वो नेता जिसकी महत्वाकांक्षा ने गिरा दी थीं दो सरकारें

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सो रहे लोकतंत्र को जगाने की कोशिश में शायरा तरन्नुम कानपुरी लिखती हैं,

ऐ क़ाफ़िले वालों, तुम इतना भी नहीं समझे
लूटा है तुम्हे रहज़न ने, रहबर के इशारे पर

लेकिन सच तो ये है कि लोकतंत्र नाम ही लूटने और लुटने का है. सियासतदार यहाँ अपने ही सियासी पुरखों को नहीं छोड़ते तो फिर आप और हम क्या बला हैं. ये सियासी लोग अपने पुरखों को पीछे छोड़कर बहुत आगे बढ़ जाते हैं, और भूल जाते हैं कि इनका ही हाथ थामकर वो कभी आगे बढ़े थे.

ऐसे ही भुला दिए गए सियासतदारों में से एक सियासतदार थे कांग्रेस नेता सीताराम केसरी. सीताराम केसरी से कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद छीनकर, सोनिया गांधी को देने के लिए सोनिया गांधी के भरोसेमंदों ने पूरी राजनीतिक पढ़ाई हवन कर दी. सीताराम केसरी को कुर्सी से हटाकर, सोनिया गांधी को बिठाने के लिए पहले तो पार्टी के पार्टी के बड़े नेताओं ने संविधान के साथ खिलवाड़ किया, और फिर पार्टी के ही कुछ छुटभैये नेताओं ने खिलवाड़ किया बुज़ुर्ग सीताराम केसरी के साथ.

ये खिलवाड़ सच में घिनौना था. वैसा, जैसा कि किसी भी पार्टी के नेता के साथ नहीं होना चाहये. या कि कहा जाए, किसी के साथ नहीं होना चहिये.

साल 1916 में पटना बिहार के दानापुर में सीताराम केसरी का जन्म हुआ था. शुरुआती पढ़ाई के लिए वो दानापुर के ही सरकारी स्कूल में जाने लगे, और साल 1930 में जब उनकी उम्र महज़ 13-14 साल थी, वो आज़ादी की लड़ाई से जुड़ गए.

वो ढोलक बजाते थे, और पटना के आसपास के इलाके में घूमते, चक्कर लगाते थे. यहाँ घूमते हुए वो लोगों को आज़ादी के फायदे बताते और उनको जागरूक बनाने की कोशिश करते. खैर ढोलक लेकर आज़ादी की अलख जगाने तक वो ना जाने कितनी बार जेल गए. अपनी ज़िंदगी के करीब साढ़े सात साल उन्होंने ब्रिटिश भारत की जेलों में कैद रहकर काट दिए.

सीताराम केसरी महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे, और इसी प्रभाव का नतीजा था कि वो आज़ादी से पहले ही कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए. वो चंद्रशेखर सिंह, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, बिन्देश्वरी दूबे, केदार पांडेय, भागवत झा आजाद, और अब्दुल गफूर आदि नेताओं के साथ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी शामिल हुए.

साल था 1967 और सीताराम केसरी ने पहली बार ‘जनता पार्टी’ के टिकट पर बिहार के कटिहार से चुनाव जीता और संसद में अपने पाँव जमा लिए. और इसके बाद जब वो दुबारा कांग्रेसी बने तो ज़िंदगी भर के लिए कांग्रेस के ही हो गए.

1973 में वो बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष बने, काम अच्छा मिला तो प्रमोशन भी किया गया और साल 1980 में कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बना दिए गए. लगातार 16 सालों तक वो इस पद पर रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे.

केंद्र की सत्ता में उस वक़्त कांग्रेस थी, और कोषाध्यक्ष होने के नाते कांग्रेस के कोष का हिसाब रखते थे सीताराम केसरी. वो ऐसा बढ़िया हिसाब- किताब करते थे कि उनके बारे में कहा जाने लगा था,

“न खाता न बही, जो चचा केसरी कहें वही सही.”

सीताराम केसरी जुलाई 1971 से लेकर अप्रैल 2000 तक पूरे पांच बार लगातार बिहार से राज्यसभा सदस्य रहे थे. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव के केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी उनकी जगह रही. और इस सब के अलावा साल 1996 में जब पीवी नरसिम्हा राव ने अध्यक्ष पद छोड़ा, तो सितम्बर 1996 में वो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी चुने गए. इसके बाद 3 जनवरी 1997 को उन्हें विधिवत कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया. पार्टी के नेताओं ने खुद ‘संगठनात्मक चुनाव’ कर उन्हें अध्यक्ष पद पर बिठाया था.

लेकिन असलियत ये थी कि उन सभी ने इस संगठनात्मक चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया था, और सीताराम केसरी को बस पद भरने के लिए चुन लिया था. लेकिन जो भी हो जगजीवन राम के बाद, सीताराम केसरी कांग्रेस के दूसरे गैर- सवर्ण राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे.

इसका नतीजा ये हुआ कि उनके अध्यक्ष बनते ही पार्टी के अन्दर दुनिया भर की तकलीफें पैदा होने लगीं. दलितों की बात, पिछड़ों की बात, और सबकी बात करने वाली कांग्रेस पार्टी ने उस दौरान, अपना हर एक रंग दिखा दिया.

सीताराम केसरी अंग्रेजी नहीं जानते थे, और इसके चलते दक्षिण व उत्तर-पूर्व के नेताओं को उनसे कुछ कहने- सुनने में बड़ी तकलीफ होती थी.

इसके अलावा उत्तर भारत में कांग्रेस के बहुत से ऊंची जाति वाले नेता भी थे जो उन्हें अपनी पार्टी का नेता मानने को तैयार ही नहीं थे, क्योंकि सीताराम केसरी ऊंची जाति के ना होकर पिछड़ी जाति के थे. साथ ही ये बात भी सभी जानते थे कि सीताराम केसरी खुद भी उत्तर भारत के ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं को ख़ास पसंद नहीं करते थे.

आज हर पार्टी के संग गठबंधन करने को तैयार कांग्रेस उन दिनों बड़े घमंड में रहा करती थी. वो किसी के साथ चलने को तैयार नहीं होती, उसे लगता था कि वो अकेले पूरे देश की राजनीति को संभाल सकती है.

सीताराम केसरी मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और कांशीराम जैसे नेताओं को साथ मिलकर महागठबंधन करना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के बाकी बुद्धिजीवी इस बात पर राजी होने को तैयार ही नहीं थे.

खैर, सीताराम केसरी एक मामूली पृष्ठभूमि से अकार देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुँच गए थे. और उनकी इस उपलब्धि ने उनकी महत्वकांक्षाओं को भी बढ़ा दिया.

उस वक़्त देश में संयुक्त मोर्चे की सरकार थी, और प्रधानमंत्री थे एच. डी. देवगौड़ा. इस सरकार को बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिला हुआ था, और चचा केसरी के मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना जागने लगा था, और बिना किसी दूसरी वज़ह के, सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. सरकार तो गिरी, लेकिन चचा केसरी तब भी प्रधानमंत्री नहीं बन सके, और दोबारा कांग्रेस के ही समर्थन से प्रधानमंत्री बनाया गया इंद्र कुमार गुजराल को. लेकिन कुछ वक़्त के बाद उन्होंने इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया.

इंद्र कुमार गुजराल से जब चचा केसरी ने अपना समर्थन वापस लिया तब उनके पास वाजिब वज़ह थी. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ह्त्या की जांच करने वाले जैन आयोग ने एक रिपोर्ट बनाई थी, और इस रिपोर्ट का एक अंश मीडिया में प्रकाशित हुआ.

रिपोर्ट के इस अंश से पता चला कि राजीव गांधी की ह्त्या करने वाले आतंकवादी संगठन एलटीटीई के तार डीएमके यानी द्रविड़ मुनेन्द्र कड़गम से जुड़े हुए हैं. यही डीएमके इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में साझेदार थी, और गुजराल सरकार में डीएमके के तीन मंत्री शामिल थे.

सीताराम केसरी ने इंद्र कुमार गुजराल से कहा कि वो उन मंत्रियों को सरकार से बाहर करें, लेकिन वो नहीं माने, इंद्र कुमार गुजराल ने साफ़ मना कर दिया कि वो ऐसा नहीं करेंगे. बस सीताराम केसरी ने तुरंत समर्थन वापस लेने की घोषणा की, और इंद्र कुमार गुजराल को इस्तीफा देना पड़ा.

मामूली पृष्ठभूमि से इतनी बड़ी राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष बनने तक सीताराम केसरी ने बहुत कुछ किया था, लेकिन अब वो पार्टी के लिए जो कुछ भी कर रहे थे वो पूर्ण निष्ठा के साथ कर रहे थे. वो गर्व के साथ कहते थे कि कार्यकर्ताओं ने उनको चुनकर आगे बढ़ाया है, उन्होंने मुझे चुना है. उनका ऐसा करना कांग्रेस के बहुत से बुद्धिजीवी नेताओं को पसंद नहीं आता था.

देश में मध्यावधि चुनावों की स्थिति उत्पन्न हो गई है. और कांग्रेस उस वक़्त मध्यावधि चुनाव की स्थिति में नहीं थी. कांग्रेस के बहुत से नेताओं ने सीधे तौर पर सीताराम केसरी का विरोध भी किया और कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया.

कांग्रेस के बहुत से नेताओं को लगने लगा कि खुद को सामान्य पृष्ठभूमि का बताकर सीताराम केसरी खुद को नेहरू गांधी परिवार से चार कदम आगे दिखाना चाहते हैं, और सोनिया गांधी को चुनौती देना चाहते हैं.

इन्ही चाटुकार नेताओं ने आग सुलगाना और आग को हवा देना शुरू कर दिया. उन्होंने सोनिया गांधी के ख़ास विंसेट जॉर्ज के कान भरना शुरू कर दिया कि सीताराम केसरी सोनिया गांधी के खिलाफ बोलते हैं, और उनके विश्वासपात्र नेताओं के खिलाफ भी बोलते हैं.

Source-The Quint

साल 1998 में मध्यावधि चुनाव हुए. सोनिया गांधी ने पार्टी के प्रचार का जिम्मा उठाया. ऐसी बहुत सी जगहें थीं जहाँ सीताराम केसरी को प्रचार करने तक नहीं जाने दिया गया. और इन्ही कुछ जगहों में से थी एक जगह सीताराम केसरी की जन्मभूमि बिहार.

एक घटना और घटी इसी चुनाव के दौरान, चुनाव प्रचार जोरों पर था और सभी दलों के नेता चुनावी सभाओं में लगे हुए थे. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी की ऐसी ही एक सभा में भयानक बम विस्फोट हो गया. इस विस्फोट ने करीब 50 जिंदगियों को लील लिया, और 100 से ज्यादा लोगों को घायल किया. एक कांग्रेसी होने के नाते चचा केसरी ने यहाँ भी अपना फ़र्ज़ अदा किया. उन्होंने इस विस्फोट का आरोप संघ के सिर ही मढ़ दिया.

जवाब में संघ की तरफ से सीताराम केसरी पर मानहानि का मुकदमा कर दिया गया. इसके चलते सीताराम केसरी की छवि जनमानस में और बिगड़ गई.

कांग्रेस पार्टी इस चुनाव में सिर्फ 140 सीटें ही जीत सकी. और हार का पूरा ठीकरा फोड़ दिया गया सीताराम केसरी के सिर. लोकसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी के अंदरूनी हालात और खराब होते गए. ऊंची जाति के बाहुत से कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी से पहले से ही चिढ़े हुए थे, और इस हार ने माहौल को और बिगाड़ दिया. इसी सब के बाच जब केसरी ने पार्टी के ‘मंडलीकरण’ की बात कह दी तो आग में घी सा पड़ गया, पार्टी के हारे हुए नेताओं को महसूस हुआ कि अब वो पार्टी में अपनी जगह भी खो देंगे.

और यहीं से सीताराम केसरी को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने की शाजिश शुरू हुई. पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द कोयलिशन इयर्स 1996-2012’ में इस शाजिश के बारे में बहुत कुछ लिखा है. किताब बताती है कि 5 मार्च साल 1998 को सीताराम केसरी ने कांग्रेस कार्य समिति की एक बैठक बुलाई. जितेंद्र प्रसाद, पार्टी के नेता शरद पवार और गुलाम नबी आज़ाद ने सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की बात कही.

सीताराम केसरी ने उनकी इस बात को मानने से इनकार कर दिया, और उन सभी पर यह आरोप लगाते हुए बैठक छोड़कर चले गए कि वो उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं. इस किताब में सिर्फ इतना हीलिखा गया है कि सीताराम केसरी खुद ही बैठक छोड़कर गए थे, लेकिन उस वक़्त की मीडिया के पुलिंदों को टटोलो तो कुछ और ही खबर सामने आती है.

उस रोज 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस के मुख्यालय के अन्दर सीताराम केसरी के साथ बहुत बदसलूकी की गयी, और वो रोते हुए कांग्रेस मुख्यालय से बाहर निकले. उस वक़्त के बहुत से अखबारों ने उनकी रोती हुई तस्वीर को छापा, और उन्हें जबरदस्ती बाहर निकालने की बात भी लिखी.

एक बहुत बड़े पत्रकार हुआ करते थे उस वक़्त राशिद किदवई, उन्होंने एक किताब लिखी थी ‘ए शार्ट स्टोरी ऑफ द पीपल बिहाइंड द फॉल एंड राइज ऑफ द कांग्रेस’, इस किताब में उन्होंने साफ़ तौर पर लिखा कि, सीताराम केसरी को कांग्रेस मुख्यालय से बेइज्जत कर के बाहर निकाल दिया गया. और इस काम में प्रणव मुखर्जी, ए के एंटनी, शरद पवार और जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गाँधी का पूरा साथ दिया.

इस घटना के बाद सीताराम केसरी के करीबियों ने उन्हें समझाया कि वो सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाना रद्द करें, क्योंकि इस बात की पूरी उम्मीद है कि बैठक में उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए कहा जा सकता है. लेकिन सीताराम केसरी कांग्रेस पार्टी के संविधान में पूरा भरोसा रखते थे. वो मानते थे कि पार्टी के संविधान के अनुसार उन्हें तबतक पार्टी अध्यक्ष पद से नहीं हटाया जा सकता जबतक वो ना चाहें.

लेकिन सोनिया गांधी के करीबी प्रणव मुखर्जी ने कांग्रेस पार्टी के संविधान में ना जाने कहाँ से वो प्रावधान ढूंढ लिया जिसके तहत सीडब्ल्यूसी को कुछ ख़ास परिस्थितियों में बड़े से बड़े फ़ैसले लेने का अधिकार था.

खैर, बैठक हुई, प्रणब मुखर्जी ने सीताराम केसरी को उनकी सेवाओं के लिए धन्यवाद दिया और सोनिया गांधी के सामने पद संभालने का प्रस्ताव रखा.

केसरी ने तुरंत बैठक स्थगित की और नाराज़ होकर अपने ऑफ़िस के अन्दर चले गए. प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह, और एके एंटनी जैसे तमाम नेताओं ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो पद ना छोड़ने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

आखिर में उस वक़्त के पार्टी के उपाध्यक्ष प्रसाद ने बैठक की अगुवाई की और प्रणब मुखर्जी को इशारा किया कि वो सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाएं. बैठक में मौजूद सीताराम केसरी के इकलौते वफादार तारिक़ अनवर ने इस फैसले का विरोध किया और बैठक का बहिष्कार कर दिया. उनके अलावा वहाँ मौजूद पार्टी के बाकी सभी नेता सोनिया के निवास 10 जनपथ चले गए.

उसी दोपहर कांग्रेस की अध्यक्ष वाली कुर्सी सोनिया गांधी को सौंप दी गई. और टेबल से सीताराम केसरी की नेमप्लेट को हटाकर कूड़ेदान में फेंक दिया गया.

उसी दिन किए बाद से सीताराम केसरी ने राजनीति से संन्यास ले लिया था. और अप्रैल 2000 में जब राज्यसभा में उनका कार्यकाल ख़त्म हुआ तो उन्होंने फिर से इसकी सदस्यता नहीं ली. ये विडंबना ही है कि जिस पार्टी के नेताओं, और उनके रिश्तेदारों के पास अरबों की अवैध संपत्ति निकलती है, उसी पार्टी में एक नेता ऐसे भी थे जो लगभग 35 सालों तक सांसद रहे और तीन सरकारों में मंत्री भी, लेकिन उनके पास दिल्ली में रहने के लिए अपना घर तक नहीं था, ये नेता थे सीताराम केसरी.

साल 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी घोषणा की कि सीताराम केसरी को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाएगा और दिल्ली में घर दिया जाएगा, तब उन्होंने कहा कि मैं 84 साल का हो गया हूँ, और अब मैं अपने घर दानापुर जा रहा हूं.

इसके बाद कुछ ही वक़्त बीता कि उनकी तबियत बिगड़ गयी और साल 2000 में ही 24 अक्टूबर को एम्स हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई. ज़िंदगी के करीब 60 साल कांग्रेस के नाम कर देने वाला एक नेता दुनिया से चला गया. और कांग्रेस के किसी भी नेता ने फिर कभी उसे याद भी नहीं किया.

इस घटना की जांच करते हुए एक विश्वसनीय जगह से हमें एक बेहद घिनौनी बात पढ़ने को मिली. अध्यक्ष पद छिन जाने के बाद जब सीताराम केसरी दुखी मन से कांग्रेस मुख्यालय से बाहर निकल रहे थे, तब वहाँ मौजूद यूथ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उनका मजाक उड़ाते हुए उनकी धोती तक खींचने की कोशिश की. ऐसे में मन में अनायास ही शायर खुर्शीद अकबर का एक शेर गूँज उठा कि…

सरों पर ताज रक्खे थे क़दम पर तख़्त रक्खा था
वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था!

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