पुत्रमोह में पूरी पार्टी का बेड़ा गर्क, भारतीय राजनीति की धृष्टराष्ट्र बन गईं सोनिया गाँधी

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पुत्रमोह चीज ही ऐसी है कि इंसान को कुछ नहीं दिखता या फिर वो कुछ देखना नहीं चाहता. पुत्रमोह में धृतराष्ट्र ने पूरे कुरुवंश का नाश कर दिया था. अब सोनिया गाँधी पुत्रमोह में पूरे कांग्रेस का नाश करने पर तुली हैं. हर उस युवा नेता को किनारे लगाया जा रहा है जो राहुल गाँधी से ज्यादा काबिल हैं और उनके पीएम बनने की रह में रोड़ा बन सकता है. हर उस युवा नेता को जलील किया जा रहा है जिनका कद राहुल गाँधी से बड़ा होता जा रहा है. पुत्रमोह चीज ही ऐसी है. इस पुत्रमोह पर तो लोग जोक्स भी बना रहे हैं कि एक गदहे को घोडा बनाने के चक्कर में कांग्रेस अपना पूरा अस्तबल लुटा बैठी.

ये पहली बार नहीं है जब गाँधी परिवार के चश्मों-चिराग को शहंशाह बनाने के लिए पार्टी के काबिल और युवा नेताओं की बलि ले ली गई हो. अतीत में भी ऐसा हो चुका है. इतिहास खुद को दोहरा रहा है. 1984 में जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने तो उस वक़्त पार्टी में माधव राव सिंधिया, राजेश पायलट जैसा युवा चेहरे थे पार्टी के पास, जो पार्टी को अपना सबकुछ दे रहे थे. लेकिन जब पीएम पद की बारी आई तो अचानक से राजीव गाँधी को उठा कर पीएम पद पर बैठा दिया गया. उस दौर में भी मोतीलाल बोरा, बिद्याचरण शुक्ल जैसे बुजुर्ग थे जिनकी पूरी राजनीति गांधी परिवार की चाटुकारिता करते हुए गुजरी थी. उन्होंने गाँधी परिवार की नयी पीढ़ी के साथ अपनी निष्ठा जता दी और केंद्र में कभी युवा नेताओं को गाँधी परिवार के करीब या उनसे आगे निकलने ही नहीं दिया.

दरअसल गाँधी परिवार कभी अपने खिलाफ विरोध की आवाज सुनने का आदि नहीं रहा. गाँधी परिवार में बच्चे पैदा नहीं होते बल्कि प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पैदा होते है. पार्टी के बुजुर्ग गाँधी परिवार के अलावा किसी और को अध्यक्ष पद पर स्वीकार कर नहीं सकते, पीएम पद पर गाँधी परिवार के अलावा किसी और को कैसे बर्दास्त करेंगे. उन्हें पता है कि गाँधी परिवार की चाटुकारिता में उनका भविष्य सुरक्षित है.

कांग्रेस में युवा और मेहनती युवाओं के पास दो ही रास्ते होते हैं- या तो चाटुकारिता करते हुए पूरी ज़िन्दगी पार्टी में बिता दो या फिर अपना रास्ता अलग कर लो. ममता बनर्जी ने अपना रास्ता अलग किया और बंगाल में अपनी अलग पहचान बनाई.

साल 2004 में राहुल गाँधी के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद , संदीप दीक्षित और 2009 में सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं की फ़ौज लोकसभा पहुंची तो लगा कि अब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन होगा और कमान युवाओं के हाथ आएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, कमलनाथ जैसे उम्रदराज नेता गाँधी परिवार के इर्द गिर्द एक सुरक्षा आवरण बनाए रहते ताकि किसी युवा नेता की पहुँच गांधी परिवार तक या फिर सत्ता के गलियारे तक हो ही न पाए. राहुल गाँधी खुद जिम्मेदारियों से भागते रहे और चाटुकारों के घेरे में सिमटे रहे जो उनके ये हसीन सपने दिखाता था कि वो ही पीएम बनेंगे. राहुल गाँधी न कभी जनता से जुड़ पाए और न कभी जमीन से.

राजस्थान में सचिन पायलट, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद और महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा जैसे युवा तुर्क गाँधी परिवार के महत्वकांक्षा के तले जाया होने लगे. इन सभी नेताओं में राहुल गाँधी से ज्यादा काबिलियत है जनता की नज़रों में लेकिन गाँधी परिवार के लिए ये नेता काबिल नहीं बल्कि राहुल के पीएम बनने की राह में रोड़ा हैं. पार्टी अध्यक्ष पद म्यूजिकल चेयर की तरह सोनिया गाँधी से राहुल गाँधी और राहुल गाँधी से सोनिया गाँधी के बीच घूम रही है या यूँ कहें कि पार्टी के बुजुर्ग नेता घुमा रहे हैं. उन्हें पता है यदि पायला, सिंधिया, देवड़ा जैसा कोई युवा अध्यक्ष बन गया दुग्विजय, कमलनाथ, गहलोत जैसे बुजुर्गों को मलाई मिलनी बंद हो जायेगी. इसलिए युवाओं को इस हद तक दबाया गया कि उन्हें कांग्रेस में घुटन होने लगी. नतीजा सबके सामने है. .. एक दिन सब पार्टी से निकल जायेंगे बस सोनिया राहुल और प्रियंका रह जायेंगे .. तब उनकी चरण पादुका उठाने वाला भी कोई नहीं रहेगा.