जब रामायण के प्रसारण से डर गए थे कांग्रेस सरकार के कई मंत्री

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साल 1987. उन दिनों न तो इंटरनेट था, न यूट्यूब था, न नेटफ्लिक्स था और न अमेजन प्राइम. उन दिनों रेडियो हुआ करते थे और मोहल्ले के कुछ घरों में टीवी. साल 1987 के जनवरी महीने में 25 तारीख को एक इतिहास लिखा गया. टीवी पर पहली बार रामायण सीरियल का प्रसारण हुआ. वो पौराणिक कहानी जिसे अब तक घर के बड़े बुजुर्ग रामचरित मानस में पढ़ा करते थे. पहली बार उस कहानी को टीवी पर सजीव होते हुए देखा गया. पहली बार राम, सीत, और हनुमान, जिन्हें लोग तस्वीरों और मूर्तियों में देख कर पूजा करते थे, सजीव होते हुए देखे गए और इतिहास बन गया.

उन दिनों हर घर में टीवी नहीं हुआ करता था. मोहल्ल के कुछ घरों में टीवी थे. लेकिन रामायण ने घरों की दूरियां मिटा दी. रामायण देखने के लिए घर के सदय ही नहीं बल्कि पूरा मोहल्ला उस घर में इकठ्ठा हो जाता था जिस घर में टीवी हुआ करता था. राम सीता को टीवी पर देख लोग श्रद्धा से अपने हाथ जोड़ लिया करते थे. रामायण कितना सफल रहा इसे बताने की आवश्यकता नहीं. इस सीरियल को देखने के लिए कई घरों में नयी टीवी खरीद ली गई. लेकिन जिस सीरियल ने इतिहास रच दिया क्या उसके बनने की कहानी इतनी आसान नहीं थी. रास्ते में कई रुकावटें आई. कभी राजनीतिक रुकावट तो कभी आर्थिक रुकावट ने रामायण का रास्ता रोका. रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने अपने पिता की बायोग्राफी एन एपिक लाइफ : रामानंद सागर’ में रामायण सीरियल के बनने और उसके रास्ते में आने वाली कई रुकावटों के राज खोले हैं.

ऐसा नहीं था कि रामानंद सागर मनोरंजन इंडस्ट्री के लिए कोई नया नाम थे. उन्होंने रामायण के जरिये टीवी की दुनिया में प्रवेश किया था. उससे पहले वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा नाम थे. राजकपूर की सफलतम फिल्मों में गिनी जाने वाली बरसात (1949) की कहानी उन्होंने ही लिखी थी. बाद में रामानंद सागर ने ‘सागर आर्ट्स’ नाम से एक प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की और उस बैनल तले उन्होंने मेहमान (1953), आरजू (1965), आँखे (1968), गीत (1969), ललकार (1972),चरस (1976), बगावत (1982) जैसी फिल्मों का निर्माण किया. लेकिन जब उन्होंने ये ऐलान किया वो टीवी सीरियल रामायण बनायेंगे तो इंडस्ट्री के लोगों ने कहा उनका दिमाग खराब हो गया है. लेकिन रामानंद सागर तय कर चुके थे और पीछे हटने को तैयार नहीं थे.

रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने रामायण की तैयारियों का जिक्र करते हुए उनकी बायोग्राफी में लिखा है, ‘रामायण एक बड़ा प्रोजेक्ट था. उसके लिए अबसे बड़ी चुनौती पैसा इकठ्ठा करने की थी. पापा ने मेरे लिए दुनिया भर की टिकट खरीदी. एक कांटेक्ट लिस्ट थमाया और मुझे बिजनेस ट्रिप पर भेज दिया. उस लिस्ट में दुनिया भर में बसे उनके अमीर दोस्तों की जानकारी थी. मैं हर देश में जाता, उनके कांटेक्ट लिस्ट वाले दोस्तों से मिलता और पापा के प्रोजेक्ट के बारे में बताता. लेकिन कोई भी इसको लेकर कॉंफिडेंट नहीं था. कुछ ने अपने सेक्रेटरी को इशारा करके मुझे ऑफिस से बाहर करा दिया. पापाजी के एक करीबी दोस्त ने मुझे सलाह दी कि पापा को समझाओ कि क्या करने जा रहे हैं. एक महीने घूमने के बाद मैं खाली हाथ वापस लौट आया. ‘रामायण’ को खरीदने वाला कोई नहीं था.

काफी कोशिशों के बाद जब सब कुछ ठीक हुआ शूटिंग पूरी हुई तो टेलीकास्ट की समस्या आ गई. सरकार के अन्दर कई ऐसे लोग बैठे थे जिन्हें लगता था कि दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण उनके लिए नुकसान वाला साबित हो सकता है. प्रेम सागर किताब में लिखते हैं, दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में एक अलग ही तरह की आंधी चल रही थी. सरकार के कई लोग रामायण के प्रसारण से खुद को असहज महसूस कर रहे थे. सबसे बड़ी आपत्ति तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीएन गाडगिल की तरफ से आई. उन्हें लगा कि हिंदू पौराणिक धारावाहिक हिंदू शक्ति को जन्म देगा, जिससे भाजपा का वोट बैंक बढ़ सकता है. उन्हें डर था कि ‘रामायण’ हिंदूओं में हिंदूवादी भावना को जागृत करेगा जिससे भाजपा के सत्ता में आने की संभावना बढ़ जायेगी.

लेकिन तमाम दिक्कतों के बाद भी रामायण का प्रसारण हुआ और इसने इतिहास बना दिया.