सामना और कार्टून के सहारे शिवसेना ने भाजपा को चेताया, बदल सकते हैं समीकरण

442

24 घंटे भी नहीं बीते महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का परिणाम आये कि भाजपा और शिवसेना गठबंधन में दरारे नज़र आने लगी. इस दरार की शुरुआत सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के 50-50 पार्टनरशिप वाले बयान से हुई. जब रिपोर्टर ने उद्धव से आदित्य के मुख्यमंत्री बनने का सावल किया तो उद्धव ने मुस्कुराते हुए मुंह में घी शक्कर कह कर अपनी इच्छा और महत्वकांक्षा जाहिर कर दी. उनका ये कहना था कि महाराष्ट्र में भावी मुख्यमंत्री आदित्य ठाकरे के पोस्टर भी सामने आ गए.

और फिर शिवसेना का मुख्यपत्र सामना और पार्टी के बड़े नेता संजय राउत उस दरार को और चौड़ी करने लगे. पहले आपको दो तस्वीरे दिखाते हैं. एक तस्वीर है शिवसेना के मुख्यपत्र सामना की. सामना के पहले पन्ने पर महाराष्ट्र चुनाव से जुडी ख़बरें छपी और उसमे महाजनादेश में से महा को क्रॉस करके जनादेश लिखा गया. ये दरअसल भाजपा-शिवसेना की जीत पर तंज था. भाजपा –शिवसेना ने अबकी बार 200 पार का नारा दिया था. बड़े भाई की भूमिका में भाजपा ने अपने पास ज्यादा सीटें रखीं और पार्टी की कोशिश थी कि अकेले ही ये स्थिति हासिल की जाए ताकि शिवसेना ज्यादा मोलभाव वाली स्थिति में ना रह पाए लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. सामना में महाजनादेश काट कर लिखा गया जनादेश इसी बात पर तंज था. भाजपा की सीटें पिछली बार से करीब 20 घट गई शिवसेना इस बात पर खुश है लेकिन सीटें तो शिवसेना की भी घटी.

अब दूसरी तस्वीर की जिक्र करते हैं. दूसरी तस्वीर एक कार्टून है जो संजय राउत ने शेयर किया और कैप्शन दिया बुरा न मानों दिवाली है. इस तस्वीर में शेर के गले में घडी है और उसके पंजे में कमल का फूल. देखने में ये बस शिवसेना और भाजपा के बीच का आपसी झगडा नज़र आये लेकिन शेर के गले में बंधी घडी बहुत कुछ इशारा कर रही है. दरअसल घडी शरद पवार की पार्टी NCP का चुनाव चिन्ह है. इस तस्वीर के जरिये शिवसेना ये इशारा करना चाहती है कि उसके पास NCP का साथ है और अगर भाजपा ने उसकी मांगों पर कोई भाव नहीं दिया तो समीकरण बदल भी सकते हैं.

लेकिन ये शिवसेना के लिए इतना आसान भी नहीं होगा. ये आसान इसलिए नहीं है क्योंकि शिवसेना सिर्फ NCP के सहयोग से बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुँच सकती. उसे कांग्रेस का भी समर्थन लेना होगा. 288 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा है 145. शिवसेना के 56 और एनसीपी के 54 विधायक अगर साथ आ जाएँ तो आंकड़ा पहुँचता है 110 जो बहुमत से बहुत ही कम है. अब अगर कांग्रेस साथ आ जाए तो आंकड़ा पहुँच जाएगा 154.. लेकिन क्या शिवसेना कांग्रेस के साथ जाने का रिस्क उठाएगी या फिर खुद को सेक्युलर कहने वाली कांग्रेस, भगवा पार्टी शिवसेना के साथ जाना चाहेगी. ये भी एक बड़ा सवाल है?

अब अगर शिवसेना भाजपा को आँखे दिखाती है तो भाजपा के पास क्या विकल्प बचते हैं इस पर भी चर्चा करना जरूरी है. साल 2014 में जब भाजपा और शिवसेना दोनों ने अलग अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा बहुमत से दूर रह गई थी तब एनसीपी ने स्थिर सरकार के लिए भाजपा के साथ आने का बयान दिया था लेकिन ये हो नहीं पाया क्योंकि उससे पहले ही शिवसेना भाजपा के साथ आ गई. अगर शिवसेना भाजपा को आँखे दिखाती है तो भाजपा के पास NCP के साथ जाने का विकल्प बचता है. ऐसी स्थिति में भाजपा के 105 और एनसीपी के 54 विधायक मिलकर आसानी से बहुमत में आ जायेंगे. वैसे भी कांग्रेस के साथ जाने का एनसीपी को कोई ख़ास फायदा मिला नहीं तो 5 सालों से सत्ता से दूर एनसीपी के लिए भाजपा के साथ आना ज्यादा मुश्किल भी नहीं होगा. इन सारे विकल्पों के बीच शिवसेना के तंज दरअसल उसकी खिसियाहट को बयान करता है क्योंकि अगले 5 सालों के लिए भी उसे भाजपा का छोटा भाई बनकर ही रहना होगा.