कांग्रेस में महाभारत, गांधी परिवार के खिलाफ बगावत कर बैठे ये दो बड़े नेता

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दिल्ली चुनाव के परिणाम आये 10 दिन बीत गए हैं लेकिन कांग्रेस में महाभारत थमने का नाम नहीं ले रहा. दिल्ली में मिली करारी हार के बाद पहले तो कांग्रेस के दुसरे दर्जे के नेता एक दुसरे पर ही हमले कर रहे थे. लेकिन अब हालात इतने बिगड़ गए हैं कि खुलेआम गांधी परिवार पर हमले होने लगे हैं. कभी परिवार के खिलाफ कांग्रेस ने नेताओं की जुबान नहीं खुलती थी लेकिन अब गांधी परिवार के खिलाफ खुलेआम बगावत हो गई है.

दिल्ली कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने गांधी परिवार की नीतियों पर खुलकर निशाना साधा. और सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि शशि थरूर जैसे नेता भी इस मसले पर संदीप दीक्षित के साथ आ खड़े हुए हैं. शशि थरूर ने भी मान लिया है कि गांधी परिवार का अब पार्टी पर पहले जैसा प्रभाव और पकड़ नहीं है. कई ऐसे राज्यों में भी नेता एक दुसरे के खिलाफ मोर्चा खोले खड़े हैं जहाँ पार्टी सत्ता में है. मसलन पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में संदीप दीक्षित ने कहा, लोकसभा चुनाव में हार के इतने महीनों के बाद भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नया अध्यक्ष नहीं नियुक्त कर सके. इसका कारण यह है कि वह सब यह सोच कर डरते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे. उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कि कांग्रेस के पास नेताओं की कमी है. पार्टी में आधा दर्जन नेता ऐसे हैं जो अध्यक्ष बन कर पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं. लेकिन  ऐसा लगता है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही नहीं चाहता कि कुछ हो.

संदीप दीक्षित के इस बयान के बाद शशि थरूर भी उनके साथ आ गए. दीक्षित के सुर में सुर मिलाते हुए शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा, ‘संदीप दीक्षित ने जो कहा है वह देश भर में पार्टी के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं. इनमें से कई नेता पार्टी में जिम्मेदार पदों पर बैठे है. मैं सीडब्ल्यूसी (कांग्रेस वर्किंग कमिटी) से फिर आग्रह करता हूं कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने और मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए नेतृत्व का चुनाव कराएं.’

संदीप दीक्षित और शशि थरूर ने जिस तरह की बातें कही है वो कांग्रेस के लिए नई है. कांग्रेस में अब तक गांधी परिवार के खिलाफ इसी तरह से आवाजें नहीं उठी है. होता ये था कि गांधी परिवार के बचाव में सारे कांग्रेसी आ कर खड़े हो जाते थे. लेकिन लगातार हार दर हार ने पार्टी को इस हाल में पहुंचा दिया कि अब गांधी परिवार के खिलाफ आवाजें उठने लगी है. सोनिया गांधी अस्वस्थता के कारण सक्रीय राजनीति से लगभग दूर हैं. राहुल गाँधी को न तो पार्टी से मतलब है और न राजनीति से. वो खुद में ही मगन है. प्रियंका गाँधी थोड़ी सक्रीय हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में ही ये साबित हो गया कि प्रियंका का करिश्मा भी अब कांग्रेस को नहीं उबार सकता.