रवीश कुमार को अब खुद टीवी देखना और टीवी पर दिखना बंद कर देना चाहिए

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कल से आप हर चैनल पर एक्जिट पोल तो देख ही रहे होंगे. हर चैनल के एक्जिट पोल में NDA की जोरदार वापसी दिखाई गई. कई चैनलों ने तो अकेले भाजपा को ही 300 सीटों के पार पहुंचा दिया. भाजपा समर्थक एक्जिट पोल के नतीजे देख कर खुश होंगे लेकिन कुछ लोग ऐसे थे जिन्हें इस एक्जिट पोल से बहुत तकलीफ थी. लेकिन आज हम उस शख्स की बात करेंगे जिसे सबसे सबसे ज्यादा तकलीफ हुई. वो थे इस ब्रह्माण्ड के एकलौते निष्पक्ष, इमानदार और सच्चे पत्रकार रवीश कुमार. एक्जिट पोल में जैसे जैसे NDA की सीटें बढती जा रही थी वैसे वैसे रवीश कुमार का ब्लड प्रेशर हाई होता जा रहा था. एक्जिट पोल के बाद रवीश कुमार ने अपने चैनल पर एक शो किया . इस शो में वो बहुत कुंठित, निराश नजर आये. टीवी स्क्रीन पर एक विंडो में  एक्जिट पोल के नतीजे और दुसरे विंडो में रवीश जी का वो निराश, कुंठित और पीड़ा का भाव वाला चेहरा देख पहली बार मुझे उनपर दया आई, तरस आया .

एक्जिट पोल के नतीजों को देख रवीश इतने खिसिया गए कि सारी व्यवस्था को खारिज करते नज़र आये. मीडिया हाउस को खारिज कर दिया , पत्रकारों के जर्नलिज्म के सर्टिफिकेट को खारिज कर दिया और आखिर तक आते आते उन्होंने चुनाव आयोग को भी खारिज कर दिया . बकौल रवीश कुमार, कुछ मीडिया हाउस और पत्रकारों ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया है इसलिए मोदी सरकार में उन्हें मंत्री पद मिलना चाहिए . ये कहते हुए रवीश कुमार के चेहरे पर मंत्री पद न मिल पाने की पीड़ा साफ़ झलक रही थी . आखिरकार पिछले 5 सालों से एक वही तो थे जिन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ मुखालफत का झंडा उठाये रखा था . शायद उन्होंने महागठबंधन की सरकार में अपने लिए भी किसी मंत्री पद का सपना संजो लिया होगा और वो सपना एक्जिट पोल देख कर टूटा तो पीड़ा छलक पड़ी .

मायावती के मंच पर रवीश कुमार

विपक्ष तो नकारा था . राहुल गाँधी से उन्हें कोई उम्मीद नहीं रही थी इसलिए उन्होंने हर उस चेहरे में अपना हीरो ढूँढने की कोशिश की जो थोडा मशहूर होता था . शुरुआत दिल्ली से हुई . दिल्ली विधानसभा में अरविन्द केजरीवाल ने शानदार बहुमत प्राप्त किया और वो रवीश कुमार के वो हीरो बन गए जो मोदी के वर्चस्व को चुनौती दे सके . लेकिन जल्द ही अरविन्द नाकाम हो गए तो फिर आया बिहार चुनाव. लालू और नीतीश की जोड़ी की जीत के बाद उन्हें लालू और नीतीश में हीरो नज़र आया . लिस्ट बहुत लम्बी है … हार्दिक पटेल, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, कन्हैया कुमार तक में रवीश कुमार ने अपना हीरो ढूँढने की कोशिश की .

अपने शो में रवीश कुमार ने उन तमाम राज्यों की गिनती करवा दी जहाँ भाजपा ने 185 सीटों का अगर लक्ष्य रखा तो उसे 88 सीटें मिली, 200 सीटों का लक्ष्य रखा तो 150 सीटें मिली. बिहार से लेकर गुजरात तक गिना दिए उन्होंने और इस आधार पर एक्जिट पोल को खारिज करते नज़र आये .

अपने शो में उन्होंने साइलेंट वोटर की बात की , जो डरा हुआ होता है लेकिन कौन है ये डरा हुआ वोटर, इसकी जानकारी नहीं देते. देंगे भी कैसे वो साइलेंट वोटर सिर्फ रवीश कुमार के शो में ही डरा हुआ होता है. इसी डरे हुए वोटर के आधार पर उन्होंने 5 साल तक ये माहौल बनाया कि देश में डर का माहौल है .

रवीश कुमार की कुंठा इसलिए भी है क्योंकि सत्ता पक्ष ने उनका बहिष्कार कर दिया, उनके चैनल का बहिष्कार कर दिया. पीएम मोदी अक्षय कुमार तक को इंटरव्यू दे रहे लेकिन रवीश कुमार को नही. उनकी कुंठा इसलिए बढ़ गई क्योंकि उन्होंने खुद को देश का इकलौता निष्पक्ष, कर्मठ और एकमात्र सच्चा पत्रकार मान लिया। उनके चैनल को सरकारी विज्ञापन नही मिलते, उनको पीएम इंटरव्यू नही देते, अपने ट्वीट में पीएम उनको टैग नही करते इसलिए उन्होंने सारे मीडिया को गोदी मीडिया मान लिया.

दरअसल जिस सत्ता के दरवाजे कभी रवीश कुमार की सीढियों पर खुला करते थे उस सत्ता ने उनको तरजीह देना बंद कर दिया. उनकी असल खीज ये है और इसी खीज में पत्रकार, देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था, चुनाव आयोग, जनता का बहुमत सब उनको झूठ लगता है. बस रवीश कुमार ही सच है और बाकी सब मिथ्या. इस भ्रम ने उनको इतना कुंठित कर दिया है कि वो अवसाद के गर्त में गिरते जा रहे हैं.

रवीश दूसरों को सलाह देते हैं कि टीवी देखना बंद कर दें लेकिन इस सलाह पर अमल करने की सबसे ज्यादा जरूरत उन्हें ही है. उन्हें चाहिए कि वो टीवी देखना बंद करें और टीवी पर दिखना भी बंद करें. बैंकॉक में समुंदर किनारे लम्बी सी छुट्टी मारे .. फिशिंग वगैरह करें, ताकि उनकी कुंठा कुछ कम हो और सुकून मिल सके.