क्या अब धार्मिक स्थलों के सामने से गुज़रते हुए बारातों को खामोश होना होगा?

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मध्यप्रदेश में देवास जिले की सोनकच्छ तहसील के एक गाँव पिपलियारावान में दलितों के यहाँ बरात आई थी. ख़ुशी का माहौल था. रस्मों और रीति-रिवाजों के शुरू होने का वक़्त था. शुरुआत हुई. बारात गाजे-बाजे के साथ द्वारपूजन की रस्म के साथ निकली.

बरात चली, खुशियों से भरे हुए गाने बजे, और खुशियों से भरे इन गानों की धुन पर नाचते हुए बाराती भी खुशी मनाते आगे बढ़ने लगे.  कुछ दूर तक चलने के बाद ये बारात मातम में बदल गयी और खुशियों का दौर गम में.

दलित समुदाय की ये बरात आगे पहुँची तो कुछ लोगों ने बारात पर आपत्ति जताई, और आपत्ति जताई इसमें बज रहे गानों की आवाज़ पर. गानों की तेज़ आवाज़ पर आपत्ति जताते इन लोगों ने बारातियों से गाने की आवाज़ कम करने को कहा और बारातियों ने उनकी इस बात को अनसुना कर दिया.

बस इतनी सी वज़ह ने सबकुछ बदलकर रख दिया. आपत्ति जताने वाले लोगों ने दलितों की उस बारात पर अंधाधुंध पत्थर बरसाना शुरू कर दिया और शुरू कर दिया उन्हें मारनापीटना. इस हिंसक घटना में बहुत से बाराती घायल हुए और धर्मेन्द्र शिंदे नाम के एक बाराती की मौत भी हो गई.

इस पूरी घटना को सुनने के बाद आपके मन में बरात पर हमला करने वालों की जो छवि बनी होगी वो बनी होगी सवर्णों की. ऐसे सवर्णों की जो दलितों से चिढ़ते हैं, उनको नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं. ऐसा इस वज़ह से क्योंकि देश का बुद्धिजीवी मीडिया शोर ही सिर्फ उन मुद्दों पर करता है जिसमें वो दलित-सवर्ण एंगल निकाल पाता है.

इस खबर में बारात पर पत्थरबाजी करने वाले लोग मुस्लिम समुदाय के थे. दलितों की ये बरात जब मस्जिद के सामने से गुज़री तो मुस्लिम समुदाय के लोगों को गानों की आवाज़ से आपत्ति हुई. गानों की आवाज़ को जब धीमा नहीं किया गया तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दलित समुदाय की इस बारात पर हमला कर दिया.

धर्मेन्द्र शिंदे नाम का एक बाराती मामले को शांत करने की कोशिश में लग गया और बीच-बचाव करने लगा. इसी बीच-बचाव की कोशिश में एक बड़ा सा पत्थर उसके सिर पर लग जाने से धर्मेन्द्र की मौके पर ही मौत हो गई.

धर्मेन्द्र के अलावा और भी बहुत से बाराती घायल हुए. घायल हुए इन बारातियों में से दो बारातियों को गंभीर चोटें आई हैं. इन घायल बारातियों को हस्पताल में भर्ती कराया गया है और इनका इलाज चल रहा है.

एक चर्चित मीडिया संस्थान जनसत्ता की रिपोर्ट बताती है कि जिस जगह यह घटना हुई उससे कुछ ही दूरी पर पुलिस स्टेशन भी था. कुछ बारातियों का कहना है कि अपने बचाव के लिए जब वो पुलिस स्टेशन पहुंचे तो इस भीड़ ने उनको पुलिस स्टेशन के अन्दर भी मारा.

मामला यहाँ तक बढ़ गया कि पुलिस को सबकुछ शांत करने के लिए बल प्रयोग तक करना पड़ा. पुलिस ने जैसे-तैसे तुरंत तो माहौल को शांत तो करा दिया लेकिन इसके कभी भी खराब होने की आशंका बनी हुई है.

कुछ बातें हैं इस घटना को लेकर जो हमारी समझ में अभी तक नहीं आई हैं और हमें हैरान करती हैं.

बारात में बज रहे गानों से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? वो भी ऐसी आपत्ति जो पथराव करने और किसी की जान तक ले लेने पर मजबूर कर दे?

मस्जिद के सामने से गुज़र रही बारात कितनी देर तक उसी जगह पर मौजूद रहती. जैसे ही आई थी, वैसे ही गुज़र नहीं जाती क्या?

जहाँ पर ये घटना हुई उससे कुछ ही दूरी पर मौजूद पुलिस स्टेशन से पथराव करने वाले इन लोगों को ज़रा सा भी डर नहीं लगा होगा क्या?

क्या इस खबर के बारे में किसी भी मीडिया संस्थान को खबर नहीं लगी होगी? ज़ाहिर है लगी होगी, लेकिन हमारी यह रिपोर्ट तैयार होने तक हमें जनसत्ता के अलावा और किसी समाचार वेबसाइट पर इस घटना की जानकारी नहीं दिखी, ऐसा आखिर क्यों?

फिलहाल जिस जगह यह घटना हुई वहाँ का माहौल भारी बना हुआ है. इलाके में किसी अनहोनी की आशंका से बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया है. धारा 144 लागू कर दी गयी है और पुलिस अधिकारी भी समय-समय पर माहौल का जायजा ले रहे हैं.

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