सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी जानकारी आप भी कर सकते है हासिल! पढ़िए पूरी खबर

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सुप्रीम कोर्ट लगातार देश के बड़े मामलों पर फैसला सुना रहा है. राफेल हो, या राहुल गांधी का चौकीदार चोर का नारा.. सबरीमाला हो या राम मंदिर. इसी बीच में सुप्रीम कोर्ट ने एक और फैसला सुनाया जिसे भारतीय न्यायपालिका के लिए के नया दौर कहा जा सकता है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट भी आरटीआई के दायरे में आ गया है. कोर्ट का यह फैसला अपने आप में एक नजीर है. कोर्ट ने आदेश में कहा है कि क्‍योंकि वह एक पब्लिक ऑथरिटी है लिहाजा वह भी इसके दायरे में है. यह फैसला पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सुनाया जिसमें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस जे खन्ना, जस्टिस गुप्ता, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस रम्मना शामिल थे. सुप्रीम का फैसला आने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दिल्‍ली हाईकोर्ट के 2010 में दिए गए फैसले को ही बरकरार रखा गया है.


दरअसल साल 2007 में सुभाष चंद्र अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति का ब्‍यौरा जानने के लिए आरटीआई डाली थी जिसे खारिज कर दिया गया इसके बाद उन्होंने चीफ इनफार्मेशन ऑफिसर के यहाँ अपील दायर की. इस पर फैसला सुनाते हुए सीआईसी ने कहा कि क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट भी इसके दायरे में आता है इसलिए मांगी गई जानकारी सुप्रीम कोर्ट को देनी होगी. इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जनरल सेक्रेटरी और सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने दिल्‍ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दिल्ली हाई कोर्ट ने अग्रवाल के पक्ष में फैसला सुनाया था..इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया. इस मामले में मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना ने एक फैसला लिया जबकि एनवी रमण और डीवाई चन्द्रचूड़ ने अलग निर्णय लिया.

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सीजेआई का दफ्तर एक सार्वजनिक प्राधिकरण है और इसे सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत लाया जाना चाहिए. पीठ ने इस साल अप्रैल में इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.
सीजेआई रंजन गोगोई ने पहले यह कहा था कि पारदर्शिता के नाम पर एक संस्था को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए. नवंबर 2007 में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने आरटीआई याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से जजों की संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी थी जो उन्हें देने से इनकार कर दिया गया. हालाँकि अब इस बात को लेकर स्थिति स्पष्ट हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट आरटीआई के दायरे में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट सभी सवालों के जवाब देने के लिए बाध्य ही है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ़ साफ़ कहा है कि कोर्ट महज ये बताएगा कि कॉलेजियम के तहत इस अमुक जज के नाम की सिफारिश की गई है. आरटीआई के तहत इसके कारणों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाएगी. वहीँ कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि जानकारी लेने के लिए डाली गई आरटीआई का इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं हो सकता है.


कोर्ट का कहना था कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के ऑफिस की जानकारी देने के बारे में निर्णय लेने और देने के बारे में पारदर्शिता में संतुलन बनाए रखना होगा
जज की संपत्ति की सूचना के अलावा जजों की नियुक्ति, जजों की प्रोन्नति और उनके ट्रांसफर पर कॉलेजियम में लिए गए फैसलों की जानकारी दी जा सकती है. देश के मुख्य न्यायाधीश के बीच हुए पत्र व्यवहार और साथ ही सरकार और देश के मुख्य न्यायाधीश के बीच हुए पत्र व्यवहार की जानकारी दी जा सकेगी.