सोशल मीडिया के जमाने में भी किताबों को पढ़ना बेहद जरूरी है

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किताबों का ज़िक्र जब भी होता है तो मुझे “हस्तीमल हस्ती” की  एक लाइन हमेशा याद आती है…

कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए 
कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे

और अगर गौर फरमाए तो कहीं न कहीं यह सच भी है… सबब का मतलब सबक या सीख कह लीजिये… लोग कहते हैं कि जिंदगी हमें सबसे बेहतर सीख सिखाती है लेकिन अगर सीख की बात हो रही तो हम किताबों को कैसे भूल सकते…क्योंकि किताबें ही वो आएना है जिनमें ताका झांकी कर के हम अपने आज को जी लेते है…

अगर आप किताब प्रेमी हैं और आपको किताबों में दिल्चापी है तो आपको पता ही होगा कि कितना कुछ छुपा होता है उन छोटी सी किताबों में … कभी कभी लोग अपनी पूरी ज़िन्दगी जिस चीज़ को समझने में लगा देतें है … वहीं सीख और ज्ञान 100 से 200 पन्नों में सिमटी रहती है…वैसे हम जैसे बुक लवर्स के लिए सबसे प्यारी चीज़ें किताबें ही होती है …

हालांकि अगर देखा जाए तो आधी ज़िन्दगी तो हमारी किताबों में ही बिताती और आधी ज़िन्दगी सौखिया किताबों को पढने में  …

ABCD… से लेकर रिसर्च थ्योरी तक हमेशा से हमने हर चीज़ को समझने के लिए किताबों की ही मदद ली है….

हाँ एक दौर था जब कहीं न कहीं किताबो से डर लगता था क्योंकि उस वक़्त किताबें सिर्फ पढने के लिए ही नहीं बल्कि इम्तेहान देने के लिए भी होती थी… लेकिन अब उन सीखों पर नाज़ होता है क्योंकि वह अब ज़िदगी के इम्तेहान में मदद करती है….

वैसे अगर देखा  जाए तो धीरे धीरे सब कुछ बदल सा रहा है… किताबों के मायने भी बदल रहे है….लोग अब फास्ट एंड फारवर्ड हो रहे हैं… आपने भी देखा है कैसे किताबों की जगह फ़ोन,लैपटॉप,kindle और आई पैड  लेते जा रहा है … लेकिन किताबों के पन्नो की खनक और उसकी सौंधी खुशबू की बात ही कुछ अलग होती है… जो की धीरे धीरे खत्म होते जा रही है… ऐसा लगता है कि अब ये आखिरी सांस ले रहा है…. तभी तो किसी ने इसपर क्या खूब लिखा है –

कागज की ये महक, ये नशा रूठने को हैये आखरी सदी है किताबों से इश्क की

ये लाइन इसलिए क्योंकि हम हमारी दुनियां 7 इंच के स्क्रीन में सिमट सी गई है…क्योंकि इसको carry करना काफी आसान जो होता है … लोग कहते है पढना ही तो है किताब से पढ़े या ऑनलाइन क्या फर्क पड़ता है?  लेकिन वो भूल जाते है कि किताबों को सिर्फ पढ़ा नहीं जाता है इन्हें संजोया जाता है….

इतिहास से लेकर भूगोल तक, newton’s laws से लेकर maths के theoram तक और लव स्टोरी  से लेकर हार्ट ब्रेक स्टोरीज और फिर motivational स्टोरीज तक हमने किताबों में पढ़ी है…

वैसे अगर देखें तो जब यह इन्टरनेट और फोंस नहीं हुआ करते थे तो पढाई  हो या मनोरंजन, किताबें ही एक मात्र सहारा हुआ करती थीं … वो दौड़ भी फुरसतों का हुआ करता था …पढाई हो या इश्क बड़े आराम से हुआ करता था… तब सबकुछ ट्वीटर पर ट्रेंड नहीं करता बस जो छपा करता था वही एक दुनिया हुआ करता था…

ऐसा नहीं है कि अब किताबें उपलब्ध नहीं है या फिर लोग उसे पढ़ते नहीं… UPSC, IIT, Medical, SSC और नाजाने कितने competative परीक्षाओं के लिए लोग किताबें पढ़ते है… हाँ ये सच है कि  अब हर गली मोहल्ले में एक किताब और मैगज़ीन की दूकान नहीं मिलती क्योंकि इसके लिए या तो एक पर्टिकुलर मार्किट बना दिए गए है… या फिर ऑनलाइन स्टोर… खैर किताबों से लोगों के अलगाव का कारण  यह भी है कि उनके costing को ऑनलाइन cost से compair किया जाए तो किताबें ज्यादा कीमती है .. इसलिए भी लोग इसको अवॉयड करते है …. और यह विरासत बनने के कगार पर खड़ी है…

यूं किताबों से लोगों की दूरी अच्छी  बात नहीं इसलिए तो इसके लिए अलग अलग आयोजन किए जाते है… जैसे की बुक फेयर एक ऐसा आयोजन है जिसे हर अलग अलग लेवल पर आयोजित किया जाता है…

मसलन किताबों के पन्नों को पलटकर हमें सीख मिलती है…इसे संजोने और प्यार करने के लिए बनाया गया है ना कि  विरासत बनाने के लिए….

वैसे जाते जाते कही पढ़ी कुछ लाइन याद आ रही है –

जब मां पास नहीं होतीं तो किताबें मां हो जाती हैं. जब कोई प्रेमी नहीं होता दुलराने के लिए तो किताबें प्रेमी बन जाती हैं. जब दोस्त  नहीं होती खुसुर-पुसुर करने और खिलखिलाने के लिए तो किताबें दोस्त  हो जाती है . किताबें सब होती हैं. वो अदब होती हैं और जिंदगी का सबब होती हैं..