कुछ सवाल जो सुभाष चन्द्र बोस कि मौत हो एक रहस्य बना देते हैं

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दोस्तों आज हम बात करने जा रहे हैं आज़ाद भारत के एक ऐसे राजनीतिक किस्से के बारे में जिसके तार गुलाम भारत से जुड़े हैं. ये एक ऐसा किस्सा है जिसे छिपाने के लिए सरकार कि ताकत का प्रयोग किया गया और इतिहास को भी खूब तोड़ा मरोड़ा गया.

हम बात कर रहे हैं नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में. ऐसा माना जाता है कि उनका देहांत द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ताइवान में एक प्लेन क्रैश में 18 अगस्त 1945 को हुआ था. इस डेट कि पुष्टि आधिकारिक तौर पर सही इकहत्तर साल बाद यानि एक सितम्बर 2016 को की गयी थी. आप सोच रहे होंगे कि जब नेताजी का देहांत 1945 में हुआ तो इसकी पुष्टि करने वाली फाइल को आखिर 71 साल बाद क्यों सार्वजनिक किया गया. तो दोस्तों इस पूरे मामले में ऐसे कई सवाल हैं, जो सुभाष बाबू के निधन पर ही सवालिया निशान उठा देते हैं. आज हम आपको उन सभी सवालों से अवगत करायेंगे जिसके बाद आप भी ये सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या सुभाष चन्द्र बोस का निधन वाकई 18 अगस्त 1945 को एक प्लेन क्रैश में हुआ था या नेता जी आजादी के बाद हमारे साथ हमारे भारत में ही जी रहे थे.

तो सबसे पहले बात करते है 18 अगस्त 1945 की. इतिहास हमें बताता है कि इसी दिन सुभाष चन्द्र बोस कि ताइवान में एक हवाई दुर्घटना में मौत हो गयी थी. सुबूत में जापान सरकार ने हवाई दुर्घटना कि एक तस्वीर भी जारी की थी. आज ताइवान पर चीन अपना अधिकार मानता है और उस समय ताइवान जापान के कब्ज़े में था इसीलिए जापान सरकार ने ये तस्वीर रिलीज़ की. लेकिन ये तस्वीर मौत के राज़ सुलझाने के बजाये और उलझा देती है. ऐसा इसीलिए क्योंकि इस प्लेन में सुभाष बाबू के साथ सात लोग और थे और वे सभी बच गए थे. प्लेन क्रैश कि तस्वीर इतनी भयानक है की तमाम एक्सपर्ट्स का ये मन्ना है की ऐसे प्लेन क्रैश में कोई बच ही नहीं सकता. सुब्रतो बोस जो कि नेता जी के भतीजे हैं और जिन्होंने स्वाभाविक तौर पर नेता जी के निधन को काफी गहरायी से देखा और जांचा उनके अनुसार ताइवान सरकार ने दस्तावेज़ी सबूत पेश किए है कि उनके यहाँ 18 अगस्त 1945 को कोई विमान घटना ही नहीं हुई.

तैवान सरकार तो यहाँ तक कहती है की 14 अगस्त 1945 से लेकर 20 सितम्बर 1945 तक ताइवान में कोई भी हवाई दुर्घटना हुई ही नहीं. इसके बाद सितम्बर 1945 में अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए भी हवाई दुर्घटना कि साईट पर जाती है और उनके हाथ भी प्लेन क्रैश का कोई सबूत नहीं लगा. अब सवाल ये उठता है जब कोई हवाई दुर्घटना हुई ही नहीं तो वो तस्वीर किसकी थी. वही नेता जी के भतीजे प्रदीप बोस कहते हैं कि डॉ सत्यनारायण बोस, जो आगे कांग्रेस के सांसद भी रहे, उनके अनुसार प्लेन क्रैश कि तस्वीर 1944 ताइवान में हुए एक हवाई हादसे कि है जिसे उन्होंने खुद अखबार में देखा था. इसके बाद रूस के एक इंटेलिजेंस ऑफिसर ने भी सत्यनारायण बोस को ये बताया कि उसने नेता जी को रूस में 1954 में देखा था. ये बात डॉ सिन्हा ने GD खोसला कमीशन को और खुद नेहरु जी कोई बताई थी. लेकिन नेहरु ने इसपर ध्यान देने के बजाये इसे अमेरिका प्रोपगंडा कहकर इसे नज़रंदाज़ कर दिया.

चश्मदीद इस प्लेन क्रैश की अलग अलग कहानियाँ बताते हैं. कोई कहता है कि क्रैश एअरपोर्ट में हुआ था, कोई कहता है क्रैश एयर स्ट्रिप में हुआ तो कोई कहता है क्रैश एअरपोर्ट से 2 किलोमीटर दूर हुआ. इसके साथ डेथ का टाइम, उनका इलाज और उनका क्रिमेशन का समय, सब के अलग वर्शन हैं. एक सच्ची घटना के इतने सारे वर्शन कैसे हो सकते हैं. नेता जी का इलाज डॉ तेन्योशी ने हादसे के बाद किया था उसने मुख़र्जी कमीशन, जो नेता जी कि मौत के बारे में जांच कर रही थी, को बताया कि नेता जी को वो खुद नहीं जानते थे और उनके बारे में उन्हें बाद में जापान के आर्मी अफसरों ने बताया. सबसे सनसनीखेज बात ये है कि हादसे के 43 साल बाद यानि 1988 को तेन्योशी को जापान कि सरकार ने आदेश दिया कि वो नेता जी के डेथ सर्टिफिकेट को इशू करें.

नेता जी को हादसे के बाद जिस अस्पताल में भरती कराया गया और जिस शमशान में उनका क्रिमेश्न किया गया, उन दोनों जगह नेता जी नाम रजिस्टर में है ही नहीं. आखिर क्यों कोई आधिकारिक सबूत नहीं है जो बोसे की मौत कि पुष्टि करता हो.

ऐसा कहा जाता है कि बोस के सबसे खास दोस्त हबीबुर रहमान भी उस विमान में थे जब हादसा हुआ. रहमान इस सभी अटकलों को विराम दे सकते थे लेकिन उनके बयानों ने इस रहस्य को और ज्यादा उलझा दिया. वे कहते हैं कि उस दिन नेता जी के पूरे शरीर में आग लगी हुई थी और उन्होंने खुद अपने हाथों से आग ऐसे बुझाई लेकिन फिर उन्होंने अपने जख्म यहाँ दिखाए. जब हबीबुर रहमान से ये पूछा गया कि ऐसा कैसे कि उन्होंने एक खतरनाक हादसे को झेला और फिर नेता जी की आग बुझाने कि कोशिश की फिर भी उनको और उनके कपड़ों पर एक खरोच भी नहीं आई तो इसपर रहमान चुप हो गए.

जापान सरकार के अनुसार बोस कि अंत्येष्टि 21 अगस्त 1945 में हुई थी वही रहमान ये तारीख 22 अगस्त 1945 बताते हैं. जापान नेता जी के अस्थि कलश को अपने यहाँ आने कि तारीख 1 सितम्बर बताता है वही रहमान इसे 6 सितम्बर 1945 बताते हैं.

तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु के निजी सचिव एम ओ मथाई ने 2 सितम्बर 1954 को लिखी एक औपचारिक चिट्ठी में ये माना है कि नेता जी के अस्थि कलश और 200 रुपय विदेश मंत्रालय को मिल गए लेकिन सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि नेता जी कि अस्थियाँ अभी भी रेंकोजी मंदिर में है जो की जापान में है.नेता जी कि भतीजी चित्रा बोस घोष बताती हैं, हबीबुर रहमान जब घर आये तो मेरे पिता शरत चन्द्र बोस ने उनसे पूछताछ की. शरत चन्द्र बोस पेशे से वकील थे और इस पूछताछ के बाद वो पूरी तरह से आश्वस्त थे कि रहमान झूठ बोल रहे हैं.

आपको बताते चलें कि आज तक नेता जी की मौत की जाँच को लेकर तीन कमीशन का गठन हो चुका है. पहली दो कमेटी शाह नवाज़ खान कमेटी(1956) और जस्टिस GD खोसला कमेटी(1970) ने माना कि नेता जी कि मौत हवाई हादसे में हुई थी. लेकिन अनुज धर, जो कि नेता जी की मृत्यु के रहस्य के बारे में एक किताब लिख चुके है और जो मिशन नेता जी नाम का NGO चलाते हैं, मानते हैं कि इसमें चश्मदीद सारे कांग्रेस के या इंटेलिजेंस ब्यूरो के ही थे.

फिर उसके बाद अटल बिहारी वाजपयी ने जस्टिस एम के मुख़र्जी कमेटी का गठन किया. वाजपयी सरकार गिर गयी लेकिन इन्क्वारी आगे बढ़ी. 2005 में मुखेर्जी कमेटी ने माना कि की नेता जी कि मृत्यु प्लेन क्रैश से नहीं हुई थी लेकिन युपीए सरकार ने इस रिपोर्ट को ठंडे बसते में दाल दिया.

इसके बाद इस पूरे प्रकरण में एक नया मोड़ आता है. 1955-56 में गुमनामी बाबा जिन्हें भगवान जी के नाम से भी जाना जाता था उनकी एंट्री होती है. गुमनामी बाबा के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था कि वो कौन हैं और कहाँ से आये हैं. लोग इतना जानते हैं कि गुमनामी बाबा संपूर्णानंद, जो कि उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, के दोस्त थे. इसके साथ संपूर्णानंद और नेता जी कि दोस्ती 1920 से थी. गुमनामी बाबा यूपी में 1985 तक कई जगह रहे. 1985 में गुमनामी बाबा का निधन फैजाबाद में हो जाता है. इसके बाद गुमनामी बाबा सूर्खियों में आ जाते हैं. ये कहा जाने लगता है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस थे. बाबा के अनुयायी उन्हें भगवानजी के नाम से बुलाते थे. बाबा के अनुयायी उन्हें सुभाष चन्द्र बोस मानते थे. बाबा के कमरे से भी कई ऐसी चीज़े जैसे कई ऑब्जेक्ट्स और खासकर नोट्स मिले जिसे सीधा नेता जी से जोड़ा गया.

इसके बाद नेता जी की भतीजी ललिता बोस फैजाबाद पहुँचती हैं. वो एक पेर्सोनेल इन्क्वारी करती है और इस नतीजे पर पहुँचती है कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चन्द्र बोस थे. इसके बाद ललिता बोस तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से जाँच कि अपील करती हैं. लेकिन जब उन्हें कुछ हासिल नहीं होता तो वो अलाहाबाद हाई कोर्ट में एक केस दर्ज करा देती हैं इसके बाद राज्य सरकार कि तरफ से जवाब 13 साल बाद दिया जाता है. जिससे इस मामला पर काफी सवाल खड़े किए गए. इसके बाद हाई कोर्ट 2013 में उत्तर प्रदेश सरकार को जांच के आदेश देती है.

2016 में उत्तर प्रदेश सरकार जस्टिस सहाए कमेटी का गठन करती है. इस कमेटी पर बात करने से पहले बात करते हैं एक ख़त के बारे में बात करते हैं जिसे 3 दिसम्बर 2017 को बोस परिवार के साथ उन लोगों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखा था जो मानते हैं कि सुभाष चन्द्र बोस ताईवान प्लेन क्रैश में नहीं मरे थे.

इस ख़त में लिखा है कि 2010 में जस्टिस मुख़र्जी खुद कबूल करते हैं कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चन्द्र बोस थे, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा खड़ी की गयी अड़चन कि वजह से ये बात आजतक साबित नहीं हो सकी. ख़त में ये भी लिखा है कि 1985 के बाद से तमाम पत्रकार सुभाष चन्द्र बोस के जिंदा होने कि बात कह चुके हैं. इनमें मुख्य हैं अशोक टंडन, स्येद हुसेन, निर्मल नीबेदन ,वी एन अरोरा और अनुज धर. इसके साथ फैजाबाद पुलिस द्वारा अधूरी जाँच का भी ज़िक्र इस ख़त में किया गया है.

मुख़र्जी कमीशन द्वारा कि गयी जाँच की भी कमियों को इस ख़त में लिखा गया है. इसमें बताया गया है कि जिस DNA की नेगेटिव रिपोर्ट के चलते ये साबित नहीं हो सका था कि गुमनामी बाबा ही नेता जी हैं उसे अलाहाबाद हाई कोर्ट ने मानने से ही मना कर दिया था. इसके साथ DNA रिपोर्ट में भी गड़बड़ी की गयी थी और इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से पहले ही प्रो कांग्रेस के एक अखबार को दे दिया गया था जिससे पूरी जांच में फर्क पड़ा था.

सहाए कमीशन जिसका गठन अखिलेश यादव ने किया था उसकी जांच पर भी सवाल खड़े किए गए. ख़त में लिखा है कि मुख़र्जी जिन्होंने 2010 में माना था कि गुमनामी बाबा ही नेता जी थे, सहाए ने उनसे क्यों बात नहीं की. कॉमन सेंस कहती है कि जस्टिस सहाए को जस्टिस मुख़र्जी से बात सबसे पहले करनी चाहिए थी.

आरोप ये भी लगा कि जस्टिस सहाए ने सिर्फ बंगाली भाषी जिन्हें नेता जी और गुमनामी बाबा के बारे में ज्यादा नहीं पता था, उनसे ही सिर्फ पूछताछ क्यों की. ख़त में ज़िक्र है AC दास का जो इंडियन नेशनल आर्मी के मेम्बर थे. AC दास लगातार ख़त लिख रहे थे गुमनामी बाबा को कि नेता जी की मृत्यु के बाद क्या क्या हुआ. बाबा जनना चाहते थे कि INA के सिपाहियों ने ब्रिटिश के आगे क्या गवाही दी. एम एस गोवलकर जो कि आरएसएस के दूसरे सर संग चालक थे वो भी बाबा के साथ लगातार टच में थे इसके बाद के एस सुदर्शन जो आरएसएस के 5 सर संग चालक थे उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर बाबा को नेता जी बता दिया था. तो सवाल ये है कि इतनी सब बातों को केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने क्यों छिपाया. और आखिर गुमनाम बाबा को इतने बड़े लोग कैसे और क्यों जानते थे.

ख़त लिखने वाले शख्स जब जस्टिस सहाए से मिले तो वे हैरान हो गये जब जस्टिस सहाए ने कहा कि ये इन्क्वारी सिर्फ बाबा के लिए है न कि सुभाष चन्द्र बोस के लिए. इसके बाद जस्टिस सहाए कहते हैं कि वे सिर्फ लीगली सही रिपोर्ट बनाना चाहते हैं. लेकिन इस कमेटी का गठन हुआ था बोस और गुमनामी बाबा के रिश्ते का पता लगाने के लिए. ये तो वही बात हो गयी कि मार्शल लॉ में अगर आर्मी किसी को गोली मार दे तो आर्मी से सवाल नहीं पूछा जाता लेकिन क्या गोली मारना ठीक है? इससे जस्टिस सहाए के इरादे भी साफ़ पता चल जाते हैं.

जस्टिस सहाए ने जिन लोगों को अपने पास जाँच के लिए बुलाया उस पर भी आपत्ति इस ख़त में दर्ज करायी गयी. चश्मदीद से पूछताछ भी बहुत प्राइवेट तरीके से हुई और दूसरी पार्टीस भी उन चश्मदीदों से कोई सवाल जवाब नहीं कर सकी. इसके साथ जब मांग उठी तब जस्टिस सहाए ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए किसी को समन भी नहीं किया.

अब अगर बात करें सहाए कमेटी रिपोर्ट के बारे में तो 347 पन्नों कि रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नायक को सौंप दी गयी है. रिपोर्ट में ये साफ़ तौर पर कहा गया है कि कई लोग मानते हैं कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चन्द्र बोस थे.

10 अक्तूबर 1991 में पी वी नरसिम्हा राव ने नेता जी को भारत रतना पुरस्कार देने प्रस्ताव रखा था लेकिन बोस के 60 सदस्यों ने ये पुरस्कार लेने के लिए मना कर दिया था. उन्होंने मांग की थी कि पहले पुख्ता सबूत दिया जाये कि बोस का निधन कब हुआ था. इसके साथ जब सुप्रीम कोर्ट में एक PIL फाइल की गयी इस मामले में तो कमेटी जो तय करती है कि भारत रत्न किसे मिलेगा वो कोई सबूत दे ही नहीं पाई बोस के निधन का.तो अब सवाल ये है कि 74 सालों तक इस मामले कि निष्पक्ष और हाई लेवल कि इन्क्वारी क्यों नहीं की गयी.

नेहरु और नेता जी के विरोधाभास से सब वाकिफ हैं. स्वतंत्रता संग्राम में भी दोनों की एप्रोच एकदम विपरीत थी. द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन काफी कमजोर हो गया था. बोस के अनुसार ये एक सुनहरा मौका था कि भारत हथियार उठा के अंग्रेजों से आजादी ले. लेकिन वही नेहरु ब्रिटिश की मदद करने कि बात कर रहे थे. इसी के चलते बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी बना ली थी और अंग्रेजों को भारत को आज़ाद करने पर विवश कर दिया था. बोस स्वतंत्रता संग्राम में इस योगदान को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भी माना. ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने मद्रास गवर्नर को यहाँ तक कह दिया था कि भारत को आजादी बोस ने दिलाई थी न कि गाँधी ने.

इंटेलिजेंस ब्यूरो की फाइल्स से भी ये बात सामने आ चुकी है कि नेहरु ने 1948 से 1968 तक बोस परिवार की जासूसी की थी. नेहरु ने बोस को एक वॉर क्रिमिनल के नाम से भी संबोधित किया था. इसके साथ इंडियन नेशनल आर्मी को वो इज्ज़त भी कांग्रेस सरकार द्वारा कभी नहीं दी गयी जिसके वे हक़दार थे. यहाँ तक की इंडियन नेशनल आर्मी का म्यूजियम भी 2018 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश को दिया गया. अगर गुमनामी बाबा ही बोस थे तो वे किसी के सामने क्यों नहीं आये. क्या बोस के जिंदा होने से नेहरु कि राजनीति पर कोई असर पढ़ता. ये कुछ सवाल हैं जिन्हें हमें खुद से पूछना होगा.

ये किस्सा आपको इसलिए बताया गया ताकि आपको पता चल सके कि आज़ाद भारत में कैसे कैसे षड्यंत्र रचे गए कैसे इतिहास को गलत तरीके से पेश किया गया.

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