राजनीति के कीचड़ में खिला असली कमल था ये नेता

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लोक सभा चुनाव 2019 की तारीखों की घोषणा हो चुकी है. यहाँ से दौर शुरू हो गया है चुनावी भागदौड़ का. देश में हर तरफ अब बस चुनावों का ही शोर सुनाई देगा. कहीं नेता लोग बड़ी- बड़ी रैलियाँ कर रहे होंगे तो कहीं चाय की गुमटी पर देश के आम नागरिक चुनाव परिणामों पर चर्चा.

राजनीतिक पार्टियों के बीच अब आरोपों- प्रत्यारोपों का दौर सा चल निकलेगा. बहुत से नेता होंगे जो दूसरे दलों के नेताओं पर छींटाकशी करेंगे, और इस छींटाकशी में वो राजनीति की मर्यादाओं को भी भूल जायेंगे और भाषण के दौरान उनको लांघने में भी नहीं हिचकेंगे.

यही वज़ह है कि बहुत से सफ़ेद कॉलर लोग राजनीति को दलदल भी कहते हैं. और हालातों को देखकर ये सच भी लगता है कि आने वाली नई नस्लों के लिए राजनीति बस दलदल बनकर ही रह जाएगी. लेकिन हम आपको बताना चाहेंगे कि देश की इसी राजनीति ने वो सुनहरा दौर भी देखा है जब यहाँ सफाई होती थी, मर्यादा होती थी, और विरोधी दलों के नेताओं का भी सम्मान होता था.

देश में बहुत से नेता ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने सबको ये बताया है कि असल राजनीति क्या होती है, कितनी अच्छी होती है, और कितनी मर्यादित होती है. ऐसे ही नेताओं में से एक नेता थे चौधरी चरण सिंह. ये आज़ाद भारत के पांचवें प्रधानमंत्री थे. और इनका जन्म 23 दिसम्बर 1902 को मेरठ के नूरपुर में हुआ था.

साल 1923 में उन्होंने साइंस से ग्रेजुएशन किया और 1925 में आगरा यूनिवर्सिटी से क़ानून की पढ़ाई. इसके बाद उन्होंने गाज़ियाबाद में अपनी वकालत की शुरुआत की. ऐसा कहा जाता है कि वो सिर्फ उसी केस को लेते थे जिसमें सच में मुवक्किल निर्दोष होता था. वो साल 1929 में मेरठ आ गए और उसके बाद कांग्रेस में शामिल हुए. और 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन से जुड़कर नमक का कानून तोड़ने के लिए दांडी यात्रा में हिस्सा लिया.

उनके बारे में कहा जाता है कि वो किसी से डरते नहीं थे. वो एकदम साफ़ बात करने वाले इंसान थे. अगर उनको किसी की बात अच्छी लगती तो वो उसकी तारीफ करते, और अगर बुरी लगती वो सामने ही उसका विरोध भी कर देते. राजनीति का बड़ा नाम होने के बाद भी वो साधारण ज़िंदगी जीते थे. वो हर बात संजीदगी से करते थे और दिखावे से डोर रहते थे. लगातार 40 सालों तक छपरौली- बागपत से विधायक रहने के बाद. देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वो एम्बेसडर से चलते थे. और देश के अन्दर लम्बी यात्राओं के लिए रेल का सफ़र चुनते.

उनके नाती हर्ष सिंह लोहित ने एक बड़े मीडिया संस्थान से बात करते हुए उनके बारे में बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह शाकाहार में यकीन रखते थे, साथ ही नशे से भी दूर ही रहते थे. अगर आप शराब के शौकीन हैं तो वो आपको खुद से दूर ही रखते.

मनोरंजन के लिए वो अपनी बेटी, दामाद और दिल्ली यूनिवर्सिटी के उप कुलपति रहे डॉक्टर स्वरुप सिंह के साथ अपने घर पर कोर्ट- पीस खेला करते थे.

वो लगातार 40 सालों तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और उसके बाद 1967 में कांग्रेस से इस्तीफा देकर 1968 में राष्ट्रीय क्रान्ति दल नाम की पार्टी का गठन किया.

कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने रोते हुए भाषण दिया और कहा कि सारी उम्र कांग्रेस में बिताने के बाद उन्हें कांग्रेस छोड़ते हुए बहुत दुःख हो रहा है. अपने इस भाषण से दो ही दिन बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. ये वो वक्त था जब उत्तर प्रदेश में पहली बार कांग्रेस के अलावा किसी दूसरी पार्टी की सरकार बन रही थी.

चौधरी चरण सिंह जब गृहमंत्री थे तब उन्होंने इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह कहते थे कि जैसे इंदिरा गांधी ने एक लाख बेगुनाहों को आपातकाल के दौरान जेल में डाल दिया था. वैसे ही उन्हें भी बंद कर देना चाहिए.

लोग उन्हें समझाते थे कि चुनाव में हार जाना ही इंदिरा गांधी के लिए बहुत बड़ी सजा है. लेकिन फिर भी उनकी तल्खी उनकी बातों से झलक ही जाती थी. एक बार तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि,

“मैं चाहता हूँ कि इंदिरा गाँधी को कनाट प्लेस में खड़ा कर कोड़े लगवाए जाएँ.”

उन्होंने एक कमीशन बनाया, शाह कमीशन. और उनका साथ दिया मोरारजी देसाई ने. इस कमीशन में इंदिरा गांधी के खिलाफ गवाह पेश किये जाते थे. इसका नतीजा ये हुआ कि इंदिरा गांधी को आख़िरकार जेल जाना ही पड़ा.

वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह इस्लाम के बारे में बहुत अच्छी राय नहीं रखते थे, लेकिन फिर भी दंगों और साम्प्रदायिकता के सख्त खिलाफ थे. और दंगों की खिलाफत में वो सख्ती से खड़े भी होते थे. वो चाहे केंद्र में रहे हों या कि उत्तर प्रदेश में, दंगों के विरोध में उनका रवैया सख्त ही रहा.

1977 से 1980 के बीच उत्तर प्रदेश के संबल, अलीगढ और बनारस में बड़े दंगे हो गए. उस वक़्त  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे राम नरेश यादव. चौधरी चरण सिंह ने उन्हें फटकार लगाई और कहा,

“ये दंगे हर हाल में ख़त्म होने चाहिए.”

वो इतने प्रखर उसूलों वाले नेता रहे कि मुलायम सिंह यादव, महेंद्र सिंह टिकैत और जनता दल परिवार के ना जाने कितने ही लोगों ने राजनीति में उनके नाम का सहारा लेने की कोशिश की. लेकिन चौधरी चरण सिंह ने खुद कभी ना अपने नाम का फायदा उठाया और ना ही अपने पद का.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि, उनके एक रिश्तेदार थे वसुदेव सिंह जो दिल्ली में रहते थे. उन्होंने एक बार उत्तर प्रदेश से स्कूटर खरीदने के लिए चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री कोटे का इस्तेमाल किया. इसके लिए उन्होंने चौधरी चरण सिंह के पीए से कहा, और स्कूटर बुक करा दिया. डेलिवरी लेने के लिए जब वो लखनऊ गए तो उनकी मुलाक़ात चौधरी चरण सिंह से हो गयी. चौधरी चरण सिंह को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अपने पीए को बुलाकर उनसे कहा,

“जब ये उत्तर प्रदेश में रहते नहीं हैं तो फिर आपने ईनका स्कूटर यहाँ से कैसे बुक कर दिया? स्कूटर की बुकिंग कैंसिल कर इनके पैसे वापस कराइये.”

आज परिवारवाद और भाई- भतीजावाद की राजनीति करने वाली सभी पार्टियों को सच में उनके जीवन से सीख लेने की ज़रुरत है. खासकर वो पार्टियां जो वोटों के लिए उनका नाम भी लेती हैं, और सिर्फ अपने परिवार के सदस्यों को ही ऊंचे पदों पर भी देखना चाहती हैं.

चौधरी चरण सिंह को कोई किसान नेता कर के जानता है, कोई सिर्फ राजनीतिज्ञ, कोई भूतपूर्व प्रधानमंत्री, तो कोई एक पार्टी का अध्यक्ष लेकिन सच तो ये है कि ये सब होने से पहले वो एक उसूलों वाले इंसान हैं. और उनकी ये पहचान उनकी बाकी सभी पहचानों से बड़ी है.

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