शरद पवार ने 41 साल पहले जो बोया था वो अब काट रहे हैं

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बॉलीवुड की फिल्म पेज 3 में एक गाना था “कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पर” ये गाना भारतीय राजनीति पर 100 फीसदी खरा उतरता है. वाकई में कितने अजीब रिश्ते हैं, कब कौन किस तरफ पलटी मार दे कोई नहीं कह सकता. यहाँ सबको अपने हिस्से की पावर चाहिए. यहाँ कोई किसी के नीचे रहना नहीं चाहता. यहाँ सबको सिकंदर बनना है.

सिकंदर बनने की चाहत तो अजीत पवार में भी थी लेकिन चाचा उनकी जगह अपनी बेटी को तरजीह दे रहे थे. लिहाजा जिस चाचा शरद पवार की उंगली पकड़ कर भतीजे अजीत पवार ने राजनीति का ककहरा सीखा, उसी चाचा का दामन झटकने में जरा भी देर नहीं लगाया. लेकिन क्या ये अप्रत्याशित था? क्या ऐसा पहले कभी नहीं हुआ? भारतीय राजनीति के इतिहास में अगर आपकी दिलचस्पी है तो आपको पता होगा ये अप्रत्याशित बिलकुल नहीं है.आखिर अजीत पवार ने अपनी पार्टी और चाचा के साथ वही किया जो 41 साल पहले शरद पवार ने अपनी पार्टी कांग्रेस और अपने राजनीतिक गुरु वसंत दादा पाटिल के साथ किया था.

वसंतदादा पाटिल

बात है 1978 की, इमर्जेंसी लगाने के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस को काफी नुक्सान हुआ. उस वक़्त महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे शंकर राव चव्‍हाण. शंकर राव चव्‍हाण ने हार की नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया. उनकी जगह वसंतदादा पाटिल को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया. उस वक़्त शरद पवार भी कांग्रेस में युवा नेता के तौर पर थे. वसंतदादा पाटिल के मुख्यमंत्री बनते ही कांग्रेस टूट गई. एक हिस्सा इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस (I) बना और दूसरा हिस्सा कांग्रेस (U) बना जिसमे शंकर राव चौहान और शरद पवार शामिल हुए.

978 में महाराष्‍ट्र में विधानसभा चुनाव हुआ और कांग्रेस के दोनों धड़ों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा. कांग्रेस (आई) को 62 और कांग्रेस (यू) को 69 सीटें मिली लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी जनता पार्टी. जनता पार्टी ने 99 सीटें हासिल की लेकिन बहुमत से दूर रह गई. बाद में जनता पार्टी को सत्‍ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के दोनों धड़ों ने एक साथ म‍िलकर सरकार बनाई. वसंतदादा पाटिल सीएम बने. इस सरकार में शरद पवार उद्योग और श्रम मंत्री बने.

लेकिन शरद पवार सिर्फ मंत्री बन कर संतुष्ट नहीं हुए. उनके मन में मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा हिलोरे मार रही थी. सिर्फ 5 महीने में ही उन्होंने वसंतराव सरकार को गिरा दिया और जनता पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री बन गए. उस वक़्त शरद पवार की उम्र 38 साल थी और वो महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.

अब शरद पवार 78 साल के हो चुके हैं और फिर वो उसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ 41 साल पहले थे. बस फर्क ये है कि इस बार उनकी पार्टी टूटने के कगार पर है. अपने 50 साल के राजनीतिक जीवन में शरद पवार ने जो कुछ हासिल किया है वो सब दांव पर लगा हुआ है. फिलहाल तो अपनी सियासी अनुभव का इस्तेमाल कर वो अपनी पार्टी को बचाते दिख रहे हैं. देखते हैं कब तक बचा पाते हैं.