आखिर कब सुधरेगी भारतीय मीडिया?

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किसी का बलात्कार हो गया?
पता करो बलात्कार पीड़िता और बलात्कारी की जाति क्या है? उनका धर्म क्या है?

किसी का क़त्ल हो गया?
पता करो क़त्ल करने वाले और क़त्ल होने वाले की जाति क्या है? उनका धर्म क्या है?

किसी जगह दंगा हो गया?
पता करो दंगा करने वालों की जाति क्या है?

खबर कोई भी हो, हर खबर में जाति खोज लो, धर्म खोज लो. क्योंकि ये वो मसाले हैं जिनसे ख़बरों में तड़का लगता है. हाई TRP का तड़का. जाति और धर्म को जब किसी भी खबर के साथ मिलाया जाता है ना साहब, तो खबर से जो स्वाद आता है, जो सुगंध आती है मज़ा आ जाता है.

यही तो वो वज़ह है जिसके चलते हर खबरिया चैनल हर एक खबर के पीछे से जाति के मसाले खोजने लगता है.
अभी हाल में उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में भाजपा सांसद और विधायक के बीच हुई मारपीट की घटना पर भी देश का मीडिया यही कर रहा है. भाजपा के सांसद शरद त्रिपाठी और विधायक राकेश सिंह बघेल के बीच 6 मार्च को मारपीट हो गई.

संत कबीर नगर के कलेक्ट्रेट सभागार में जिला योजना समिति की बैठक चल रही थी. बैठक के बीच ही संत कबीर नगर के भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी और मेहंदावल से विधायक राकेश सिंह बघेल के बीच एक सड़क निर्माण को लेकर विवाद हो गया. और ये विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच मारपीट तक हो गई.

उनके बीच हुई मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इस वीडियो में साफ़ दिख रहा था कि सांसद शरद त्रिपाठी अपना जूता निकलकर विधायक राकेश सिंह बघेल को पीटने लगे. राकेश सिंह बघेल भी शरद त्रिपाठी से भिड़ गए. ये हंगामा इतना बढ़ा कि दोनों नेता एक- दूसरे पर जूते बरसाने लगे.

हंगामा जब बहुत ज्यादा बढ़ गया. तो आस- पास मौजूद अधिकारियों ने किसी तरह बीच- बचाव किया. ये घटना सच में बेहद निंदनीय है. उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष महेंद्र पाण्डेय ने भी संतकबीर नगर की इस घटना को बेहद निंदनीय बताया है.

सोशल मीडिया पर भाजपा नेताओं के बीच हो रही मारपीट का यह वीडियो जमकर वायरल हुआ. लोगों ने दोनों नेताओं का मज़ाक भी खूब उड़ाया. इस विडियो से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि ये लडाई राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है.

लेकिन भाजपा नेताओं की इस आपसी लड़ाई की वज़ह से दूसरी सभी राजनैतिक पार्टियों के नेताओं को भाजपा के खिलाफ बोलने का मौक़ा मिल गया है. उन्होंने इस वीडियो की वज़ह से चुटकी लेते हुए भाजपा का मज़ाक उड़ाया.
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदियानाथ ने मामले की पूरी जाँच करने और दोषियों को सज़ा देने की बात भी कही. अभी तक पूरे मामले में कहीं भी जाति- पति को लेकर कोई बात ही नहीं हुई थी, कोई सवाल ही नहीं उठा था.

लेकिन फिर अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कुछ बड़े मीडिया संस्थान आगे आये. उनको शायद ये सदमा लग गया होगा कि लड़ाई हुई और जाति कैसे बीच में नहीं आई? उन्हें सदमा लग गया होगा कि मारपीट हुई और जाति कैसे बीच में नहीं आई? उन्हें सदमा लग गया होगा कि,

“अरे बात जूते निकलने तक पहुँच गयी और अभी तक जाति किसे बीच में नहीं आई?”

यही सब सोचते हुए शायद बीबीसी ने अपना धर्म निभाना शुरू कर दिया. और इस हैडलाइन के साथ खबर बना दी,

“जूता कांड: क्या ये यूपी बीजेपी में ब्राम्हण क्षत्रिय वर्चस्व की लड़ाई है?”

टाइटल दोबारा पढ़िये और अंदाज़ा लगाइए कि इसका असर पढ़ने वालों पर क्या पड़ेगा,

“जूता कांड: क्या ये यूपी बीजेपी में ब्राम्हण क्षत्रिय वर्चस्व की लड़ाई है?”

बीबीसी ने अपनी इस हैडलाइन को सार्थक करने के लिए पुरानी बहुत सी छोटी- छोटी घटनाओं को जोड़कर उन्हें दोनों की जाति से जोड़ने की कोशिश की. उन्होंने कोशिश की किसी भी तरीके से ये दिखाने की दोनों के बीच ब्राम्हण- क्षत्रिय विवाद के चलते ऐसा हुआ.


राजनीति में नोकझोंक चलना आम बात है. लेकिन राजनीति की इस नोकझोंक को जातिवादी नोकझोंक का नाम दे देना सही नहीं लगता हमें. लेकिन कुछ मीडिया संस्थान हैं जो इस तरह की खबरें बनाने में महारत हासिल किये हुए हैं.


लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया वैसा ही बर्ताव करे जैसी उसकी छवि है तो अच्छा लगता है. क्योंकि उसकी बताई खबर का असर ना जाने कितने लोगों पर पड़ता है. कितने ही लोग हैं जो उनकी ख़बरों को पढ़कर प्रभावित होते हैं. इसलिए उन्हें ये पता होना चाहिए कि वो क्या लिख रहे हैं, क्या बता रहे हैं.

देखिये हमारा वीडियो: