राजनीतिक दलों की सत्ता में वापसी में नारों का बड़ा योगदान

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“कट्टर नहीं युव सोच”, “हर-हर मोदी, घर घर मोदी” , “हर हाथ शक्ति ,हर हाथ तरक्की ” ,‘मोदी मोदी मोदी मोदी………’ और फिर “अबकी बार, मोदी सरकार”…. वैसे आप इन सब नारों को तो भूले नहीं होंगे…

हर बार चुनाव आते ही चारों तरफ नए-नए नारे छा जाते हैं… दरअसल चुनावी नारों का सिलसिला शुरुआत से ही चला आ रहा है… “वेवर” ने एक कम्युनिकेशन थीओरी दी थी और कहा था ‘नेता और उसके वादे प्रॉडक्ट की तरह हैं जिसे जनता के बीच लॉन्च किया जाता है।’

नारे चुनाव जिताने में बहुत ही अहम रोल निभाते हैं… यह सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश ही नहीं भरते बल्कि जनमानस के मन में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में भी बहुत कारगार होते हैं…
भारत के चुनावों में दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं,
पहले चुनावी नारे और दूसरी चुनावी घोषणाएं.

राजनीतिक पार्टियां इनके लिए बड़ी रिसर्च करती हैं. सभी पार्टियों का घोषणा पत्र तो लगभग एक जैसा हो सकता है लेकिन नारे बिल्कुल अलग होते हैं….. यही वजह है कि इनकी महत्ता ज्यादा होती है क्योंकि यह लोगों को लम्बें समय तक याद रहता है … चुनावों में नारों के दम परभी पार्टियां चुनाव जीतती रही हैं और इसका लंबा इतिहास भी रहा है….

इसकी शुरुआत कांग्रेस से हुई थी…. आपको याद दिलाते है कांग्रेस ने कुछ जुमलों से इसकी शुरुआत की थी …..1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मनोबल बढ़ाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का यह नारा दिया था “जय जवान जय किसान”.. और यह आगे कांग्रेस के चुनावी सफ़र में भी खूब हिट हुआ था… उस समय देश में खाद्य सामग्री की कमी हो गई थी…..बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी नारे के आगे ‘जय विज्ञान’ जोड़ दिया…. और आज कांग्रेस कहती है कि अभी की भारत सरकार जुमलों की सरकार है…

खैर आज हम आपको कुछ नारों के बारे में बताएँगे जो लोगों के जुबान पर चढ़ें और शायद आज तक उतर ना पाए… इन जुमलों ने चुनाव जीतने में काफी मदद भी की …
1967 में जब पिछडो को लेकर राजनीति तेज़ हुई तो सोशलिस्ट पार्टी के डॉ. राममनोहर लोहिया ने एक नारा दिया था

“समाजवादियों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावै सौ में साठ”
यही वो वजह है जिससे पिछड़ों की राजनीति को नीव मिला और सरकार को मंडल कमीशन का गठन करना पड़ा…

फिर 1971 का चुनाव आया… हर जगह अलग अलग नारे दिए जा रहे थे लेकिन जिस नारे ने लोगों को प्रभावित किया वो था “ गरीबी हटाओ”…
जी हाँ इंदिरा गाँधी ने भारत की सबसे बड़ी कमजोरी और सस्या पर वार किया था .. और परिणामस्वरुप उनकी जीत हुई …
लेकिन फिर समय बदआ… इमरजेंसी का दौर आया … जिसमें जनता के साथ साथ राजनेता , ब्यूरोक्रेसी और प्रेस सब परेशान थे… तब जेपी आन्दोलन ने बहुत से जुमले फेमस किये ..
जैसे कि “अगर सच कहना बगावत है , तो समझो हम बागी है”
खैर इमरजेंसी के बाद 1977 में जब चुनाव हुआ तो जेपी के अगुवाई में करोड़ो लोगों के मुह पर बीएस एक ही नारा था “सिंघासन खली करो की जनता आती है” और इसका असर भी हुआ … इंदिरा गाँधी चुनाव हार गई….

लेकिन 1978 में हुए उपचुनाव में इंदिरा गाँधी ने कर्णाटक के चिकमंगलूर से चुनाव में उतारी और यह नारा दिया कि “एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर,चिकमंगलूर” और वहाँ से वो चुनाव जीती भी …
उसके बाद 1984 तक इंदिरा गाँधी प्रधान मंत्री रही… उस दौरान लोगों में संजय गाँधी के खिलाफ काफी आक्रोश भर गया था …

वहीं 1989 में राजीव गाँधी के खिलाफ एक नेता उभर कर आया था… वी.पी सिंह उर्फ़ राजा मांडा… “जिन्होनें यह नारा दिया था राजा नही फकीर है, जनता की तकदीर”… वैसे वी पी सिंह उस वक़्त यूथ आइकॉन के तौर पर इनका नाम काफी फेमस हुआ करता था … जिसकी वजह से भी उनकी जीत हुई और …
1990 में वीपी सिंह के मंडल कमीशन के खिलाफ बीजेपी नेता एल के आडवानी और अटल जी खड़े हुए… और अयोध्या राम मंदिर के मुद्दे पर एक नारा दिया “राम लल्ला हम आयेंगे , मंदिर वहीं बनायेंगे” और यह आज भी प्रचलित है…
उसके बाद 1996 में जब बीजेपी अटल बिहारी वाजपई के अगुवाई में आगे बढ़ी तो नारा आया “ राज तिलक की करो तैयारी अबकी बारी अटल बिहारी” और यह सफल भी रहा …

मगर ऐसा नहीं है कि नारों की वजह से ही चुनाव जीते जाते है … कई बार ऐसा हुआ है कि नारे और जुमलें काफी फेमस हुए लेकिन चुनाव में सफल नहीं हो पाए..
जैसे 2009 में बीजेपी का नारा था “आडवानी का कहना साफ़, राम रोटी और इन्साफ” और फिर भी बीजेपी की हार हुई …. वैसे ही के उत्तर प्रदेश विधान सभा में जब अखिलेश राहुल साथ आए और कहा “दलित नहीं दौलत की बेटी, मायावती” तो फिर भी वो चुनाव में हार गए…

वैसे सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में नारों से माहौल बनाने का तरीका सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चलता है… चाहे वो बराक ओबामा का yes we can हो या फिर डोनाल्ड ट्रम्प की “make america great again”… इन दोनों नारों ने america की सियासत पलट दी थी… वैसे हाल में ही पाकिस्तान के प्रधामंत्री ने “नया पाकिस्तान” का नारा भी दिया …

बहरहाल लोगों को सीधी बातों से ज्यादा यह जुमले आकर्षित करतें है .. तभी तो इनके जरिये राजनीतिक पार्टियां लोगों तक अपनी बात पहुचती है……