ठाकरे हुई रिलीज़ , दर्शकों को आ रही है काफी पसंद

बाला साहेब केशव ठाकरे का महाराष्ट्र की राजनीति में क्या प्रभाव रहा है ये शायद हमेंं बताने की ज़रूरत नहीं है। अपने आप में ही एक शख्सियत हैं बाला साहेब ठाकरे जिनकी जिंदगी पर आधारित फिल्म ‘ठाकरे’ रिलीज़ हो गई है। फिल्म में बाल ठाकरे का किरदार नवाज़उद्दीन सिद्दीकी ने निभाया और खूब निभाया है। उनके अभिनय की तारीफ ट्रेलर लॉन्च के बाद से ही हो रही है और अब ठाकरे फिल्म भी रिलीज़ हो चुकी है, लिहाज़ा आप अगर बाल ठाकरे बायोपिक देखने के बारे में विचार कर रहे हैं तो पहले ठाकरे मूवी रिव्यू ज़रूर जान लें।

इस फिल्म में ये बताने की कोशिश की गयी है कि ठाकरे जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता है. बाल ठाकरे के हर एक्शन को फिल्म में जस्टिफाई करने की कोशिश की गयी है जिसको देखने में बेहद अटपटा लगता है.फिल्म की शुरुआत होती है 90 के दशक में जब मुंबई के दंगों और बाबरी मस्जिद के ढहने में ठाकरे के हाथ को लेकर अदालत में इनको तलब किया जाता है. उसके बाद फिल्म फ्लैशबैक में जाती है और ठाकरे के एक कद्दावर नेता बनने के सफर की बात करती है. बतौर कार्टूनिस्ट ठाकरे ने करियर की शुरुआत की थी और कुछ समय के बाद ही महाराष्ट्र की राजनीति में वो दखल देना शुरू कर दिया था. इन सभी को फिल्म में छोटी छोटी घटनाओं के माध्यम से दिखाया गया है.

आप भले ही बाल ठाकरे की राजनीतिक शैली और उनके राजनैतिक विचारों के विरोधी हों, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने अपने दौर की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी है।
उनके विचारों और कार्यशैली में हमेशा एक स्पष्टता रहती थी। ठाकरे फिल्म के महाराष्ट्र में काफी अच्छे रिस्पॉन्स की संभावना थी और वैसा ही नज़र भी आया। फिल्म का सब्जेक्ट, एक्टिंग, संवाद, म्यूज़िक सभी कुछ एक दम परफेक्ट नज़र आता है और दर्शकों पर एक प्रभाव भी छोड़ता है। बाल ठाकरे के किरदार में नवाज़उद्दीन सिद्दीकी ने कमाल किया है.वो बिल्कुल बाला साहेब ठाकरे के जैसे ही नज़र आए हैं उनसे ऐसे ही प्रदर्शन की उम्मीद थी और वो उन उम्मीदों पर खरा उतरे हैं.फिल्म में बाला साहेब ठाकरे की पत्नी की किरदार अमृता राव ने निभाया है

बात करें अगर संगीत-संवाद की तो फिल्म में गानों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। हालंकि, फिल्म का टाइटल ट्रैक दर्शकों को खूब पसंद आ रहा है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक काफी अच्छा है और फिल्म की पेस को बरकरार रखने में मदद करता है। कुल मिलाकर, जिन्हें शिवसेना का इतिहास जानने में दिलचस्पी हो, उनके लिए यह फिल्म ठीक है। जिन्हें राजनीति में दिलचस्पी है, वे भी इसे देख सकते हैं।लेकिन जिन्हें इन दोनों चीजों में रुचि नहीं है, वे बोर हो जाएंगे। मनोरंजन इस फिल्म में नहीं है, शायद ये निर्माता और निर्देशक का उद्देश्य भी नहीं था। फिल्म दरअसल एक खास वर्ग के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है ,और ऐसे ही इसका प्रमोशन भी किया गया है. बताने की ज़रूरत नहीं कि ये एक बायोपिक है जिसमें आप नाच गाने, outdoor location नहीं expect करते. कुल मिला कर फिल्म देखने लायक है, फ़िल्म की यूनिट ने काफी मेहनत की है.हम इसे 4 स्टार देना पसन्द करेंगे तो अगर आप ठाकरे देखने का प्लान कर रहे है तो जा सकते है.

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