लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में लग गये 17 साल और 8 करोड़ रूपये!

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राम मंदिर विवाद को लेकर सुनवाई पूरी हो चुकी है. सालों से चले आ रहे हैं इस विवाद में ना जाने कितनी बार सुनवाई हुई, दलीलें दी गयी, कितने विवाद इस दौरान खड़े हुए.. लेकिन अब ऐसी उम्मीद जगी है कि इसपर फैसला आ ही जायेगा.. राम मंदिर को लेकर कई तरह के जांच हुए, जाँच समिति बनी लेकिन विवाद विवाद ही रहा. मामले को सुलझाने की भी कोशिश की गयी लेकिन कोई फायदा नही हुआ. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूरी हो गयी है. अब बस फैसला आना बाक़ी है,लेकिन आज हम आपको राम मंदिर से जुड़ी एक ऐसी खबर बताने जा रहे है जो आपको हैरान कर देगी. दरअसल अयोध्‍या में विवादित ढांचे को गिराए जाने के बाद 16 दिसंबर 1992 को केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से एक आयोग गठित किया गया, जिसका नाम लिब्राहन आयोग था. यह आयोग आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्राहन की अध्‍यक्षता में गठित किया गया था. आपको जानकार हैरानी होगी कि इस आयोग का कार्यकाल 17 सालों तक रहा. इस दौरान इस आयोग की अवधि कई बार बढ़ाई गयी. इस आयोग की जिम्मेदारी थी कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद हुए दंगे की जांच करना.


इस आयोग का जब गठन किया गया था, उस समय इसकी अवधि मात्र तीन माह की थी,लेकिन जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक़ इस अवधि को 48 बार बढाया गया. 2009 में इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को सौंपी थी. इस रिपोर्ट की कुछ डिटेल मीडिया में भी आ गयी थी जिसके बाद हंगामा भी हुआ था. जानकारी के मुताबिक़ इस एक सदस्यीय आयोग पर सरकार ने लगभग आठ करोड़ रूपये खर्च कर दिए थे.  दरअसल जब बाबरी मस्जिद गिराई गयी थी उस वक्त राज्य सरकार के साथ साथ केंद्र सरकार पर भी सवाल खड़ा किया गया था. केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे.केंद्र सरकार पर आरोप लगा कि वो दंगे को रोकने में पूरी तरह फेल हो गयी..राव ने प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद नरसिम्हा राव ने एक आयोग का गठन किया था जिसका काम था ये पता लगाना कि आखिर दंगे भड़काने के लिए जिम्मेदार कौन था? कहाँ चूक हुई? ग़लती किसकी थी? इस आयोग को नाम दिया गया लिब्राहन आयोग..

यहाँ आपको बता दें कि इस आयोग की तरफ से अंतिम गवाह भी साल 2005 में कल्याण सिंह ही थे. इस लिब्राहन आयोग के कार्यकाल के दौरान 399 दिन सुनवाई हुई और इस दौरान 100 गवाह पेश किये गये थे. इनमें कल्‍याण सिंह के अलावा पीवी नरसिंहरात, लाल कृष्‍ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, मुलायम सिंह यादव, वीपी‍ सिंंह, कलराज मिश्र, ज्‍योति बसु, केएस सुदर्शन, एसबी चव्‍हाण, तत्कालीन डीएम आरएन श्रीवास्तव, एसएसपी डीबी राय समेत कई अधिकारी और पुलिस अधिकारी शामिल किये गये थे. इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 68 लोगों पर कार्रवाई की बात कही थी. इसमें कई नेता शामिल थे. इस रिपोर्ट को सामने आने में 17 साल लग गये जबकि गठन के वक्त इसकी सीमा मात्र तीन महीने की थी.

इस आयोग के लिए आठ करोड़ रूपये भी खर्च किये गये. ये रिपोर्ट सरकार के कितना काम आई, इस रिपोर्ट फायदा कितना हुआ.. इस आयोग को रिपोर्ट देने में इतना वक्त क्यों लगा इस पर अलग से चर्चा हो सकती है.. लेकिन अब राम मंदिर विवाद पर फैसला आने वाला है.. सालों से चले आ रहे इस केस की सुनवाई पूरी हो चुकी है.. फैसला आने से पहले ही अयोध्या में धारा 144 लगा दी गयी है. सुरक्षा के लिहाज से चेकिंग की जा रही है, इसी बीच दिवाली भी है और दिवाली के बाद राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है. और इस फैसले का इन्तजार आपकी तरह हम सबको है.