आजादी के बाद ऐसे हुई नेहरु की रणनीति फेल

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चीन द्वारा मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र में बचाने के बाद अरुण जेटली ने एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने लिखा कि कैसे नेहरु ने यूनाइटेड नेशंस कि परमानेंट सीट का ऑफर ठुकरा के वो सीट चीन को दे दी थी और उसी का खामियाजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है. लेख को काउंटर करने के लिए 18 मार्च को द हिन्दू में नेहरु के इस कदम को ठीक बताते हुए एक लेख प्रकाशित हुआ. इस लेख में इतिहास को अपनी सुविधा अनुसार लिखा गया.

तो चलिए इस लेख के बारे में आपको आसान भाषा में बताते हैं. आपको ये भी बतायेंगे कि नेहरु का ये फैसला कहाँ तक सही था और इस फैसले से नेहरु जो हासिल करना कहते थे क्या उसे वाकई वे हासिल कर पाए.
सबसे पहले इस लेख में ज़िक्र होता है शीत युद्ध यानी कोल्ड वॉर का. इस कोल्ड वॉर में दो नुक्लियर ताकतें USSR और अमेरिका आमने सामने थी.

1950 में चीन में सिविल वॉर ख़त्म हुआ था और इसके साथ 1950 के दशक में कोरिया में भी लड़ाई चल रही थी जहाँ एक खेमे को अमेरिका का समर्थन था और एक खेमे को USSR और चीन का समर्थन था. इसके साथ चीन और USSR कम्युनिस्ट देश थे और बहुत गहरे मित्र थे. लेख के अनुसार चीन को यु एन कि परमानेंट सीट देकर नेहरु भारत कि सुरक्षा, स्ट्रेटेजिक autonomy और सरकार द्वारा औद्योगीकरण को सुनिश्चित करना चाहते थे.

इस लेख में ये तीन शब्द सुरक्षा, स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी और औद्योगीकरण सबसे मुख्य हैं क्योंकि इन्हीं के पीछे नेहरु के समर्थक छिपते है और चीन को परमानेंट सीट देने के फैसले को सही बताते है. हम आपको इन तीनों लक्ष्यों के बारे में आगे बतायेंगे.

आगे लेख में लिखा है कि अगर भारत अमेरिका के परमानेंट सीट के ऑफर को स्वीकार कर लेता तो चीन भारत का हमेशा के लिए दुश्मन बन जाता. लेख के मुताबिक अमेरिका का ये ऑफर भारत को अपना साथी बनाने के लिए था न कि भारत कि मदद करने के लिए.

लेख के मुताबिक दूसरा कारण जिसकी वजह से नेहरु ने यु एन कि परमानेंट सीट छोड़ दी वो बताया गया है कि भारत अगर चीन को दरकिनार करके परमानेंट सीट हासिल कर लेता तो वो USSR, जिसने भारत की 1971 कि जंग में मदद की थी, उससे दुश्मनी मोल ले लेता.

सबसे बात करते हैं पहले कारण के बारे में. सुरक्षा, स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी और औद्योगीकरण. सुरक्षा का हाल ये रहा कि कश्मीर भारत को नहीं मिल सका.1962 में जिस चीन से नेहरु जी दोस्ती करना चाहते थे उसी ने भारत पर हमला कर दिया और भारत की बहुत बुरी हार हुई. इस युद्ध में देश को शर्मसार तब होना पड़ा जब अमेरिका जिससे नेहरु दूर भाग रहे थे उसके हस्तक्षेप से चीन ने अपनी सेना को वापिस बुलाया और युद्ध को विराम दिया.

वहीं स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी का मतलब था भारत न अमेरिका से और न USSR से सैन्य सम्बन्ध बनाएगा. क्योंकि अगर एक विरोधी से सैन्य सम्बन्ध सुधारते तो दूसरा भारत का दुश्मन बन जाता. लेकिन आप याद कीजिये 1971 कि जंग में भारत को USSR कि मदद लेनी पड़ी. जिसके बाद अमेरिका भारत के विरोध में खड़ा हो गया. वैसे भी स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी उन देशों की होती है जो खुद आर्थिक और सैन्य तौर पर ताकतवर हों. उस समय भारत न तो बड़ी अर्थव्यवस्था था और न बड़ी सैन्य ताकत था.

औद्योगीकरण कि बात की जाये तो नेहरु ने भारत कि इकॉनमी में पब्लिक सेक्टर को अहमियत दी वहीं निजी कंपनियों को बहुत कण्ट्रोल करके रखा गया. उस दौर में आपको सिर्फ ambassador कार और BSNL और MTNL landline ही उपलब्ध थे. इस इकनोमिक प्लानिंग का ये नुकसान हुआ की भारत कि इकॉनमी में competition न होने की वजह से इकॉनमी का मॉडर्नाइजेशन नहीं हो सका. यही वजह है जिसकी वजह से आज हम चीन, जापान और अमेरिका जैसे देशों से इतने पीछे हैं. इसी के परिणाम से 1991 में भारत को एक बड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और भारत को दिवालिया घोषित कर दिया गया और हमें मजबूरन वर्ल्ड बैंक से लोन लेना पड़ा.

जहाँ तक बात है USSR से सम्बन्ध अच्छे कर की तो ये बात साफ़ है कि नेहरु जी ने कोशिश तो की लेकिन उनकी दोस्ती 1962 में चीनी आक्रमण को नहीं रोक पाई. साथ ही चीन जो पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है उसका भी USSR कुछ नहीं कर सका. लेकिन अमेरिका से दुश्मनी के चलते हमारा कश्मीर का मामला ज्यों का त्यों ही रह गया और हमारी इकॉनमी का modernization भी नहीं हो सका.

आज अगर हम पीछे मुड़ के देखें तो हमें ये महसूस होगा की भारत को उस समय यु एन कि परमानेंट सीट हासिल कर लेनी चाहिए थी. परमानेंट सीट होती तो चीन हमसे खुद अच्छे सम्बन्ध बनाने की पूरी कोशिश करता. माना कि भारत पिछड़ा था लेकिन फ्रांस भी तो द्वितीय विश्व युद्ध में बुरी तरह से तहस नहस गया था. फ्रांस ने यु एन कि परमानेंट सीट को नहीं छोड़ा क्योंकि फ्रांस इस सीट कि अहमियत जानता था. देश हित सबसे ऊपर होता है लेकिन ये दुर्भाग्य है कि एक व्यक्ति की जिद की वजह से आज भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है.