सेक्रेड गेम्स फिक्शनल शो के नाम पर एजेंडा परोस रहा है

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नेटफ्लिक्स ने जबसे भारत में अपने पैर जमाये है वो लगातार दर्शकों को ब्रेनवाश करने के एजेंडा पर काम कर रहा है. लीला, घोऊल जैसी series इस घृणित मानसिकता का खासा उदाहरण पेश करती हैं.

वैसे नेटफ्लिक्स की सबसे लोकप्रिय series सेक्रेड गेम्स के पहले पार्ट में अनुराग कश्यप ने अपनी धर्म विरोधी विचार धारा को साफ़ ज़ाहिर नहीं किया था लेकिन अगर बात की जाए हल ही में रिलीज़ हुई ‘सेक्रेड गेम्स सीजन 2 ’ की तो इस पूरी सीरीज के प्लाट में हिन्दू आतंकवाद का तड़का मारा गया है. इस series के ज़रिये हिन्दू धर्मगुरुओं को आतंकवादी के सामान दिखाया गया है सीरीज में गैतोंडे के तीसरे बाप की एंट्री हुई है जो की इस दुनिया को खत्म कर सत्ययुग में लौटना चाहते है जिसके लिए वो न्यूक्लेर अटैक की प्लानिंग भी करते हैं. वो दुनिया को खत्म करना चाहते हैं इसके साथ ही उसे झांसे में लेकर अपने शिष्यों को यौन शोषण का शिकार बनाते हुए दिखाया गया है. साथ ही जिस फ़साद को हिन्दू धार्मिक ग्रंथ से जोड़ कर दिखया जा रहा है वहां इस तरह की चीज़ का कोई उल्लेख ही नहीं है. फिक्शन के नाम पर ये सिर्फ धर्म को बदनाम करने की कोशिश है.

इसके अलावा इस series में मुसलिम धर्म के लोगों को पीड़ित और मासूम दिखाया जाता है, इसमें खास तौर से इन्हें शांति दूत के तौर पर दिखाया गया है.

यहाँ सबसे बड़ी दिक्कत ये है की दर्शक सितारों के किरदारों से प्रेरित होते हैं, उन्ही के स्टेण्ड मानकर उसे फॉलो करने लगते है, ऐसे में लोगों के अंदर हिन्दू धर्म को लेकर घृणा पैदा करने की बहुत बड़ी साजिश के तौर पर देखा जा सकता है. इस वक्त हिमारे देश मे कमर्शियल आउटपुट के सामने विचारधारा और धार्मिक भावनाओं की कोई वैल्यू नहीं रह गयी है.

चाहे आप नवाजुद्दीन सिद्दीकी की ‘मियाँ कल आना’ को देख लीजिए या फिर अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे. इन सबसे धार्मिक भावनाओं को आहात पहुंचे की हर मुमकिन कोशिश की गई है. कम्युनलिस्म के रस से सराबोर ये कहानी केवल समाझ को दूषित करने का काम कर रही हैं. आखिर एक ही धर्म को हर बार टारगेट करना क्या दर्शाता है?

लेकिन अगर इसपर दर्शक या मीडिया आपत्ति जताती है तो ये कलाकार और निर्देशक असहिष्णुता का रोना रोने लगते हैं लिबर्टी ऑफ़ आर्ट की दुहाई देने लग जाते है. क्या यही है वो secularism जिसकी ये दिन रात दुहाई देते है?