देखिये कैसे सरकार बनाने के लिए शिवसेना बैकफुट पर चली ही गयी! ये रहे कारण

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आये एक हफ्ते से अधिक का समय हो चला है लेकिन सरकार किसकी बनेगी कैसे बनेगी और कब बनेगी इसका कोई फैसला अब तक नही हो पाया है. पेंच कहाँ फंसा है आप जानते ही है.. दरअसल शिवसेना 50-50 के फोर्मुले पर ही सरकार बनाने पर जोर दे रही है… जबकि बीजेपी इसके मूड में तो कतई नही दिख रही है. यहीं पर अटका है पूरा विवाद.. हालाँकि जो खबर अब सामने आ रही है उसके मुताबिक़ शिवसेना बैकफुट पर जाने पर मजबूर हो गयी है क्यों मजबूर हुई है इसके पीछे भी तीन भेद दिलचस्प कारण भी है ये हम आपको आगे जरूर बतायेंगे लेकिन उससे पहले आपको ये बता दें कि अगर शिवसेना और बीजेपी की गठबंधन वाली सरकार नही बनती और कैसे सरकार बन सकती है.अगर शिवसेना के तेवर तल्ख़ रहे और सरकार बनाने के लिए ना नुकुर करती रही तो बीजेपी को एनसीपी समर्थन दे सकती है.. जैसा कि पिछली बार हुआ था..फिर बाद शिवसेना ने समर्थन का एलान कर दिया था..

शिवसेना भी चाहे तो एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकती है लेकिन राजनीतिक विचारधारा से देखा जाये तो ऐसा होता संभव दिखता नही है.. हालाँकि ये राजनीति है भैया पोलिटिक्स यहाँ कुछ भी हो सकता है. आइये हम अब बात करते है कि आखिर शिवसेना बैकफुट पर जाने के लिए मजबूर क्यों है? ऐसी क्या स्थिति आ गयी? आइये इसे समझते है.

दरअसल जो जानकारी शिवसेना के अंदर से निकलकर सामने आ रही है उसके मुताबिक़ शिवसेना के कई नेता उद्धव ठाकरे के अड़ियल रवैये से नाराज है. कुछ नेता 5050 फार्मूले का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ सरकार बनाने के पक्ष में है. हालाँकि अचानक बुलाये गये विधायक दल की बैठक में जो कुछ हुआ हो इसी तरह इशारा कर रहा है कि शिवसेना बैकफुट पर आ गयी.

दरअसल शिवसेना की तरफ से अचानक से विधायक दल की बैठक बुलाई गयी और फिर एक नाथ शिंदे को विधायक दल का देता चुन लिया गया है.. जबकि कुर्सी की मांग सभवतः आदित्य ठाकरे के लिए हो रही है. आखिर उसके लिए ऐसी क्या मजबूरी थी? जो उसे शिंदे को विधायक दल का नेता चुनने के लिए मजबूर कर दिया. इस मजबूरी की सबसे बड़ी वजह यही बताई जा रही है कि भाजपा से शिवसेना के इस रवैये को लेकर पार्टी दो धड़ों में बंट गई है. जिसके डैमेज कंट्रोल के लिए वो बैकफुट पर जाने को मजबूर हो गई. 2.5-2.5 साल के फॉर्मूले पर अड़ा हुआ है. इस धड़े में है संजय राउत, अनिल परब और दिवाकर राउते जैसे नेता शामिल हैं. दूसरा दल है जो शांत तरीके से पेश आने की बात कर रहा है जिसमें अनिल देसाई, सुभाष देसाई और विनायक राउत जैसे कई नेता शामिल हैं. शिवसेना की टेंशन बढाने वाली सबसे बड़ी वजह..

दरअसल हाल ही में भाजपा से राज्यसभा सांसद संजय ककडे ने दावा किया था कि शिवसेना के 45 विधायक बीजेपी के सम्पर्क में है और वे जल्द सरकार बनाने और देवेन्द्र फदंवीस को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में है. इस खबर के बाद शिवसेना में फूट और टूट की ख़बरें छाने लगी और शिवसेना के मुखिया के लिए टेंशन हाई होने लगा… इसी को कंट्रोल करने के लिए अचानक विधायक दल की बैठक में एक नात शिंदे को शायद विधायक दल का नेता चुन लिया गया.. हालाँकि ये तीन संकेत ऐसे हैं तो साफ़ साफ़ दिखा रहे हैं कि शिवसेना अब बैकफुट पर आ गयी है.. ज्यादातर लोगों का ये भी मानना है कि शिवसेना बस मुख्यमंत्री पद के लिए ये सब कर रही है..थोड़े समय में शिवसेना और बीजेपी की सरकार बन जायेंगी लेकिन ये राजनीति है भैया कुछ भी हो सकता है…