इस वजह से सिंधिया नहीं बन सके सचिन पायलट, कर बैठे ये गलती

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कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल होता है और इस खेल में टाइमिंग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. कौन सी चाल कब चलनी है और कब किस प्यादे को आगे बढ़ाना है ये अगर समझ लिया तो फिर बाजी आपके हाथ. आज से करीब चार महीने पहले मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभावनाओं को टटोला और सही वक़्त पर सही चाल चल कर कांग्रेस के होश उड़ा दिए थे. अब राजस्थान में भी वही हालात बने, सचिन पायलट ने गहलोत सरकार झकझोरने की कोशिश तो की लेकिन वो सिंधिया नहीं बन सके. आखिर क्यों पायलट नहीं बन सके सिंधिया? क्यों चूक गए पायलट? आज हम इसी पर चर्चा करेंगे.

दिसंबर 2018, मध्य प्रदेश और राजस्थान में एक साथ चुनाव हुए और एक साथ परिणाम आये. कांग्रेस ने दोनों ही राज्यों में भाजपा का किला उखाड़ दिया औए शानदार वापसी की. लेकिन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के साथ एक दिक्कत थी. दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के दो खेमे थे. एक खेमा कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे बुजुर्गों का तो दूसरा खेमा ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवाओं का. मध्य प्रदेश की कमान कमलनाथ को सौंप दी गई और राजस्थान में अशोक गहलोत को. सिंधिया और पायलट जैसे युवा मन मसोस कर रह गए. लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान के हालातों में थोडा अंतर था. मध्य प्रदेश में सिंधिया को न तो मुख्यमंत्री का पद ही मिला और न प्रदेश अध्यक्ष पद. दोनों ही पदों को कमलनाथ ने हथिया लिया और सिंधिया की झोली खाली रह गई. मध्य प्रदेश में सिंधिया के साथ नाइंसाफी हुई थी. इसलिए लोगों की सहानुभूति उनके साथ थी. लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं था.

राजस्थान में सचिन पायलट के पास उपमुख्यमंत्री का पद भी था और प्रदेश अध्यक्ष का पद भी था. राजस्थान में ऐसी कोई वजह नहीं थी कि सचिन पायलट को बगावत करनी पड़े. मध्य प्रदेश में सिंधिया के बगावत की मुख्य वजह ये थी कि दिग्विजय गुट और कमलनाथ गुट ने उन्हें पूरी तरह साइड लाइन कर दिया था. कहा तो ये भी गया कि लोकसभा चुनाव में सिंधिया गुना सीट से हार गए क्योंकि दिग्विजय और कमलनाथ गुट ने सिंधिया के पर कतरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. सिंधिया का लगातार अपमान हो रहा था लेकिन इसके बावजूद सिंधिया ने जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया. उन्होंने इंतज़ार किया सही वक्त का.

राजनीति में टाइमिंग का बहुत महत्त्व होता है. जब सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत की तो उन्होंने कांग्रेस को सँभलने का मौका नहीं दिया. सिंधिया पहले ही मन बना चुके थे कि उन्हें भाजपा में जाना है, कमलनाथ की सरकार गिरानी है. सिंधिया अपने समर्थक विधायकों की विश्वसनीयता को परख चुके थे. सबसे बड़ी बात कि सिंधिया महाराज थे और उनके समर्थक विधायक उनके प्रति निष्ठावान थे. लेकिन इस मामले में सचिन पायलट कच्चे खिलाड़ी निकले. दरअसल पायलट कन्फ्यूज्ड थे. वो ये तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें कांग्रेस में रहना है या भाजपा में जाना है. पायलट ये तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें गहलोत की सरकार गिरानी है या नहीं. यहाँ पायलट से एक गलती और हो गई. जब सिंधिया ने बगावत की तो उन्होंने भाजपा में जाने का मन बना लिया था और भाजपा ने उनके समर्थक विधायकों को इस्तीफ़ा दिलवा करे विधानसभा की संख्या कम करने के लिए राजी कर लिया था. सिंधिया ने जब भाजपा में शामिल होने के लिए अमित शाह से मुलाक़ात कर ली तब फजीहत से बचने के लिए कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाला. लेकिन राजस्थान में पायलट भाजपा के संपर्क में नहीं थे और उनकी अनिश्चितता को देखते हुए भाजपा ने भी अपने पत्ते नहीं खोले और वो वेट एंड वाच की स्थिति में रही. पायलट ने फैसला लेने में देर कर दिया और इतने में गहलोत को मौका मिल गया.

राजनीति में फैसले त्वरित लेने पड़ते हैं ..लेकिन सचिन पायलट उहा पोह की स्थिति में रहे. कांग्रेस ने उनके खिलाफ  एक्शन लिया तो पायलट के सुर भी नरम पड़ते दिखे. अपनी गलतियों और कन्फ्यूज्ड मनोदशा की वजह से पायलट सिंधिया नहीं बन पाए. क्योंकि टाइमिंग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है और पायलट की टाइमिंग खराब रही. छक्का मारने के चक्कर में वो बाउंड्री पर कैच आउट हो गए.