता है. लेकिन अगर वामपंथ के साथ फेमिनिज्म मिल जाए तो ये कॉम्बिनेशन जह’रीला हो जाता है. फिर इसका कोई इलाज संभव नहीं. द प्रिंट की जर्नलिस्ट ज्योति यादव इसी बिमारी से जूझ रही है. सुशांत सिंह राजपूत मामले पर उन्होंने एक आर्टिकल लिखा और इस आर्टिकल में उन्होंने सुशांत मामले की मुख्य आरोपी रिया चक्रवर्ती को क्लीनचिट देते हुए बिहारी परिवारों की मानसिकता को टॉक्सिक (Toxic) यानी जह’रीला बता दिया. शेखर गुप्ता के पोर्टल द प्रिंट में पब्लिश ज्योति यादव के इस आर्टिकल का शीर्षक है “सुशांत सिंह राजपूत और विषैले बिहारी परिवारों में श्रवण कुमार बनने का बोझ

ज्योति यादव के अनुसार बिहारी परिवारों की मानसिकता जह’रीली है क्योंकि वो अपने बेटे की गर्लफ्रेंड को स्वीकार नही कर पाता. ज्योति के अनुसार बिहारी परिवारों की मानसिकता जह’रीली है क्योंकि वो चाहते हैं उनका बेटा श्रवण कुमार की तरह हो. ज्योति के अनुसार बिहारी परिवारों की मानसिकता और सोच जह’रीली है क्योंकि बिहारी परिवार हमेशा अपने बेटे को अपना लाडला समझते हैं.

ज्योति यादव अपने आर्टिकल में सुशांत की मौ’त का सारा दोष सुशांत के परिवार के बहाने समस्त बिहारी परिवारों पर मढ़ देती है. क्योंकि बेचारे सुशांत जैसे सारे बिहारी बेटे अपने ‘जह’रीली मानसिकता वाले’ परिवार के उम्मीदों के बोझ तले दबे होते हैं. श्रवण कुमार बनने की बोझ तले दबे होते हैं. लाडला बेटा बने होने के बोझ तले दबे होते हैं. एक नारीवादी होने की मजबूरी कहें या अपने आकाओं को खुश करने की चाहत. ज्योति यादव ने मुख्य आरोपी रिया चक्रवर्ती का बचाव करने के लिए न सिर्फ सारे बिहारी परिवारी की मानसिकता को जह’रीला बता दिया और अप्रत्यक्ष रूप से सुशांत जैसे बेटों की मौ’त का कारण भी बता दिया. बल्कि बिहारी परिवारों को जलील भी किया है.

एक बिहारी लड़का अगर अपने परिवार के उम्मीदों के बोझ तले दबा हो सकता है तो एक बंगाली लड़की अपनी ख्वाहिशों के बोझ तले दबी हुई क्यों नहीं हो सकती? वो लड़की एक महानगर में अपनी ख्वाहिशों को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए पागलपन भरी राहों से क्यों नहीं गुजर सकती? अपने जूनून को पूरा करने के लिए हर हद से क्यों नहीं गुजर सकती? अगर गुजर भी जाए तो ज्योति यादव जैसी फेमिनिस्टो को इससे कोई दिक्कत नहीं होगी. यही तो आज का फेमिनिज्म है. यही तो है ज्योति यादव जैसों के लिए वीमेन एमपॉवरमेंट. लड़का और उसका परिवार गलत हो सकता है लेकिन लड़की कतई गलत नहीं हो सकती.

ज्योति यादव के अनुसार एक बिहारी परिवार Toxic हो गया क्योंकि वो अपने बेटे के लिए इंसाफ चाहता है. एक बिहारी परिवार ज्योति यादव के लिए Toxic हो गया क्योंकि उसने एक लड़की को इसका जिम्मेदार ठहराया. नहीं ज्योति यादव Toxic बिहारी परिवार नहीं बल्कि Toxic तुम, तुम्हारी सोच और तुम्हारा ये फेक जर्नलिज्म है. तुमने न तो बिहार को समझा न बिहारी परिवार को. तुमने बस अपने एजेंडे को समझा है और जाना है. तुम्हारे बस नाम में ही ज्योति है, और मस्तिष्क में घना अँधेरा.