आखिर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना हुआ पूरा

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जम्मू-कश्मीर की धारा 370 को खत्म करने की सिफारिश मंजूर हो गयी है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में संकल्प पेश कर J&K राज्य को पुनः गठित और धारा 370 को हटाने की बात रखी.

इसके बाद से ही जनता में ख़ुशी की लहर दौड़ गई सभी लोग ब अपने घर से बहार निकल कर जश्न माना रहे है. लोगों को अपने कानों पर विश्वास तक नहीं हो रहा. ऐसा होना भी लाजमी था क्यूंकि सरकार ने सात दशक पुरानी मांग को जो पूरा कर दिया है.

भारतीय संघ में जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह समिलित करने का जो सपना था वो असल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था.और इसके लिए उन्होंने अपने प्राण का बलिदान भी दे दिया था, आज हम अपनी आंखों के सामने उन्हें सपने को सच होते देख पा रहे है.

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर जनसंघ के नायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसकी सक्त खिलाफ़त करते थे. उन्होंने धारा 370 हटाने के लिए आंदोलन चलाया था. जम्मू-कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 का विरोध शुरू किया. उन्होंने एक देश में दो विधान, एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान- नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे जैसे नारे दिए. देश की एकता और अखंडता को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आंदोलन चलाया था.

साल था 1947, भारत की स्वतंत्रता के बाद जब जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्हें खुद महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने डॉ. मुखर्जी को तत्कालीन मंत्रिपरिषद में शामिल करने की सलाह दी थी. जिसके बाद नेहरु को डॉ. मुखर्जी को मंत्रिमंडल में लेना पड़ा. तब डॉ. मुखर्जी देश के प्रथम उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने.लेकिन नेहरु श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हमेशा से कम अकते थे. काई मुद्दों पर आपसी सहमति न बनते देख कुछ साल बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया.

आज के समय में जिस आर्टिकल 370 के लिए इतना हो हल्ला कर रहा लोग ये बात जन ले कि,, उस वक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही एक ऐसे व्यक्ति थे जो कश्मीर के संबंध में इस आर्टिकल को ले कर नेहरु का पूरी सख्ती से विरोध कर रहे था. उनका साफ मानना था कि ‘एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’.

डॉ. मुखर्जी इसे देश की एकता में फुट डालने वाली इस नीति के जड़ से खत्म करना चाहते थे. मई 1953 को डॉ मुखर्जी ने इसके खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोल दिया और बिना परमिट जम्मू-कश्मीर की यात्रा शुरू कर दी. जम्मू में प्रवेश के बाद डॉ. मुखर्जी को वहां की शेख अब्दुल्ला सरकार ने 11 मई को गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के महज चालीस दिन बाद 23 जून 1953 अचानक सूचना आई कि डॉ. मुखर्जी नहीं रहे. मई से 23 जून तक उन्हें किस हाल में रखा गया इसकी जानकारी किसी को भी नहीं थी. इस बात पर डॉ मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को उलाहना भरा पत्र लिखकर डॉ. मुखर्जी की मौत की जांच की मांग की. लेकिन हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने जांच कराना मुनासिब नहीं समझा.