भारतीय सेना की इन खूबियों के बारे में नहीं जानते होंगे आप

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पाकिस्तान हमसे हमारा कश्मीर छीनना चाहता है. वो खुद को हमसे ज्यादा ताकतवर साबित करना चाहता है. और इसके लिए वो चार बार हमसे जंग भी लड़ चुका है. लेकिन हमारी सेनाएँ उसे हर बार हराकर ये याद दिला देती हैं कि, वो ताकतवर होने का कितना भी दम भर ले, लेकिन सच यही है कि वो हमसे अलग हुआ एक टुकड़ा भर ही है.

जब- जब पाकिस्तान ने हमारी सेना से टकराने की कोशिश की, तब- तब ऐसी- ऐसी चोटें दी हैं भारतीय सेना ने पाकिस्तान को कि उनका दर्द कुछ पुश्तों तक तो याद रहेगा ही. और शायद ये दर्द ही हैं जिनके चलते पाकिस्तान आतंकवाद को शै देता है, और भारत पर कायराना हमले कराकर बदला लेने की कोशिश करता रहता है.


घुसपैठ और आतंकी हमलों की मदद से पाकिस्तान ना जाने कितनी बार हमारी पीठ पर वार कर चुका था. लेकिन साल 2016 में भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया और बताया कि हम जैसे को तैसा कर के दिखाने में भी उतने ही इंटरेस्टेड हैं जितने कि आमने सामने की लड़ाई में. और हाँ! हम छुपकर धोखे से फिदायीन हमला नहीं करते, सामने से आकर मारते हैं.

सर्जिकल स्ट्राइक में इंडियन आर्मी की स्पेशल फोर्सेज ने ख़ास रोल निभाया. हमारे कमांडो किस तरह इलाका धुंआ- धुंआ कर के आये थे ये बात किसी से नहीं छुपी है. लेकिन हमारे पास कितनी तरह की स्पेशल फोर्सेज हैं ये बात बहुत कम लोग जानते हैं. तो आइये आज हम आपको देश की ऐसी ही कुछ फोर्सेज के बारे में बताते हैं.

1. मार्कोस

ये एक स्पेशल मरीन फ़ोर्स है जिसका गठन साल 1987 में किया गया. ये इंडियन नेवी के अंतर्गत काम करती है. इन्हें खुली छूट होती है कि अगर कुछ भी संदिग्ध लगे तो ये बेझिझक सख्त से सख्त कार्रवाई करें. मार्कोस को समुद्री डाकुओं और आतंकियों के खिलाफ मैदान में उतारा जाता है. ये इतने तैयार होते हैं कि किसी भी तरह के आतंकी हमले से निपट सकते हैं. लेकिन समुद्र के मामले में इनको कोई छूकर भी नहीं गुज़रता. मार्कोस विश्व की सबसे घातक फोर्सेज़ में दूसरे नंबर पर है.

ट्रेनिंग के दौरान इन्हें शारीरिक तौर पर भी मज़बूत किया जाता है और मानसिक तौर पर भी. इसकी ट्रेनिंग शुरू होने से पहले का फिजिकल टेस्ट इतना मुश्किल होता है कि करीब 20% कैंडिडेट ही इसे पास कर पाते हैं. इनकी बेसिक ट्रेनिंग के बाद इन्हें पैरा जंपिंग और डाइविंग की भी जबरदस्त ट्रेनिंग दी जाती है. इनकी ट्रेनिंग कितनी टफ होती है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हाथ पैर बंधे होने के बावजूद भी ये आसानी से तैर सकते हैं. ऐसा बताया जाता है कि इन कमांडोज़ के परिवार को भी नहीं पता होता कि वो कमांडो हैं.

2. पैरा कमांडोज

इंडियन आर्मी की सबसे ज्यादा ट्रेंड स्पेशल फोर्स है पैरा कमांडोज़. साल 1965 में भारत-पाक जंग के दौरान इसका गठन किया गया. साल 1971 और 1999 के युद्ध में इन्ही पैरा कमांडोज ने पाकिस्तान को भारत की ताकत का अंदाज़ा कराया. ये इंडियन एयरफोर्स का हिस्सा होते हैं. पैरा कमांडोज भारतीय वायुसेना के पैराशूट रेजीमेंट का हिस्सा होते हैं. भारतीय सेना ने मौजूदा वक्त में टाइगर हिल्स जैसे दुर्गम पहाड़ी इलाकों की सुरक्षा के लिए पैरा कमांडोज को ज़िम्मेदारी दी है. साल 1971 में हुई भारत-पाक जंग में 700 पैरा कमांडोज़ ने मिलकर जंग का रुख मोड़ दिया. सर्जिकल स्ट्राइक को भी भारतीय सेना के इन्ही लड़ाकों ने अंजाम दिया था.

आसमान के अलावा इन्हें जमीन पर भी कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है. ये आसमान में 30 हजार फीट की ऊंचाई से छलांग लगाकर दुश्मन को मिटा सकते हैं. हर पैरा कमांडो को दो पैराशूट दिए जाते हैं. एक मेन और एक इमरजेंसी.

3.घातक फोर्स

ये इंडियन आर्मी की स्पेशल फ़ोर्स है जो मैन टू मैन असाल्ट के समय बटालियन में सबसे आगे रहती है. ये दुश्मन पर सीधा हमला करने के लिए ट्रेंड किये जाते हैं. ये फ़ोर्स इतनी ताकतवर होते हैं कि एक जवान अकेला कई सैनिकों को धूल छठा सकता है. जंग के लिए इनके पास आईडब्ल्यूआई तवोर टीएआर-21, एके-47 एसाल्ट राइफल मौजूद होती हैं.

ट्रेनिंग के दौरान इन कमांडोज़ को 20 से 60 किलोमीटर बैटल ग्रियर राउंड स्पीड मशीन चलवाई जाती है. हाई एल्टीट्यूड वार ट्रेनिंग देने के बाद इन फोर्स कमांडोज़ को ब्रिटिश आर्मी के साथ भी ट्रेनिंग दिलाई जाती है.

4.गरुड़

गरुड़ इंडियन एयरफोर्स का हिस्सा होते हैं. इन्हें इंडियन स्पेशल फोर्स की सबसे कठिन और लम्बी ट्रेनिंग दी जाती है. इनकी ये ट्रेनिंग तीन सालों तक चलती है. इसमें इंडियन आर्मी के सबसे युवा लड़ाके भारती किये जाते हैं. ये देश के एयरफोर्स बेस की सुरक्षा करते हैं. ये आटोमेटिक हथियारों से लैस होते हैं. ये हवाई क्षेत्र में अटैक करने, स्पेशल कॉम्बैट ऑपरेशन और रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए खास तौर पर तैयार होते हैं.

इन्हें 72 हफ्तों की बेसिक ट्रेनिंग दी जाती है, उसके बाद पूरी ट्रेनिंग तीन सालों तक चलती है. ज़मीन के साथ इन्हें नेवी और जंगल वार की ट्रेनिंग भी दी जाती है.

5.नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी)

इस स्पेशल फ़ोर्स का गठन साल 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद किया गया था. ये भारत की सबसे ख़ास सिक्योरिटी फोर्सेज में से एक है. इनका इस्तेमाल टेररिस्ट ऑपरेशन्स को रोकने और देश के आंतरिक मामलों को संभालने के लिए किया जाता है. इन्हें एनएसजी या ब्लैक कैट कमांडो भी कहा जाता है. ये गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करते हैं.

इनका सिलेक्शन प्रोसेस बहुत कठिन होता है. कुछ आंकड़ों की मानें तो इसमें शामिल होने वाले करीब  70 से 80 % युवा ड्रॉपआउट होत जाते हैं.

6.स्पेशल प्रोटेक्शन फोर्स (एसपीजी)

इस स्पेशल फोर्स को 1988 में भारतीय संसद की तरफ से गठित किया गया. ये मुख्य तौर पर प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवारों की सुरक्षा करते हैं. ये आटोमेटिक हथियारों से लैस होते हैं. और खूफिया जानकारी हासिल करने में माहिर होते हैं.

सुरक्षा के मामले में इनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार है. ये एक गोली से एक दुश्मन को मार गिराने, यानी वन शॉट वन किल में भरोसा रखते हैं. और ये इंडियन पुलिस सर्विस की ओर से ट्रेनिंग पाते हैं.

7.कोबरा

कमांडो बटैलियन फॉर रेज्यूल्यूट एक्शन यानी कोबरा को साल 2008 में बनाया गया. इन्हें गोरिल्ला ट्रेनिंग दी जाती है. ये भेष बदलने और घात लगाकर हमला करने के लिए ट्रेंड किये जाते हैं. राष्ट्रपति सहित देश के केंद्र दिल्ली की सुरक्षा इन्हीं के जिम्मे है. साथ ही नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन के लिए भी इन्हें ही भेजा जाता है. यह देश की सबसे खतरनाक पैरामिलिट्री फोर्स में शामिल हैं.

इन्हें जंगल वार की ट्रेनिंग दी जाती है. इन्हें एनएसजी कमांडोज़ की बराबरी वाली ही ट्रेनिंग दी जाती है. ये लंबी दूरी चलकर खूफिया जानकारी इकट्ठी करने में माहिर होते हैं. कड़ी त्रैनंग के बाद इन्हें नक्सली इलाकों में भेज दिया जाता है.

8.स्पेशल फ्रंटियर फोर्स

साल 1962 युद्ध के दौरान चीनी सिपाहियों से टकराने के लिए एक स्पेशल फोर्स बनाई गयी, जो छिपे हुए दुश्मनों को ढूंढ कर उनका काम तमाम करती थी. इसी फ़ोर्स का नाम था स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स.

अब इसका इस्तेमाल आतंकवाद के खिलाफ स्पेशल ऑपरेशन्स में किया जाता है. यह फोर्स इंडियन खूफिया एजेंसी (रॉ) के अंतर्गत काम करती है. और इसके ऑपरेशन की जानकारी इंडियन आर्मी को भी नहीं होती.

9.फोर्स वन

इस स्पेशल फोर्स को साल 2010 में तैयार किया गया.  26/11 आतंकी हमले के बाद देश को इसकी जरूरत महसूस हुई. इसका मुख्य काम मुंबई की सुरक्षा करना है.

यह दुनिया की सबसे तेज एक्शन लेने वाली फोर्सेज में से एक है. ये इतनी तैयार होती है कि 15 मिनट के अन्दर ही घटनास्थल पर पहुंचकर किसी भी स्थित से लोहा ले सकती है. 

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