इन वजहों से दिल्ली में भाजपा को लग गया करंट और हो गयी फजीहत

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर शानदार बहुमत के साथ वापसी की. हालाँकि उनकी सीटें पिछली बार के मुकाबले कुछ घटी लेकिन इसके बावजूद उन्हें जैसा बहुमत मिला उसे प्रचंड ही कहा जाएगा. 22 सालों से सत्ता का वनवास झेल रही भाजपा को और 5 साल का वनवास अभी झेलना होगा. इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने ये साबित कर दिया कि उसके लिए न तो CAA का मुद्दा महत्वपूर्ण है और न आर्टिकल 370 और न शाहीन बाग़. दिल्ली की जनता को बस दिल्ली के विकास से मतलब है और इस विकास के लिए उन्होंने एक बार फिर केजरीवाल पर भरोसा किया.

अगर बात करें भाजपा के करारी हार की तो इसके पीछे 5 मुख्य कारण रहे. आइये देखते हैं उन कारणों को जिसकी वजह से भाजपा को हर झेलनी पड़ी.

विकास के मुद्दे को छोड़ना : भाजपा को विकास की मुद्दा छोड़ कर शाहीन बाग़ और हिन्दू-मुस्लिम करना महंगा पड़ गया. भाजपा का पूरा चुनाव प्रचार बस शाहीन बाग़ पर केन्द्रित था. उसके पास उस विजन का अभाव था, उसके पास उस योजना का अभाव था जिसके दम पर वो खुद को आम आदमी पार्टी के विकल्प के रूप में सामने ला सके.

क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी करना : भाजपा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वो राज्यों के चुनाव को भी राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ने की कोशिश करती है और हर बार उसका ये दांव असफल साबित होता है. महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड विधानसभा चुनाव को भी आर्टिकल 370 जैसे मुद्दों को आगे कर के लड़ने कि कोशिश की और क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी की. यही गलती दिल्ली में भी दोहरा दी.

चेहरे का न होना : भाजपा चाहती है कि हर चुनाव को मोदी के नाम और चेहरे पर लड़ा जाए जबकि जनता ये समझती है कि मोदी तो मुख्यमंत्री बनने आयेंगे नहीं. दिल्ली की जनता के सामने केजरीवाल के मुकाबले में कोई विकल्प नहीं था जिस पर वो भरोसा कर सके. लिहाजा जनता ने केजरीवाल के चेहरे पर भरोसा किया.

केजरीवाल पर निजी हमले : भाजपा नेताओं ने केजरीवाल पर खूब निजी हमले किये. उन्हें नक्सली और आतंकी बताया गया और केजरीवाल उसे अपने पक्ष में भुना ले गए. पीएम मोदी को जब विपक्ष अपशब्द कहता है तो भाजपा कहती है कि पीएम पद की गरिमा का सम्मान विपक्ष नहीं कर रही लेकिन खुद वही गलती कर बैठी और निर्वाचित मुख्यमंत्री को नक्सली और आतंकी कह बैठी.

प्रचार में देरी : आम तौर पर देखा जाता है कि भाजपा महीनों पहले से चुनाव की तैयारियां शुरू कर देती है. लेकिन दिल्ली चुनाव मे भाजपा को देख कर लगा कि वो पहले से ही अपनी हार तय मान चुकी है. सोशल मीडिया पर भी भाजपा का चुनावी अभियान फिसड्डी नज़र आया और आम आदमी पार्टी हावी दिखी. 15 जनवरी के बाद जब भाजपा के चुनाव अभियान में तेजी आई तब तक देर हो चुकी थी.