आखिर क्यूँ करनी पडी म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक ?

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सर्जिकल स्ट्राइकस की लिस्ट में जुड़ा तीसरा नाम म्यांमार सर्जिकल स्ट्राइक में एक दर्जन आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया.. यह तो आप सभी जानते हैं लेकिन आपको बता दें कि यह म्यांमार में की गई दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक है.. इससे पहले भारत म्यांमार सेना के साथ मिलकर 1 जून 2015 में भी सर्जिकल स्ट्राइक कर चुका है

अब आते हैं उन वजहों पर जिस वजह से भारत को म्यांमार सेना के साथ मिलकर आतंकी ठिकानों पर यह सर्जिकल स्ट्राइक करनी पडी

इस सर्जिकल स्ट्राइक का टारगेट था म्यांमार में मौजूद अरकान आर्मी आतंकी संगठन जो लगातार म्यांमार सेना से लड़ता रहता है.. दरअसल यह आतंकी संगठन सित्वे पोर्ट के लिए खतरा बन चुका था,
भारत के सहयोग से निर्मित सित्वे पोर्ट म्यांमार में चालू हो चुका है जिसके बाद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक एवं व्यापारिक स्थिति मज़बूत होनी निश्चित है। सित्वे पोर्ट का निर्माण कालादान मल्टी मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत हुआ है, कालादान प्रोजेक्ट भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और कलकत्ता को म्यांमार के रखाइन और चिन राज्यों से पानी और सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए 2008 में प्रारंभ किया गया था। भारत ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग ₹3170 करोड़ का निवेश किया है जिसमें से सित्वे पोर्ट और पालेत्वा में इंटरनेशनल जलमार्ग पर लगभग ₹517 करोड़ खर्च हुए हैं।

चीन ने कालादान परियोजना को बाधित करने के बहुत कोशिशें की थी। अगर चीन म्यांमार में मौजूद इस सित्वे पोर्ट पर कब्ज़ा कर लेता तो बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना को अपना अधिकार दुबारा प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता। चीन म्यांमार के आतंकी गुटों से भी कांटेक्ट में था ताकि उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार के मार्ग से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में घुसपैठ कराई जा सके। सित्वे को सुरक्षित रखना भारत के हित में जरूरी था इसलिए भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर अराकान आर्मी को सबक सिखाया। 

इस ऑपरेशन में करीब एक दर्जन आतंकी कैम्पों को ध्वस्त कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार भारत ने पहले से ही म्यांमार की 1600 किमी लंबी सीमा पर इन्फैंट्री, असम राइफल्स, स्पेशल फ़ोर्स और ड्रोन सिक्यूरिटी फोर्सेज  तैनात किए है। म्यांमार और भारतीय सेना ने मिलिट्री ऑपरेशन कर अराकान आर्मी के 10-12 कैंप तबाह कर दिए जो कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ मिलकर काम कर रहे थे। कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी चीन के साथ काम करने वाला संगठन है।

सर्जिकल स्ट्राइक जून 2015

आपको बता दें कि इससे पहले जून 2015 में भी सर्जिकल स्ट्राइक की गई, इस सर्जिकल स्ट्राइक में डोगरा रेजिमेंट के 18 सैनिकों की हत्या का बदला लिया गया था। 4 जून 2015 को NSCN के आतंकवादियों ने मणिपुर के चंदेल ज़िले में भारतीय सेना के 18 जवानों की हत्या कर दी थी। इसका प्रतिशोध लेने के लिए भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा के 10 किमी भीतर तक स्पेशल फ़ोर्स भेजी थी।

स्पेशल फ़ोर्स की जिस यूनिट (21 PARA SF) को म्यांमार भेजा गया था उसे ‘वाघनख’ नाम दिया गया था। यह नाम छत्रपति शिवाजी के उस वाघनख पर रखा गया था जिससे उन्होंने अफजल खान का वध किया था। स्पेशल फ़ोर्स की 21 PARA यूनिट पहले 21 मराठा लाइट इन्फैंट्री बटालियन थी। बाद में उसे स्पेशल फ़ोर्स यूनिट बनाया गया था। म्यांमार जाने से पहले स्पेशल फ़ोर्स की यूनिट संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर साउथ सूडान जाने वाली थी। तभी उन्हें दिल्ली से नॉर्थ ईस्ट आने के आदेश मिले। इस पर एक जवान ने मजाक में कहा, “कहाँ तो हम प्लेन से विदेश जाने वाले थे लेकिन अब पैदल जाना पड़ेगा।” 

स्पेशल फ़ोर्स को दो ठिकानों पर हमले करने थे- एक जिसमें करीब 150-200 आतंकी थे और दूसरा छोटा था जिसमें 50-60 आतंकी थे। हमले की पूरी प्लानिंग 57 डिविज़नल हेडक्वार्टर इंफाल में बनाई गई। निर्धारित रणनीति के तहत तत्कालीन कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत ने पूरी गोपनीयता के साथ स्पेशल फ़ोर्स की टुकड़ी को ऑपरेशन को अंजाम देने के आदेश दिए। 9 जून को 50 सैनिकों की टुकड़ी म्यांमार के घने जंगलों में घुसी जहाँ बड़े कैंप पर अचानक हमला किया गया। उस कैंप में लगभग 150 आतंकी थे। स्पेशल फ़ोर्स को स्पष्ट निर्देश थे कि मारे गए आतंकियों की लाशें गिनने या फोटो लेने के लिए रुकना नहीं है। उन्हें काम खत्म कर लौटने का आदेश था। 

उस दौरान स्पेशल फ़ोर्स के लौटक्र आने के तुरंत बाद अजित डोभाल और विदेश सचिव जयशंकर ने म्यांमार जाकर राजनयिक संबंध मजबूत किए जिसके कारण हमें म्यांमार से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी और आतंकी संगठनों को समाप्त करने में म्यांमार आर्मी की सहायता मिली।