पश्चिम बंगाल की सरकार और बढ़ती धार्मिक हिंसा

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वोट देने गाँव गया था. गाँव में घुसते ही जो पुराना बरगद पड़ता है, उसके नीचे अपनी मित्र मंडली के साथ बैठकर ताश खेल रहे काका ने आवाज़ दी तो सीधे वहीं जा बैठा. गाँव के एक बुजुर्ग ने बातों-बातों में पूछ लिया,

‘किसको वोट दोगे इस बार?’

मैंने कहा,

“आपको क्या लगता है किसको देना चाहिए?”

बस यही से शुरू हो गई राजनीति पर चर्चा, किसी ने कहा फलाने को, किसी ने कहा ढिमके को, किसी ने कहा फलाना हमारे धर्म की बात करता है, तो किसी ने कहा कि ढिमका हमेशा दूसरे धर्म की बात ही क्यों करता है?

ये वो बातें हैं जहां पर आकर में कुछ कह नहीं पाता, इसलिए चुपचाप अपना बैग पीठ पर टांगकर आगे बढ़ गया. मेरे दिमाग में अब धर्म और राजनीति के रिश्ते को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी. में समझ नहीं पा रहा था कि आखिर क्या सम्बन्ध है दोनों में, और क्यों सम्बन्ध है दोनों में?

धर्म और राजनीति को एक पास रखकर देखो तो सबसे पहले पश्चिम बंगाल दिमाग में नाचता है. वहाँ के राजनीतिक हालत दिमाग में नाचते हैं. ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस वाला देश का ये हिस्सा आजकल अलग ही तरह की राजनीति में लगा हुआ है.

Source- The financial Express

यहाँ इतने धार्मिक जुलूस निकलते हैं जितने लोग नहीं निकलते. यहाँ इतनी धार्मिक हिंसाएँ होती हैं जितने लोग नहीं होते. वो क्षेत्र जहां कलाकार हुआ करते थे वहाँ अब धार्मिक अतिवादी और दंगाई दिखाई देते हैं.

वो जगह जहाँ के लोग अपनी कला के दम पर देश दुनिया को बाँधने की बात किया करते थे, वहाँ के नेता अब धार्मिक आधार पर देश को बांटने में कोई कसर नहीं छोड़ते. आजकल यहाँ की राजनीतिक परिभाषा ही पूरी तरह से बदल गई है.

हर पार्टी किसी ना किसी धर्म को लुभाने में लगी हुई है. कोलकाता से कुछ ही दूरी पर एक जगह है धूलागढ़. ये वो इलाका है जो जारी की कढ़ाई के लिए जाना जाता है. यहाँ की हिन्दू-मुस्लिम आबादी करीब-करीब बराबर ही है.

ये इस इलाके की अच्छाई हुआ करती थी कि यहाँ दोनों द्गार्म एक-दूसरे के साथ मिलकर रहा करते थे. एक-दूसरे के साथ काम किया करते थे, और किसी ना किसी तरीके से एक-दूसरे की रोटी का हिस्सा बनते थे.

लेकिन साल 2016 में यहाँ दोनों समुदायों के बीच हुई हिंसक घटनाओं के बाद से यहाँ के हालात अलग ही दिखाई देते हैं. माहौल पूरी तरह से बदल चुका है. इलाके के लोगों के चेहरों पर साम्प्रदायिक तनाव  साफ़ नज़र आ जाता है.

साल 2016 में इस इलाके ने जो कुछ देखा और जो कुछ सहा वो अच्छा नहीं था. क्योंकि ये सब जो कुछ भी था उसमें बारी-बारी से दोनों समुदायों के घर जल रहे थे. और घरों का जलकर राख हो जाना दिलों में जलती हुई चिंगारियां छोड़ जाता है. वो चिंगारियां जो कभी बुझती ही नहीं और दिलों में दुश्मनी की आग को सुलगाती रहती हैं.

इलाके में पहुँचो और उन घटनाओं के बारे में बात करना चाहो तो कोई भी बात नहीं करना चाहता. सब यही कहते हैं कि,

“अब सबकुछ ठीक है, सामान्य है.”

लेकिन जो कोई भी ये कहता है. उसके साथ ही थोडा वक़्त बिता लो तो उसके अन्दर की नफरत नज़र आ ही जाती है. नुकसान यहाँ दोनों पक्षों का बराबर ही हुआ. घर यहाँ दोनों पक्षों के बराबर ही जले. नफरत यहाँ दोनों पक्षों में बराबर ही फ़ैली.

पश्चिम बंगाल के लिए धार्मिक हिंसाएँ कोई नई बात नहीं हैं. यहाँ पहले भी ये सब होता ही रहा है. लेकिन गृह मंत्रालय ने कुछ आंकड़े दिए हैं, जो ये बताते हैं कि साल 2016 से 2017 के बीच यहाँ इस तरह की हिंसा वाली घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

इन आंकड़ों की मानें तो साल 2015 में अगर पश्चिम बंगाल से 27 धार्मिक हिंसा के मामले मिले तो 2017 में 58, ये संख्या नज़रंदाज़ करने लायक नहीं है क्योंकि ये दोगुने से भी ज्यादा है. इन घटनाओं के इस तरह एकाएक बढ़ जाने की वज़ह पर गौर करेंगे तो जो कुछ सामने आयेगा वो सबकुछ साफ़ कर देगा.

पिछले कुछ सालों में पश्चिम बंगाल की राजनीति धर्म की चाशनी में डूबती नज़र आयेगी. और नज़र आयेगा हर नेता द्वारा साम्प्रदायिक तनाव की घटनाओं पर राजनीति का वर्क चढ़ाना. लेकिन धर्म और राजनीति को मिलाकर पकवान बनाने वाले इन नेताओं को समझ आना चाहिए कि अभी की साम्प्रदायिक घटनाओं पर राजनीति का नमक छिड़कना, आने वाले वक़्त में ऐसी और घटनाओं के लिए नींव बन जाता है.

इन घटनाओं में हर धर्म और हर तबके का नुकसान होता है. इन घटनाओं में देश का नुकसान होता है. क्योंकि इस तरह की घटनाओं में जो घर जल रहे होते हैं, वो सिर्फ हिन्दू या मुसलामानों के घर नहीं होते बल्कि देश के घर होते हैं. इस तरह की घटनाएं राजनीतिज्ञों के अलावा किसी को फायदा नहीं पहुंचाती.

Source- Bloomberg

ये राजनीतिक पार्टियां ही तो हैं जिन्होने पश्चिम बंगाल को राजनीति और धर्म की एक लेबोरेटरी में तब्दील कर दिया है. इन्होने माहौल को इतना ज़हरीला कर दिया है कि जनता के लिए यहाँ सांस लेना मुश्किल हुआ जा रहा है.

समाजवाद की बात करने वाली पार्टियां जब धर्मवादी हो जाती हैं तो ऐसा ही ज़हरीला माहौल तो बनता है. गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी पर बात करने वाली पार्टियां जब सिर्फ धर्म की बात करती हैं तो ऐसा ही ज़हरीला माहौल तो बनता है.

दंगे हो जाते हैं, घर जल जाते हैं, लोग मर जाते हैं, एक पार्टी मुसलामानों को इसका दोषी बताती है और दूसरी हिन्दुओं को. लेकिन असलियत में वही दोनों पार्टियां इन घटनाओं की दोषी होती हैं. और इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा देने के आरोप चाहे किसी भी पार्टी पर मढ़े जाएँ लेकिन असलियत में तो ये विफलता तो शाशन की ही है.

खैर, में कुछ और सोचता उससे पहले मेरा घर आ गया. घर के अन्दर जाने से पहले मैंने धर्म की लड़ाई को और राजनीति को वापस उसी बरगद के पेड़ की तरफ भेज दिया. क्योंकि ये दोनों उसी जगह पर रहे तो ठीक हैं, हमारे घर में इनका कोई काम नहीं.