देखिए कैसे बगदादी की मौत के बाद लिबरल मीडिया ने उसे बना दिया अब्बा जान

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27 अक्टूबर को अमेरिका की मिलिटेरी रेड में इस्लामिक स्टेट्स आतंकवादी संगठन का लीडर अबू-बकर अल- बगदादी मारा गया. दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन का सरगना जिसने इंसानियत और मानवता को शर्मसार कर दिया, मज़हब के नाम पर लाखों जाने लीं…. आखिरकार मारा गया. आपके और मेरे लिए शायद ये राहत की बात होगी… लेकिन ये खबर सुनकर की दुनिया भर के वामपंथी मीडिया की साँसे अटक गई.

कुछ बुद्धिजीवी पत्रकारों ने बघदादी की मौत पर ऐसा मातम मनाया की देखने वाले चौंक गए. दरअसल बगदादी कि मौत के बाद वाशिंगटन पोस्ट ने एक आर्टिकल छापा, जिसकी हैडलाइन थी, “Abu Bakr al-Baghdadi, austere religious scholar at the helm of Islamic State, dies at 48″. यानि की “अबू बक्र अल- बगदादी, इस्लामिक स्टेट का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान, 48 वर्ष की उम्र में मर जाता है.”

तो……वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ISIS का आतंकवादी इन चीफ एक धर्मिक विद्वान था. अब जो कोई भी ये खबर पढ़ेगा उसे क्या लगेगा, जब तक वो खबर की तह तक न जाये उसे क्या समझ आएगा शायद यही की एक धर्मिक स्कॉलर की मौत हो गयी हैं. ये लोग एक ऐसे इंसान का महिमामंडन कर रहे हैं जिसने सालों तक दुनिया में दहशत का माहौल बनाए रखा, जिसने हजारों लोगों को विस्थापित कर दिया और ना जाने कितने मासूमों की जान ले ली…. और भी सिर्फ मज़हब के नाम पर.

लेकिन आज उसकी मौत पर कुछ लोग चाह कर भी अपने मन का शोक छुपा नहीं पा रहे. वैसे इस लिस्ट में सिर्फ वाशिंगटन पोस्ट ही शामिल नहीं है…. बगदादी की मौत पर विधवा विलाप करने वालों की फेहरिस्त अभी लम्बी है.

बगदादी को मारे हुए अभी एक दिन भी नहीं गुजरा की बीबीसी हिंदी ने तो इस्लामिक स्टेट्स का नया सरगना तलाशना भी शुरू कर दिया. इन्हें इस बात की चिंता सता रही है की कहीं ISIS अब अनाथ न हो जाए, वैसे बीबीसी के लिए ये कोई नई बात नहीं है, उसने सालों से दुनिया को ज्ञान बाँटने का जिम्मा अपने सर ले रखा था मगर ज्ञान के बजाये ये लोगों को भटकाने का काम करते रहे, दुनिया को ISIS के बारे में आगाह करने कि जगह BBC हमेशा से ही लोगों को भ्रमित करने वाली खबरे ही प्रकाशित करता रहा है. ये संस्थान कभी भी बघदादी को आतंकवादी मानते ही नहीं थे… तभी तो इन्होने अपने हर आर्टिकल में उसे लीडर कह कर संबोधित किया है, बीबीसी ने अपने सभी आर्टिकल में बघदादी को इतना सम्मान बक्शा है मानो वो कोई संत या महात्मा हो.

बीबीसी अपने लेख में लिखता है, ” बगदादी ‘कथित‘ इस्लामिक स्टेट के ‘मुखिया थे,बगदादी का परिवार ‘धर्मनिष्ठ‘ था, बगदादी कंठस्थ करने के लिए ‘जाने जाते थे।’वह रिश्तेदारों को सतर्क नज़र से ‘देखते थे‘ कि इस्लामिक क़ानून का पालन हो रहा है या नहीं. वो क़ैदियों को इस्लाम की शिक्षा ‘देते थे,बगदादी फुटबॉल क्लब ‘के स्टार थे.” ऐसे लेख शायद BBC किसी महात्मा के मरने पर भी न लिखे.

बीबीसी लोगों को ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकी का viewpoint समझाने की कोशिश करता है, जबकि दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ जैसे लोग इनके लिए मिलिटेंट और extremist हैं, जी हाँ योगी आदित्यनाथ जो कि भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं उन्हें यही मीडिया एक militant monk कह कर संबोधित करता है. एक आतंकवादी संगठन को इतनी इज्जत और एक किसी देश के प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री के लिए मिलिटेंट और extremist जैसे शब्द, ये काम सिर्फ वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी जैसे संस्थान ही कर सकते हैं.

भारत का एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल को बघदादी में एक महान फुटबॉल प्लेयर नज़र आ गया, इनके अलावा हमारे देश की लिबरल मीडिया और नेताओं का बगदादी के मारे जाने पर कोई बयान नहीं आया. लगता है ये लोग अभी उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं.

आप में से कई होंगे जो आज भी इन संस्थानों और इनके द्वारा प्रकाशित खबरों को enlightening intellectual, secular और progressive मानते होंगे, लेकिन पत्रकारिता के भी कुछ उसूल होते हैं, सच न तो ज्यादा दिन तक छुप सकता है और न ही उसे नकारा जा सकता हैं, ये लोगों को gentle Brainwash करने ही लाख कोशिशे करते रहें, लेकिन इनका propaganda सबके सामने आ ही जाता है, इस बार भी वाशिंगटन पोस्ट के इस कदम पर उन्हें दुनिया भर से काफी फजिहत झेलनी पड़ी, twitter पर एक ट्रेंड चला #WaPoDeathNotices. इसके बाद वाशिंगटन पोस्ट को अपने आर्टिकल की headline को बदलना पड़ा. लोगों ने वाशिंगटन पोस्ट को ट्रोल करने के साथ ही उन्हें ये नसीहत भी दे दी की… जो चीज जैसे ही उसे वैसे ही पेश करें.