कहानी इमरजेंसी की ग्लैमर गर्ल की

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शकील बदायुनी का एक शेर है सियासत पर,

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ!

ये शेर बताता है कि कभी-कभी फूलों के रास्ते को छोड़ काँटों से खुद को बचाते हुए निकल जाना ही अच्छा होता है, क्योंकि कांटे तीखे तो होते हैं, लेकिन सामने होते हैं. फूल खूबसूरत होते हैं लेकिन सियासत करने में माहिर होते हैं.

भारतीय राजनीति में एक नाम है संजय गांधी. ये नाम ऐसा है जिसको किसी ने तीखा और चुभने वाला काँटा समझा तो किसी ने राजनीति करने वाला फूल. ये नाम किसी के लिए एक बड़े नेता के तानाशाह बेटे का है, और किसी के लिए अपने बनाए उसूलों को मानने वाले, राजनीतिक समझ रखने वाले, और सीधी- सपाट बात करने वाले कुशल नेता का.

अलग- अलग लोग संजय गांधी के बारे में अलग- अलग राय रखते हैं. उनके बारे में जब भी बात की जाती है तो उनकी एक बिलकुल नई ही छवि सामने आती है. साल 1975 से लेकर 1977 तक देश में जब इमरजेंसी लगी थी तब देश की सरकार ने परिवार नियोजन को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया. संजय गांधी के आदेश पर एक दौर चला था ‘नसबन्दियों’ का. जामा मस्जिद के आसपास के इलाके में नसबंदी करने वाले कैंपों का खौफ़ फैला हुआ था. दिल्ली में परिवार नियोजन के इस अभियान की जिम्मेदारी जिन चार लोगों को दी गई थी वे थे नवीन चावला, लेफ्टिनेंट गवर्नर किशन चंद, रुखसाना सुल्ताना और विद्याबेन शाह.

बहुत से लोग इस दौर की आलोचना करते हैं, जबकि बहुत से लोगों का मानना है कि अगर सरकार की तरफ से सख्ती ना की गई होती तो देश कभी छोटा परिवार- सुखी परिवार के बारे में सोचता भी नहीं. लेकिन सफाई कितनी भी दी जाए, तरफदारी कितनी भी की जाए, ज़बरदस्ती का जो तरीका जो सरकार ने उस वक़्त अपनाया था, वो था तो गलत ही. और सरकार के इस रवैये की सजा भी कांग्रेस को मिली. भारत का जनमानस कांग्रेस से दूर हुआ तो होता ही गया.

लोग बताते हैं कि संजय गाँधी में धैर्य नहीं था. वो बहुत ज्यादा नहीं सोचते थे. वो बस फैसला सुनाते थे, और उनके फैसले पर कोई ना- नुकुर करे, ये उन्हें पसंद नहीं था. उन्होंने ‘ना’ सुनना तो सीखा ही नहीं था. और यही वज़ह थी कि संजय गांधी के गलत हुक्म को भी मानने से उनके दरबारी मना नहीं करते थे, और सिर आँखों पर रखकर बजाते थे.

संजय गांधी कम बोलते थे और मुंहफट थे. राजनीतिक जानकार और पुराने अखबार बताते हैं कि संजय गांधी को अपने साथ काम करने वाले लोगों को इज्ज़त देना नहीं आता था. कोई उम्र में बड़ा हो या कि छोटा, संजय गांधी बात हमेशा आदेशात्मक लहजे में ही करते थे.

राजनीति में और सत्ता में उनकी कोई आधिकारिक भूमिका नहीं थी, लेकिन फिर भी सरकारी कामों में और इंदिरा गांधी के सरकारी फैसलों में उनकी खुली दखलंदाजी होती थी. इंद्र कुमार गुजराल से उनका टकराव आमने- सामने का था. उनके इस टकराव की वज़ह संजय गांधी का लहज़ा और इंद्र कुमार गुजराल का आत्मसम्मान ही था.

संजय गाँधी ने जब सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को आदेश दिया कि आकाशवाणी के सारे बुलेटिन उन्हे प्रसारण से पहले ही दिखाए जाएँ, तो इंद्र कुमार गुजराल ने साफ़ मना कर दिया. इंदिरा गांधी ने भी ये सब सुना लेकिन उन्होंने संजय गांधी को टोका नहीं.

एक किताब है जग्गा कपूर की लिखी हुई, इसमें उन्होंने ये लिखा है कि कैसे संजय गांधी ने एक बार इंदिरा गांधी की गैर मौजूदगी में इंद्र कुमार को बुलाकर कहा कि आप सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ठीक से नहीं चला रहे हैं. तब इंद्र कुमार गुजराल ने उनसे साफ़ कह दिया कि अगर तुम्हें मुझसे कोई बात करनी है तो सभ्य और विनम्र तरीके से करनी होगी.

संजय गांधी में वो सारे गुण थे जो एक चांदी के पालने में सोने वाले बच्चे में होते हैं और उनके इन गुणों का फायदा उठाना उनके सारे दोस्त जानते थे. संजय गांधी के एक बहुत ख़ास दोस्त थे मोहम्मद यूनुस. मोहम्मद यूनुस इंदिरा गांधी के बेहद करीबी दूतों और सलाहकारों में भी शामिल थे. उन्होंने संजय गांधी को उसी दौरान भड़काया कि उन्हें बीबीसी दिल्ली के ब्यूरो चीफ मार्क टली को अरेस्ट करवा लेना चाहिए, क्योंकि बीबीसी ने ये झूठी खबर ब्रॉडकास्ट कर दी है कि स्वर्ण सिंह और जगजीवन राम घर में नज़रबंद कर दिए गए हैं.

उस वक़्त बीबीसी दिल्ली के ब्यूरो चीफ मार्क टली ने खुद ही अपनी किताब में इस घटना के बारे में बताया है. इंद्र कुमार गुजराल को ये आदेश मिला कि मार्क टली को गिरफ्तार कराओ, उसकी पैंट उतरवाकर बेंत से पिटाई करवाओ और जेल में फिंकवा दो.

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इंद्र कुमार गुजराल ने फिर मना किया और कहा कि ये मंत्रालय का काम नहीं है. किताब की मानें तो इंद्र कुमार गुजराल ने फ़ोन काटा और बीबीसी की ब्रॉडकास्ट रिपोर्ट मंगाकर उसकी जांच की. जांच में उन्होंने पाया कि बीबीसी की तरफ से ऐसी कोई खबर नहीं चलाई गई है. इसके बाद उन्होंने इंदिरा गांधी को पूरी बात बताई.

लेकिन फिर भी इंद्र कुमार गुजराल से उसी शाम सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ले लिया गया. उनसे कहा गया कि इस मंत्रालय को सख्त हाथों में सौंपा जाना ज़रूरी है. इस पूरे प्रकरण को कोई भी रूप देने की कोशिश की गई हो, लेकिन लोग आजतक यही मानते और कहते है कि जब संजय गांधी को लगा कि इंद्र कुमार गुजराल किसी भी कीमत पर उनकी गुलामी नहीं करेंगे तभी उन्हें उनके पद से हटाया गया.

संजय गांधी के करीबियों में कोई भी ऐसा नहीं था जिसने इमरजेंसी के दौरान उनका फायदा ना उठाया हो. उनका फायदा उठाने वाले इन्ही लोगों में से एक थीं रुखसाना सुल्ताना. बॉलीवुड अभिनेत्री अमृता सिंह इन्ही रुखसाना सुल्ताना की बेटी हैं.

संजय गांधी और रुखसाना को लेकर बहुत से किस्से फैले और बहुत सी अफवाहें उड़ीं, क्योंकि रुखसाना एक छोटे से वक़्त में ही संजय गांधी के बेहद करीबियों में शुमार होने लगी थीं. संजय गांधी रुखसाना सुल्ताना को बहुत ख़ास मानते थे और इमरजेंसी के दौरान पुरानी दिल्ली में चल रहे नसबंदी कार्यक्रम का जिम्मा संजय गांधी ने रुखसाना को ही सौंप दिया था.

संजय गांधी ने उन्हें कम से कम 8 हज़ार मर्दों को नसबंदी के लिए प्रेरित करने का ज़िम्मा सौंपा था, लेकिन रुखसाना सुल्ताना ने 13 हज़ार से ज्यादा नसबंदी करवा डाली थीं. एक तरफ रुखसाना जामा मस्जिद के आस- पास के इलाके में खौफ़ का दूसरा नाम बनती जा रही थीं, तो दूसरी तरफ संजय गांधी की ख़ास.

रुखसाना का रुतबा ऐसा था कि बहुत से मुख्य मंत्रियों को भी जब संजय से मिलना होता तो वो रुखसाना के सहारे मिलते. बहुत से लोगों ने उस वक़्त रुखसाना पर ये आरोप भी लगाए कि उनके गुंडे नसबंदी ना करने के बदले लोगों से पैसे मांगते थे. जो पैसे ना देता उसके घर में तोड़-फोड़ की जाती और उसकी नसबंदी कर दी जाती.

बताया जाता है की संजय गांधी तक भी रुखसाना की शिकायतें पहुँचती, लेकिन संजय हर बार कहते थे कि ऐसा कुछ नहीं है, बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. संजय गांधी के ख़ास लोगों में उस वक़्त चार लोग हुआ करते थे. इनके नाम थे कमलनाथ, टाइटलर, सज्जन और रुखसाना. संजय गांधी के इन करीबियों को ‘गैंग फोर’ कहा जाता था. और रुखसाना को इमरजेंसी की चीफ ग्लैमर गर्ल.

अपने इस ख़ास खिताब का फायदा भी रुखसाना सुल्ताना ने खूब उठाया. उनकी गाड़ी देखकर मुस्लिम इलाकों के लोगों के शरीर सिहर उठते, लोग बताते हैं कि इस दौरान 18 साल के नौजवानों से लेकर 60 साल के बुजुर्गों तक की नसबंदी कर दी गई. हुआ कुछ भी हो, लेकिन संजय गांधी की नज़र में रुखसाना सुल्ताना का रुतबा बढ़ता गया, और साथ ही बढ़ती गई उनकी ताकत.

उनकी ये बढ़ती ताकत और संजय गांधी से बढ़ती उनकी नजदीकी बहुत से लोगों को रास नहीं आ रही थी. राजनीतिक गलियारों में उस वक़्त गूंजती चुगलियाँ तो यहाँ तक कहती हैं कि रुखसाना सुल्ताना के चलते इंदिरा, संजय और मेनका के बीच कई बार बहस भी हुई.

रुखसाना सुल्ताना ने दिग्गज पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह के भतीजे शिविंदर सिंह से शादी की थी. शिविंदर सेना में अधिकारी थी. कांग्रेस जब चुनाव हारी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी उसके बाद रुखसाना सुल्ताना को गायब सी हो गईं. उनका नाम जब कभी दुबारा राजनीति की गलियों में सुना गया तो फुसफुसाहटों में ही सुना गया.

बॉलीवुड के चर्चित डायरेक्टर मधुर भंडारकर ने एक फिल्म बनाई ‘इंदु सरकार’, ये फिल्म संजय गाँधी, रुखसाना सुल्ताना और इमरजेंसी पर आधारित थी. इस फिल्म के आने पर एक बार फिर रुखसाना सुल्ताना का नाम सुर्ख़ियों में आया और चला गया.

खैर, संजय गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो एक कम बोलने वाले मुंहफट इंसान थे. वो कम बोलते थे पर सटीक और साफ़ बोलते थे. उन्होंने इज्ज़त करना सीखा ही नहीं था. वो सभी से एक ही सुर में बात करते थे. छोटा हो या बड़ा हो उन्हें किसी भी बात से फर्क ही नहीं पड़ता था.

उनको जानने वालों ने एक चर्चित मीडिया संस्थान से बातें करते हुए ये बताया कि वो वक़्त के बहुत पाबन्द थे. इतने पाबन्द कि उनके दिनभर के काम देखकर उनसे घड़ी मिलाई जा सकती थी. वो किसी काम को करने के लिए हामी भर देते तो उसे करने की हर कोशिश भी करते.

संजय गांधी की नकारात्मक छवि को उनका रूखा रवैया और ज्यादा नकारात्मक बनाता था. फिर उसके बाद उनके चालाक और फायदा उठाने वाले करीबी उनकी उस नकारात्मक छवि पर सोने के वर्क का काम करते थे. संजय गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो बिना डिग्री वाले ऑटोमोबाइल इंजिनियर बनना चाहते थे. ऑटोमोबाइल में अपना करियर बनाने के लिए वो इंग्लैंड निकल गए और रोल्स-रोयस में तीन साल तक इंटर्नशिप करने के बाद लौटे.

साल 1971 में संजय गांधी ने दबाव दिया तो सरकारी कैबिनेट की तरफ से देश में एक ऐसी कार बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया जिसे मध्यमवर्गीय परिवार भी खरीद सकें. इस प्रस्ताव के पारित होते ही मारुती मोटर्स लिमिटेड के गठन ओ मंजूरी मिली और इसके निदेशक बने संजय गांधी.

कोई खास तजुर्बा ना होने के बावजूद संजय को ये पद मिलना बड़ी बात थी, हंगामा हुआ, आवाज़ भी उठी, लेकिन हर हंगामे, हर उठती आवाज़ को सत्ता की ताकत तले दबा दिया गया. संजय निदेशक बने रहे और मारुती संजय की ज़िंदगी में एक भी मॉडल लांच नहीं कर सकी. संजय की मौत के करीब एक साल बाद मारुती की पहली कार मारुती 800 बाज़ार में उतरी और हंगामा मचा दिया.

मारुती के निदेशक होने के दौरान संजय गांधी सुबह ही गुरुग्राम में स्थित मारूती कम्पनी निकल जाया करते थे. लेकिन इंदिरा गांधी का एक हुक्म था कि दोपहर का खाना सब घर पर एकसाथ खायेंगे. संजय गांधी इंदिरा के इस हुक्म को पाबंदी से बजाते थे. दोपहर ठीक 12 बजकर 55 मिनट पर वो अपने घर पर होते.

दिन के 2 बजे के बाद से वो कांग्रेस के नेताओं से मुलाक़ात शुरू करते. छुटभैये नेता, दिग्गज नेता या मंत्री, कोई भी आये, संजय गांधी ना तो किसी के स्वागत में कुर्सी से उठते और ना ही हाथ मिलाते. शराब, सिगरेट, चाय, ठंडा कुछ भी पीने का शौक संजय गांधी नहीं पालते थे. बस एक रफ़्तार ही थी जिसे उनका शौक और जूनून दोनों कहा जा सकता है. वो खुद कार चलाते थे और बहुत तेज़ रफ़्तार से चलाते थे. इतनी तेज़ रफ़्तार से कि उनके साथ बैठने वालों के हाथ-पाँव फूल जाते थे.

हवाई जहाज उड़ाने का शौक भी उनके रफ़्तार के जूनून का ही एक हिस्सा था. वो जब भी उड़ान भरते तो हवा में खूब गोते लगाते. और यही गोते उनकी जान के दुश्मन बन गए. मेनका गांधी उनकी इस आदत से बहुत डरती भी थीं. जिस दिन वो आख़िरी बार हवाई जहाज उड़ाने जा रहे थे मेनका गांधी ने और इंदिरा गांधी ने उन्हें समझाना भी चाहा था कि वो हवा में गोते ना लगाएं, लेकिन जबतक इंदिरा घर के बाहर निकलतीं संजय गांधी अपनी कार लेकर घर से निकल गए.

वो दिन संजय गांधी की ज़िंदगी का आख़िरी दिन था. एक हादसा हुआ और संजय गांधी अपनी जान से हाथ धो बैठे. नेता कमलनाथ एक लम्बे वक़्त तक उनकी तस्वीर अपने ड्राइंग रूम में लगाए रहे. वो संजय गांधी को अपना नेता भी कहते थे और अपना दोस्त भी.

हर एक इंसान की दूसरे इंसान को लेकर एक राय होती है, कोई किसी को अच्छा कहता है तो कोई किसी को बुरा, लेकिन संजय गांधी कैसे इंसान थे इसका फैसला करने वाला हमें आजतक कोई नज़र नहीं आया. अगर किसी ने हमें संजय गांधी की अच्छाइयां गिनाईं तो बुराई के साथ गिनाईं, और किसी ने बुराई भी की तो वो अच्छाइयों की बात किये बिना ना रह सका. दुनिया के रंगमंच में आकर चले गए ऐसे ही समझ ना आने वाले किरदारों के लिए फ़ारूक़ शफ़क़ ने कहा,

सब ड्रामे के किरदार घर चल दिए,
सामने एक पर्दा पड़ा रह गया!

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